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*डॉ लोहिया थे गांधीवादी लेकिन उनके विचारों में उग्रता थी*

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(12 अक्टूबर जयंती के अवसर पर)

प्रकाश गावन्दे

भारत में समाजवादी विचारधारा को एक आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करने तथा उसे प्रभावी रीति से प्रचारित करने वाले चितकों में डॉ राममनोहर लोहिया का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। वे एक गांधीवादी चिन्तक राजनीतिक इतिहासकार, अर्थशास्त्री दार्शनिक तथा विख्यात लेखक थे। जीवन के प्रायः सभी पक्षों पर उन्होने गहन चिन्तन किया तथा भारतीय परिस्थितियों में इसे व्यावहारिक बनाने के उपायों का सफलतापूर्वक आजीवन अन्वेषण किया।

डॉ लोहिया गांधीवादी थे लेकिन उनके विचारों में उग्रता थी। वे क्रान्तिकारी थे लेकिन उनके विचारों में असाधारण रचनात्मकता थी। वे एक विख्यात एवं सक्रिय राजनीतझ थे, किन्तु उनकी शैली एवं कार्यों में सिद्धान्तों के प्रति असाधारण लगाव था। उन्होने समाजवाद के महान उददेश्यों की भारतीय संदर्भों में व्याख्या की तथा उसे व्यावहारिक बनाया। डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या जनपद में (वर्तमान-अम्बेडकर नगर जनपद) अकबरपुर नामक स्थान में हुआ था। उनके पिताजी गाँधीजी के अनुयायी थे। जब वे गांधीजी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। इसके कारण गांधीजी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए। डॉ. लोहिया के सामाजिक एवं राजनीतिक विचार डॉ. लोहिया के विचारों पर कार्ल माक्र्स एवं महात्मा गाँधी दोनों के विचारों का असाधारण प्रभाव परिलक्षित होता है। उन्होने इनमें अवभुत समन्वय स्थापित किया तथा इनके श्रेष्ठतम तत्यों को समाहित करते हुए नवीन विचारों का विकास किया। जाति और वर्षों में संघर्ष की मारणा डॉ लोहिया के अनुसार इतिहास में जाति और वर्गों में संघर्ष होता रहता है। इसी से इतिहास को गति मिलती है। जातियों का रूप सुनिश्चित होता है किन्तु वर्गों की आन्तरिक रचना शिथिल होती हैं। इन दोनों के बीच घड़ी के पेन्डुलम के समान आन्तरिक क्रियाएं होती रहती है। इन्ही से इतिहास को गति मिलती है। डॉ. लोहिया के अनुसार जातियों में सामान्यतः गतिहीनता और निष्क्रियता पाई जाती है। जब कि वर्ग सामाजिक गतिशीलता की प्रचण्ड शक्तियों के प्रतिनिधि होते हैं। वर्ग संगठित होकर जातियों का रूप धारण कर लेते है। और जातियों वर्गों में परिणत हो जाती है। मानव जाति का अब तक का इतिहास जातियों ओर वर्गों के बीच आंतरिक संघर्षो का इतिहास है।

डॉ. लोहिया का विचार था कि एशियाई राष्ट्रों की अपनी विशिष्ट समस्याएँ है. इन्हें एशियाई तरीकों से ही हल किया जाना चाहियें। उनका कथन था किष् एशिया में जहाँ आर्थिक समस्याएँ मुह बाये खड़ी हैं पश्चिमी ढंग का समाजवादी प्रजातंत्र कवापि उपयोगी नहीं हो सकता। एशिया के लोग रोटी के लिए अपने प्रजातांन्त्रिक अधिकारों को बेचने के लिए सरलता ये तैयार हो जायेगें। परम्परागत तरीके से सोचने पर रोटी की समस्या के समाधान हेतु हमें पूंजीवादी अथवा साम्यवादी अर्थव्यवस्था की स्थापना ही अनिवार्य दिखाई देने लगती है किन्तु वोनों की अर्थव्यवस्था एक जैसी ही है। दोनों में अंतर केवल इतना है कि पूंजीवाद यदि निजी सम्पति को प्रोत्साहन देता है तो साम्यवाद सार्वजनिक सम्पति को।

पूंजी एवं सत्ता का केन्द्रीकरण दोनों में समान रूप से है। आर्थिक विक्रेन्दीकरण अन्ततः बेकारी को बढ़ा देता है। डॉ. लोहिया मानते थे कि युरोप का मशीनी समाजवाद एशिया के देशों के लिए उपयुक्त नहीं हैं, क्योकि यहाँ गरीबी अधिक है। उनका कथन था कि परम्परागत आर्थिक विकेन्द्रीकरण से एशिया की गरीबी दूर नहीं हो सकती है। यहाँ बड़ी मशीनों के स्थान पर गांधी जी के विचारों का अनुसरण करते हुए छोटी-छोटी मशीनों का प्रयोग करना चाहिये। इस प्रकार कुटीर उद्योगों में धन भी कम लगेगा तथा बेकारी भी घटेगी।

डॉ लोहिया सहकारी कृषि को प्रोत्साहित करने के पक्ष में थे। वे पाश्चात्य समाजवाद को संवैधानिक एवं विकासवादी निरूपित करतें हुए उसे एशिया के लिए अनुपयोगी मानते थे। उनके अनुसार प्रशासन का प्रजातंत्रीकरण करके कम पूंजी से लगने वाली छोटी मशीनों को लगाकर, सम्पति का समाजीकरण करके एवं आर्थिक तथा राजनीतिक समाजीकरण करके एशियाई समाजवाद के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

