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रोम रोम में बसने वाले रामजी को कौम की संकीर्णता मत बांधों?

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शशिकांत गुप्ते

एक अपंग भिखारी,भीख मांगने के लिए सड़क पर बैठ कर तुलसीबाबा रचित दोहा बोल रहा था।
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।
अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट।

तुलसीबाबा सच्चे संत थे। तुलसीबाबा के कहने का आशय निश्चित यह होगा कि,राम का नाम सहज उपलब्ध है। हरएक व्यक्ति ले सकता है।
राम का नाम लेने से अंतःकरण की शुद्धि होती है। अंतःकरण की शुद्धि होने से मन में व्याप्त राजसी,तामसी दुर्गुणों का प्रदूषण नष्ट होता है।सात्विक गुणों का संचार होता है।
सात्विक गुणों में शुद्धता आती है।
ऐसे व्यक्ति ही सदाचारी हो सकता है। ऐसे व्यक्ति में काम,क्रोध,
लोभ, मत्सर,मद और मोह इन छः मानव के शत्रुओं पर विजय पाने की क्षमता जागृत होती है।
एक रत्नाकर नामक दस्यु का जब हृदय परिवर्तन हुआ,तब वह राम नाम का उच्चारण भी ठीक से नहीं कर पाया मरा मरा रटते हुए, वह दस्यु महान संत महर्षि वाल्मीकि बन गया। महर्षि वाल्मीकि ने ही संस्कृत में रामायण की रचना की है।
उपर्युक्त उद्गार अध्यात्मिक सन्तो के है। धार्मिक नेता के नहीं है।
उक्त उद्गारों को जस का तस प्रेषित करने का हेतु यह है कि वर्तमान में राम के नाम का दुरुपयोग किया जा रहा है।
संत तुलसीबाबा ने कहा है।
राम राम सब कोई कहे ठग ठाकुर और चोर,
बिना प्रेम के रिझत नाही तुलसी नंदकिशोर

आज तो सियासत में राम नाम पर अपना प्रभुत्व कायम करने की कुत्सित चेष्ठा की जा रही है।
प्रख्यात समाजवादी चिंतक, विचारक गांधीजी के विचारों को आमलीजामा पहनाने वाले स्वतंत्रता सैनानी डॉ रामनोहर लोहियाजी ने भी रामायण मेले आयोजित करने के लिए लोगों को प्रेरित किया था। रामायण मेले आयोजित करने के पीछे लोहियाजी का ध्येय था कि, राम के मर्यादा पुरूषोत्तम स्वरूप को जन जन तक पहचाना।
लोहियाजी ने राम के नाम का राजनैतिक इस्तेमाल नहीं किया।
राम का चरित्र जन्म से लेकर अंत तक सँघर्षरत ही रहा है।
चौदह वर्ष वनवास भोगा। वनवास के दौरान पाँच वृक्षो की कुटिया पंचवटी में निवास किया।
कलयुग में उन्ही भगवान रामजी का बेतहाशा कीमती दिव्यभव्य मंदिर का निर्माण हो रहा है?
निश्चित ही मंदिर परिसर में या मंदिर के बाहर भिखारियों को रोजगार मुहैया होगा।
धनकुबेर दानवीर उन्हें मुक्तहस्त से दान देंगे।
राम ने वानरों और भालुओं से मित्रता की थी।
आज सियासत में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है।
यह सब देख सुनकर मन व्यथित होता है।
इस संदर्भ में सन 1971 में प्रदर्शित फ़िल्म हरे कृष्ण हरे राम के गीत की पँक्तियों का स्मरण होता है। गीतकार आनंद बक्षीजी रचित यह पँक्तियां प्रासंगिक हैं।
देखो ऐ दीवानो, तुम ये काम ना करो
राम का नाम बदनाम ना करो, बदनाम ना करो
राम ने हँस कर सब सुख त्यागे,
तुम सब दुख से डर कर भागे
कृष्ण ने कर्म की रीत सिखाई
तुमने फ़र्ज़ से आँख चुराई, ओ राम दुहाई

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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