अग्नि आलोक

अर्जुन तक को नर्क, कृष्ण को भजो मत जीओ !

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~ सभी ग्रंथ मनुष्यकृत, ईश्वरकृत प्रकृति
~ कोई मंत्र-तंत्र-गुरूघंटाल किसी को पवित्र नहीं कर सकता
~ मात्र 24 घंटे के लिए खुद को मुझे दो, मंज़िल की चावी निःशुल्क लो

> डॉ. विकास मानव 

बहुतों ने भगवत गीता समझ रखी है। बहुतों को तो कंठस्थ भी है। कृष्ण ने भगवत गीता में साफ कहा है : जो मुझे भजते हैं वो मुझे ही प्राप्त होते हैं। अर्जुन फिर भी नरक पहुंचे थे।

   तो पहले अपनी इस समझ की जकड़न से बाहर निकलो। अपनी शक्ति को पहचानो। सवाल ये नहीं है कृष्ण ने क्या कहा ? सवाल ये है की तुमने क्या समझ रखा है। तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी होगा वो तुम्हारी समझ से होगा कृष्ण के कहने से नहीं होगा। 

     _कृष्ण ने तो ये भी कहा था ये  महाभारत धर्म युद्ध है। मैं जहां हूँ वही धर्म भी है। तो कृष्ण की तरफ वाले नरक क्यों पहुंचे? कृष्ण क्या कहते हैं क्यों कहते है इस बात को समझने के लिए तुम्हें कृष्ण होना होगा। तुम जहां खड़े हो वहां से कृष्ण को नहीं समझा जा सकता है।_

   *वेद’कुरान’बाइबिल ईश्वरकृत नहीं :*

         वेद और उपनिषद और किसी भी कथित मजहवी धर्म की किताब ईश्वरकृत नहीं. कभी भी प्राचीन वैदिक भारत में धर्म ग्रन्थ नहीं थे। वैदिक मनीषियों का स्पष्ट मत था कि धर्म ग्रन्थ तो केवल वही हो सकता है जो स्वयं ईश्वर द्वारा लिखा गया हो। वेद  उस समय के मनीषियों द्वारा लिखा/रचा गया है और हर मण्डल, सूक्त में उन ऋषियों के नाम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

    ईश्वर द्वारा लिखा गया धर्म ग्रन्थ तो यह सचराचार प्रकृति है जिसके हम सब, जीव जन्तु, पर्वत, पेड़, नदियां अक्षर है। उस गुरुकुल के आचार्यों का यही धर्म ग्रन्थ था। 

वेद कहता है :

 पश्य देवस्य काव्यम, न ममार न जीर्यति। 

     ईश्वर के इस काव्य (रचना) को देखो जो न मरता है और न ही पुराना होता है। वेद का सारा विज्ञान प्रकृति के अकाट्य नियमो पर ही आधारित है। आधुनिक विज्ञान के साथ भी तो वही है। लेकिन तुम्हारे मस्तिष्क में जो ठूंस दिया गया है उतना ही सोचोगे, फिर शास्त्र की बात करोगे।

       सनातन परंपरा के गुरुकुलों में वेद उपनिषद आदि पाठ्य पुस्तकें थी जिसको पढ़ाना केवल अनुभव सिद्ध संन्यासियों के बस की बात थी क्योंकि उन पुस्तकों में वर्णित ज्ञान अपरोक्ष अनुभूतियों का संकलन है। जिसने खुद उनका अनुभव नहीं किया है, जिन्होने उस ज्ञान को अपनी निजी अनुभूतियों से हासिल नहीं किया है उनके बस इनको पढ़ाना भी नही है।

      अब न तो वे गुरुकुल बचे, न वे साधना स्थल रहे और न ही वे अनुभवी आचार्य रहे। साधना स्थलों और गुरुकूलो को तो मूर्तियां बैठा के तथाकथित महंतों आचार्यों और कथावाचकों ने दर्शन स्थलों (मन्दिरों) में बदल दिया। आत्म साक्षात्कार की बात मूर्ति साक्षात्कार (दर्शन) तक सीमित होकर रह गया है। वो भी बिना पैसे का नहीं होगा। अब इसे पयर्टन स्थल में बदलने की प्रक्रिया चल रहा है, जिससे ज्यादा से ज्यादा धन की उगाही हो सके।

*लाश पर स्थापित आज के गुरुकुल :*

      तथाकथित मठ महंत और आचार्य भले ही अपनी पाठशालाओं को नाम गुरुकुल दे दें लेकिन वो न तो कभी सनातन परंपरा के वैदिक गुरुकुलों के समकक्ष हो पाया और न ही हो सकता हैं।