डॉ. लोहिया कार्ल माक्र्स के विचारों से सहमत थे किन्तु वे साम्यवादियों से सहमत नहीं थे। वे साम्यवादियों के भूमि के पुनर्विभाजन को एक मजाक तथा निरर्थक क्रूरता मानतें थे। वे इसलिए भी साम्यवादियों से सहमत नहीं हो पाते थे क्योकि व्यवहार में साम्यवादी आर्थिक दरिद्रता को अस्त्र बनाकर राज्य के विरूद्ध विद्रोह करा देते है, अथवा उस पर अनुचित दबाव डालतें है। साम्यवादियों की पूँजीवाद की व्याख्या उन्हें स्वीकार्य न थी। वे वर्ग संघर्ष की साम्यवादी पद्धति को भी अनैतिक मानते थे।

धर्म एवं राजनीति के समन्वय पर बल डॉ. लोहिया कहा करते थे कि राजनीति के बिना धर्म निष्प्राण हो जाता है तथा धर्म के बिना राजनीति कलही बन जाती है। वे धर्म को दीर्घकालीन राजनीति तथा राजनीति को अल्पकालीन धर्म कहते थे। सप्त क्रांति का सिद्धांत डॉ. लोहिया अनुभव करते थे कि किसी एक जुट कार्यक्रम के अभाव में भारत में प्रतिपक्षी दल आपस में लड़ते रहते है।

इसका लाभ सत्तारूढ़ दल को अनायास ही प्राप्त हो जाता है। उन्होने समाजवाद के सार्वभौम सात सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप देने की बात कही थी।

1. स्त्री पुरूष समानता को स्वीकृति,

2. जति सम्बन्धी तथा जन्म सम्बन्धी असमानता की समाप्ति,

3. रंगभेव पर आधारित असमानता की समाप्ति,

4. विदेशियों द्वारा दमन की समाप्ति तथा विश्व सरकार का निर्माण।

6. व्यक्तिगत सम्पति पर आधारित आर्थिक असमानताओं का विरोध तथा उत्पादन में योजनाबद्य वृद्धि।

7. व्यक्तिगत अधिकारों के अतिक्रमण का विरोध,

8. युद्ध के शस्त्रों का विरोध तथा सविनय अवज्ञा सिद्धांत को स्वीकृति।

विश्व संसद का समर्थन डॉ. लोहिया नें वैश्यिक समस्याओं को सुलझाने के लिये विश्व संसद का समर्थन किया था। वे चाहते थे कि व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई विश्व पंचायत की स्थापना होनी चाहिये। इस पंचायत को समस्त राज्यों के युद्ध बजट का एक चैथाई अथवा पांचवा हिस्सा प्राप्त होना चाहिये। वे मानते थे कि सत्याग्रह के द्वारा भी विश्व पंचायत की स्थापना संभव है। निरंकुश शासन का विशेष डॉ. लोहिया को निरंकुश शासन स्वीकार्य नहीं था। वे आर्थिक एवं राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के समर्थक थे। वे आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता को राज्य प्रांत, जिला तथा ग्राम स्तर पर बांटकर चैखम्बा राज्य की स्थापना करना चाहते थे।

भारत-विभाजन पर लोहिया के विचार उस समय की तमाम ऐसी घटनाओं और स्थितियों का जिनके प्रति एक आम भारतीय नागरिक के मन में बहुत स्पष्ट और तार्किक व्याख्या नहीं है, लोहिया ने अपनी पुस्तक गिल्टी मैन एंड इंडियाज पार्टीशन (भारत विभाजन के गुनहगार) में परद दर परत रहस्यों को खोला है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि उस समय के पूरे आंखों देखे इतिहास को ही नहीं, बल्कि उसके एक सक्रिय, जीवंत पात्र रहे लोहिया की बातों को आजाद भारत में सत्तारूढ़ दल द्वारा एक विपक्षी नेता की ‘खीडा’ से ज्यादा नहीं समझने दिया गया, जबकि सच्चाई यह है कि सत्ता हस्तांतरण के खेल की असलियत संग्रहालयों में दफन दस्तावेजों से ज्यादा लोहिया जैसे नेताओं को भी मालूम थी जिसे होते हुए उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। निष्कर्ष डॉ. राममनोहर लोहिया पर मार्क्सवाद एवं गाँधीवाद दोनों का बहुत गहरा प्रभाव था।

उन्होने अपनी निराली शैली में इन दोनों महान विचारधाराओं के प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या की तथा उनमें समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। मुक्त चिन्तन, निर्भीकता मौलिकता और अनूठा समन्वयवाद उनके व्यक्तित्व की सहज विशेषताऐं थी। इन्ही के आधार पर उन्होने एक नई समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न देखा था। उन्होने आधुनिक सभ्यता को स्वीकार किया किन्तु उसमें भी सुधार करते हुए उसे और अधिक आधुनिक बनाने का प्रयास किया। डॉ. लोहिया शांतिवादी होते हुए भी प्रबल विद्रोही और महान क्रान्तिकारी थे। आधुनिक भारत को इसी की आवश्यकता है।

1. व्हील ऑफ हिस्ट्री: राम मनोहर लोहिया।

2. संग्रहीत प्रति मूल से 14 नवंबर 2006 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 23 मार्च 2009.

3. लोहिया के विचार

4. डॉ. लोहिया की सप्तक्रांति के उद्देश्य

5. माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म: राम मनोहर लोहिया।

6. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन डॉ. वी.पी.वर्मा

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