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*Double role वाली फिल्में?*

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शशिकांत गुप्ते

फिल्म उद्योग में दोहरी भूमिका मतलब Double role वाली फिल्में भी बहुत निर्मित हुई है।
एक ही अभिनेता या अभिनेत्री को दोहरी भूमिका को, ट्रिक फोटोग्राफी के माध्यम से दर्शाया जाता है।
बहुत सी फिल्मों में तो खलनायक की भी दोहरी भूमिका दर्शाई जाती है।
दोहरी भूमिका में निर्मित फिल्मों की पटकथा लिखने वाले लेखक प्रायः दो सगे भाई या बहनों को किसी कुंभ के मेले में जुदा कर देते है।
खलनायक की दोहरी भूमिका पर निर्मित फ़िल्मों में दो सगे भाइयों में एक शातिर दिमाग़ वाला दर्शाया जाता है,जो अपने शरीफ़ सगे भाई को कैद में रखता है,और कैद में रखे भाई के नाम से सारे गैर कानूनी कार्य बेखौफ होकर करता है।
यह हुई फिल्मों की काल्पनिक कहानियां,हक़ीक़त में भी कुछ लोग दोहरी भूमिका निभाते हैं।
शरीफ़ बनकर बदमाशी करतें हैं।
ऐसे लोग ही शरीफ़ बदमाश कहलाते हैं।
यह लोग हक़ीक़त में खलनायक होते हैं।
इस संदर्भ सन 1956 में जागते रहो फिल्म के इस गीत का स्मरण होता है। गीत लिखा है गीतकार प्रेम धवन ने।
गीत की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है।
ऐवें दुनिया देवे दुहाई झूठा पांवदी शोर
अपने दिल ते पूछ के देखो कौन नहीं है चोर
ते कि मैं झूठ बोलया कोई ना
हक़ दूजे दा मार-मार के बणदे लोग अमीर
सच्चे फाँसी चढ़दे वेखे झूठा मौज उड़ाए
“स्पष्टीकरण अनिवार्य है। उपर्युक्त गीत,सन 1956 में प्रदर्शित फिल्म जागते रहो के लिए गीतकार प्रेम धवन ने लिखा है।
लेखक ने गीत की कुछ पंक्तियां सिर्फ उद्धृत की है।”
फिल्मों जो कलाकार खलनायक का अभिनय करते हैं,उन्हे व्यवहारिक जीवन में चरित्र अभिनेता कहा जाता है।
वाह क्या बात है,खलनायक और चरित्र अभिनेता?
फिल्मों में खलनायक का मेकअप बहुत डरावना,आमजन के लिए खौफ पैदा करने वाला किया जाता है।
खलनायक की मंडली में जो सहायक भूमिका निभाने वालें कलाकर होते हैं,उनमें से अधिकांश का मेकअप खौफ पैदा करने वाला किया जाता हैं।
इसमें से कुछ के चेहरों पर जले,कटे कृत्रिम निशान दर्शाए जातें हैं।
फिल्मों में लड़ाई भी नकली ही दर्शाई जाती है।
अहम प्रश्न लोकतांत्रिक देश में फिल्मों की पटकथा लिखने वाले लेखक,तानाशाह को महिमा मंडित करने वाली ही कहानियां क्यों लिखते हैं?
फिल्म निर्माता भी द्वारा ऐसी ही कहानियां क्यों लिखवाते है?
फिल्म निर्माण सांस्कृतिक मोर्चे का एक भाग है।
फिल्मों में पुलिस के अधिकारियों को असहाय दर्शाना या भ्रष्ट दर्शाना,कानून व्यवस्था का मज़ाक उड़ाना नहीं है?क्या यह भारतीय संस्कृति पर गंभीर प्रश्न नहीं है?
ऐसी फिल्मों को फिल्मी भाषा में फॉर्मूला फिल्म कहते हैं।
देश -काल और परिस्थिति का नियम फ़िल्मों की निर्मिति में लागू नहीं होता है।
सिर्फ वेशभूषा में आधुनिकता दर्शाई जाती है।
फिल्मों की पटकथा में वही गरीबों का शोषण,किसानों पर क्रूरता,लोगों का उत्पीड़न,स्त्रियों पर अत्याचार आदि।
फिल्मों में गरीबों का मसीहा बनकर कोई एक शहंशाह आता है?
वास्तविक जीवन में कब आएगा?
अंत में शायर आसिम वास्ती रचित शेर मौंजू हैं।
मेरे ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मेरा ए’तिबार मत करना

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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