     यहां न तो वह ज्ञान था और न ही वे आचार्यगण। जैसे आज के मन्दिर प्राचीन पाठशालाओं, साधना स्थलों के खंडहर पर खड़ा हैं वैसे ही इसका गुरुकुल सब भी सनातन संस्कृति के वैदिक गुरुकुलों के लाश पर स्थापित है।

     ऐसी हालत में उग्र राष्ट्रवाद का सहारा लेकर प्राचीन गुरुकुलों के स्थापना की बात ज्ञान को अवरुद्ध करने और अंध विश्वास के प्रसार का महज एक षडयंत्रपूर्ण हठधर्मिता है और इस षडयंत्रपूर्ण हठधर्मिता में शामिल है देश के लाखों साधू, सन्त समाज, कथा वाचक, पूजारी वर्ग और कर्मकांडी लोग। 

     कुछ अपवाद भले हो सकते हैं लेकिन यह सत्य है। जैसे “सिया राम मय सब जग जानी” गाने से वह आत्मास्थिति नहीं होती है वैसे ही वेद की ऋचाओं और उपनिषद के वाक्य श्लोकों को उद्धरित करके प्राचीन गुरुकुलों को कभी भी स्थापित नहीं किया जा सकता है। 

     इस धरती और उस पर स्थित जीवन के इतिहास पर जो वैदिक और वैज्ञानिक मत है इसका स्वघोषित जगद गुरुओं को न ज्ञान और न ही भान। उनका अहंकार उनके अज्ञानी भक्तो और शिष्यों के जयजयकार में ही डूबा रहता है। 

       यह एक अति विकट समस्या है और जब तक इन लोगों को इनका उचित स्थान नहीं दिखाया जायेगा तब तक ये अपने रूढ़िवाद और अज्ञान के धुआं से ज्ञान के प्रकाश को धूमिल करते ही रहेंगे। मात्र 24 घंटे के लिए खुद को “सिर्फ मुझे” देकर मंज़िल की चाबी निःशुल्क प्राप्त की जा सकती है. इस वाक्य के एक-एक शब्द को समझ सकना तो आना

      पुराणों रामायणो महाभरात आदि में पात्रों के नाम वही रख दिया गया हैं जो प्राचीन गुरुकुलों के रहस्य कथाओं में प्रयुक्त होता था। परन्तु बड़ा फर्क यह है कि प्राचीन गुरुकुलों के रहस्य कथाओं का वो  नाम किसी ख़ास व्यक्ति का नाम न होकर मनुष्य के सहज स्वभावों, मनोवृत्तियों और उससे उत्पन्न अवस्थाओं और परिस्थितियों के नाम था। इसके विपरीत पुराणों रामायणो महाभरात आदि के कथाओं के नाम व्यक्तियों का नाम हैं जो काल्पनिक भी हो सकता हैं। इस से बहुत बड़ा भ्रम उत्पन्न हो जाता है और इस देश के करोड़ों लोग अपने को इस भ्रम से उबार नहीं पाता हैं।

      उदहारण के लिए वैदिक गुरुकुलो में समय (काल) को मनु, धृतराष्ट्र आदि कहा जाता था। मनु से काल खण्ड के गणना को मानवंतर कहा जाता था। काल गणना कहीं सूर्य से तो कहीं चन्द्र से होती थी। नाग संस्कृति में त्योहारों और उत्सव आदि को मनाने के लिए भी इसका उपयोग होता था। आज भी होता है। जिस इलाके में सूर्य गणना का उपयोग होता था वे लोग सूर्यवंशी कहलाते थे। 

       जहां चन्द्र गणना का उपयोग होता था वे चन्द्रवंशी कहलाते थे। प्राचीन भारत में दोनों गणना मान्य था। किन्तु पुराणों में मनु एक व्यक्ति है। उसी से समस्त मानव की उत्पत्ति बताई जाती है। सूर्य और चन्द्र वंश भी उसी से जुड़ा हुआ है। आज कोई समाज सूर्यवंशी तो कोई चन्द्र वंशी होने का गर्व कर रहा है.

