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……..सिर्फ बातें ही न रह जाए*

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शशिकांत गुप्ते

भरोसा शब्द का अर्थ होता है,यकीन,विश्वास,पक्की आशा आदि।
दैनिक जीवन में हरतरह के व्यक्तिगत कार्य, व्यवहारिक कार्य सार्वजनिक कार्य आपस में पैसों का लेनदेन करने के लिए एकदूसरे पर भरोसा करना पड़ता है।यह मानव की मजबूरी नही प्रकृति है।
इसी भरोसे पर मानव एक दूसरे पर विश्वास कर लेता है।लेकिन एक कहावत है,भरोसे की भैंस ने पाडे को जन्म दिया। इस कहावत का मतलब भरोसा करने पर विश्वासघात होना।
यहाँ पर विश्वासघात शब्द का प्रयोग करने के पीछे तात्पर्य है,मनुष्य के स्वार्थी मानसिकता को प्रमाणित करना?
नर भैसों के समूह को मतलब तमाम पाड़ों को उक्त कहावत को लेकर बहुत गुस्सा है।
नर भैसों ने उक्त कहावत को बनाने पर मानवों की भर्त्सना की।
मनुष्यो की भर्त्सना करने का मुख्य कारण,मनुष्य की स्वार्थी मानसिकता है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए सिर्फ मादा भैंस के जन्म की अभिलाषा रखता है।स्वयं मनुष्य, स्त्री के गर्भ में धारण होने वाले गर्भ की जांच करवा कर, स्त्रिलिंगी भ्रूण को स्त्री के गर्भाशय में ही खत्म करने में कोई संकोच नहीं करता है।यह मनुष्य के पुरुषप्रधान मानसिकता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
भैंस ने मात्र सिर्फ मादा भैंस को जन्म देना चाहिए।यह मनुष्य के स्वार्थ के साथ शोषण करने की मानसिकता का सबूत है।
इतना सब होने के बाद भी मनुष्य आशावादी है।
सन 1958 में प्रदर्शित फ़िल्म के टाइटल फिर सुबह होगी पर भरोसा करतें हुए,इसी फिल्म के गीतकार रचित गीत की पंक्तियां सतत दोहराता है।
वो सुबह कभी तो आएगी
इसी गीत की पंक्तियां हैं।
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

जहाँ पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि, इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए,
सन 1967 में प्रदर्शित फ़िल्म उपकार में गीतकार गुलशन बावराजी ने मिट्टी में उगने वाली फसलों को सोना और हीरे मोती की उपमा दी है।
मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती
अपना पसीना बहाकर मिट्टी से फसलों को उगाने के लिए जो परिश्रम करतें हैं,वे किसान फिर सुबह होगी की आस में बारह महीनों से बाट जो रहें हैं।इन बारह महीनों में किसान अपने सात सौ से अधिक साथियों को हमेशा के लिए खो दिया है।
पुनः वही भरोसा दिया जा रहा है।कानून वापस लेने का।
कल युग में राम भरोसे नहीं बैठ सकतें हैं।इसीलिए किसान अपनी हक़ की लड़ाई मजबूती के साथ लड़ रहें हैं।
कानून वापसी की घोषणा होतें ही जगरूक लोगों ने महात्मा गांधीजी को याद किया।
गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह उपदेश सार्थक हुआ।
अहिंसा के महत्व को समझाने के लिए,गांधीजी ने कहा था,
यदि कोई एक गाल पर थप्पड़ मार तो दूसरा गाल आगे करना चाहिए। गांधीजी के विचारों के विपरीत विचारों का प्रमाण है।
स्वयं के द्वारा स्वयं को थप्पड़ मारने की सम्भवतः यह पहली घटना है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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