       इसी प्रकार एक ऐसा भी समुदाय है जो खुद को मानव मानने को ही तैयार नहीं हैं। वह कहता है कि उनकी उत्पत्ति ब्रम्ह या ब्रह्मा के मुख से हुई है। 

      मठ महंत और अखाड़ों के धर्म वालों ने ब्रम्ह और ब्रह्मा का भी विकट खेल रच रखा है। वैदिक मनीषियों की दृष्टि में सृजन के सूक्ष्मतम कण का नाम ब्रम्ह है। आधुनिक विज्ञान ने भी उसका नाम गॉड पार्टिकल ही दिया है। ब्रम्ह को बनाने वाला ब्रह्मा है। 

यह वैसा ही जैसा सृष्टि और स्रष्टा का सवाल है। लेकिन मठ महंत के धर्म में ब्रह्मा एक व्यक्ति है जिसका दायित्व सृजन करना है। ब्रह्म के दिन रात और वर्ष की गणना भी है।

       मिला जुलाकर इतना प्रचूर भ्रम फैला हुआ है कि तुम उपयोगी ऐतिहासिक किसी निष्कर्ष पर न पहुंच सको तथा कपोल कल्पित बकवास को मानने को मजबूर रहो। 

       मीरा, सूरदास, तुलसी दास को देखकर तुम खुद में भक्त होने का धोखा मत पाल लो | भक्त होने के लिए जीवन दाव पर लगाना होता है | तुम ग्रहस्थ या भक्त में से कोई एक ही हो सकते हो | तुम संन्यासी या  भक्त में से कोई एक ही हो सकते हो | संन्यास और ग्रहस्थ दोनों ही मार्ग की पूर्णता का पद है | तुममें से किसी को भी अपना आकलन कम नहीं करना चाहिए |

*पवित्र करने की नौटंकी से दूरी जरुरी :*

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

      पता नहीं लोगों को कहां से ये धोखा हो गया है कि अपवित्रः पवित्रोवा मंत्र पढ़कर जल छिड़क देने से मनुष्य या वस्तु पवित्र हो जाता है। जिन्हें कर्मकांड को धंधा बनाना है उनके लिए ये ठीक है। 

     लेकिन सनातन धर्म में पवित्र या अपवित्र की कोई अवधारणा ही नहीं है। यह अवधारणा तथाकथित मठ महंत और कथावाचकों की देन है। जिसके कारण भारतीय समाज में छुआछूत की बिमारी घुसी। कर्म काण्ड का व्यवसाय भी इसी परिकल्पना को आधार बनाकर निर्मित किया गया है। इसलिए वहां सब कुछ का शुद्धिकरण अनिवार्य सा दिखता है। 

      इसका मूल कारण यह भी है कि तथाकथित मठ महंत और कथावाचकों के पास अध्यात्म नहीं के बराबर है। वहां आत्म ज्ञान के लिए साधना पर कम और अन्य बातों पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसके विपरीत सनातन संस्कृति अध्यात्म के उस तुंग शिखर पर खड़ा है जिसे सिर्फ अनुभूति से ही जाना जा सकता है। तथाकथित ग्रंथो के उपदेश, कहानियां या प्रवचन वहां निरर्थक हो जाते हैं। 

       ऋग्वेद अपरोक्ष अनुभूतियों का संकलन है। अनुभूति के लिए उचित साधना और अंतरयात्रा जरूरी है। इसलिए अध्यात्मपथ पर सिद्ध गुरू अनिवार्य है। तथाकथित  धर्म गुरू मुख्य रूप से गुरुपूर्णिमा के दिन शिष्यों से धन संग्रह के लिए है। सनातन धर्म में गुरू और आचार्य अलग अलग है जबकि मठ महंत के धर्म में आचार्य ही गुरू बन जाता है। 

       तथाकथित मठ महंत और आधुनिक आचार्यों के लिए पवित्र और अपवित्र आवश्यक है जबकि सनातन धर्म के साधकों और गुरुओं के लिए पवित्र और अपवित्र का भेदाभेद है ही नहीं। यदि ऐसा होता तो श्मशान कभी साधना का स्थल नहीं होता और रोज सोने वाले विस्तर को शवासन नहीं कहते। तथाकथित मठ के आचार्य  कभी रोज सोने वाले विस्तर को साधना का उपयुक्त आसन नहीं मान सकते क्योंकि उनकी नजर में विस्तर पवित्र नहीं है। सनातन धर्म उसको शवासन कहता है जो ध्यान के लिए बहुत उपयुक्त है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। 

      जिस विस्तर पर आप रोज सोते हैं वह आप के आभामण्डल के ऊर्जा (aura) से आप्लावित रहता है। यह ऊर्जा आपको ध्यान केन्द्रित करने में बहुत सहायक होता है। बहुत लोग बहुधा शिकायत करते हैं कि स्थान या बिस्तर बदल जाने से उनको नींद ठीक से नहीं आई। ऐसे लोगों का आभामंडलीय ऊर्जा बहुत सक्रिय होती है। आप की आभामंडलीय ऊर्जा कितनी सक्रिय है इसको जांचने के लिए सोने से पहले अपने बिस्तर को एक फुट इधर उधर कर दीजिए फिर उस पर सोइए। यदि आपकी आभामंडलीय ऊर्जा अधिक सक्रिय है तो आपकी नींद डिस्टर्ब हो जायेगी। 

     आधुनिक स्वस्थापित शंकराचार्यों ने सनातन धर्म के अद्वैतवाद को अपना तो लिया लेकिन उसके व्याख्या में चूक गए । 

     क्योंकि इन मे साधना बल और अनुभूति थी ही नहीं। इसी कारण इन्होंने कहा कि ब्रम्ह सत्य है और जगत मिथ्या (माया) है और फिर कहा कि माया कि उत्पत्ति का स्रोत भी ब्रम्ह ही है। अगर ब्रम्ह सत्य है और माया का स्रोत भी वही है तो फिर सत से असत (मिथ्या) प्रगट ही नहीं हो सकता है। तभी वे विशिष्टाद्वैत के भ्रमजाल में उलझ के रह गए। अब उनको पवित्र और अपवित्र के भ्रम से कभी मुक्ति नहीं मिल सकती है। 

       सनातन धर्म (शाक्तवाद) के अद्वैतवाद में ब्रम्ह (महामाया) भी सत्य है और उसकी माया (जगत) भी सत्य ही है। विज्ञान कहता है कि सम्पूर्ण ब्रम्हांड ऊर्जा है – संघनित (bottled) या मुक्त (free)। संघनित ऊर्जा पदार्थ है और मुक्त ऊर्जा विकिरण (radiation) है। लेकिन है यह जगत ऊर्जा का ही खेल (लीला)। अब आप अगर ऊष्मा (Heat) और प्रकाश (Light) के विकिरण के विश्लेषण में पड़ेंगे तो विशिष्टाद्वैत के जंगल में चले जाएंगे क्योंकी ऊर्जा तो हर हाल में वही रहेगी। पूर्ण (Total) और अविनाशी तथा संरक्षित (Conserved)। किसी भी वितंडावाद से उसमें फर्क नहीं पड़ने वाला।

      विज्ञान फिर आगे कहता है कि यह ब्रम्हांड या तो कण (particle) से बना है या प्रतिकण (anti particle) से। अगर कण पवित्र है तो प्रतिकण अपवित्र है या फिर यदि प्रतिकण पवित्र है तो कण अपवित्र हो जायेगा। इसलिए विज्ञान के मत में अगर कण और प्रतिकण एक साथ हो जायेंगे तो एक विस्फोट के साथ एक दुसरे को विनिष्ट कर देंगे। इसलिए मठ महंत के आचार्य और कथावाचक सब शुद्धिकरण की बात करता है जो गलत है क्योंकि शुद्धिकरण सम्भव ही नहीं है। 

      विज्ञान की ही भाषा में सनातन धर्म जो वेद के विज्ञान पर टिका है कहता है कि सृष्टि में या तो सब कुछ पवित्र है या सब कुछ अपवित्र है। यह जगत पवित्र और अपवित्र का समीश्रण नहीं हो सकता है। आधुनिक विज्ञान के आगे जाकर वेद या सनातन संस्कृति का विज्ञान एक बात और कहता है। वेद के मत में जब कण कभी भी प्रतिकण के सम्पर्क में आता है तो जीव का सृजन (animation) हो जाता है। यही आत्म प्रवेश है। यही ब्रम्ह की उत्पत्ति है। इस में जो ध्वनी और नाद सनलग्न वह आम तौर पर बोधगम्य नहीं है। यह नाद और ध्वनी (Big Bang) हर बीज के प्रस्फुटित होने के समय होता है। गार्गी ने अन्तिम प्रश्न में याज्ञवल्क से ब्रम्ह का ही स्रोत पूछा था और जवाब है “आत्मा”।  

      कहने का तात्पर्य यह है कि अपवित्र को पवित्र करने की आवश्यकता ही गलत है। सब कुछ या तो पवित्र है या अपवित्र है और पवित्रापवित्र के मिलन से किस प्रकार जल और जीवन का सृजन होता है आधुनिक विज्ञान अभी वहां नहीं पहुंचा है।

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