अग्नि आलोक

*डॉक्टर लोहिया आज भी प्रासंगिक है,कल भी प्रासंगिक थेऔर हमेशा प्रासंगिक रहेगें*

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* डॉक्टर लोहिया की पुण्य तिथि 12 अक्टूबर पर विशेष लेख*)

*रामबाबू अग्रवाल*

महापुरूषों की स्मृति और मूल्यांकन से ही कोई समाज ऊर्जा ग्रहण कर निखर सकता है.  हालांकि मौजूदा उपभोक्तावादी दौर में इन चीजों के प्रति अनास्था है. ऐसी परिस्थिति में डॉक्टर राममनोहर लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘निराशा के कर्त्तव्य’ ही इस राष्ट्रीय-समाज को नयी राह दिखा सकते हैं।गांधी जी के बाद डॉक्टर राममनोहर लोहिया ही सबसे प्रखर विचारक चिंतक लगते हैं.जो अपनी धरती, मिट्टी, उसकी सुगंध से जुड़े हुए है। आज जब देश विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है तब डॉक्टर लोहिया ही ऐसे विचारक चिंतक हैं जिन की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है तथा भविष्य में भी उनकी प्रासंगिकता बनीरहेगी । लोहिया ने भी गैर कांग्रेसवाद की कल्पना को 1967 में मूर्त रूप में कामयाब होते तो देखा, पर जीवन की सांध्य बेला में निराश और हताश हो गए ।

डा.राम मनोहर लोहिया अक्सर कहा करते थे कि ‘सत्ता सदैव जड़ता की ओर बढ़ती है और निरंतर निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचारों को पनपाती है. विदेशी सत्ता भी यही करती है. अंतर केवल इतना है कि वह विदेशी होती है, इसलिए उसके शोषण के तरीके अलग होते हैं. किंतु जहां तक चरित्र का सवाल है, चाहे विदेशी शासन हो या देशी शासन, दोनों की प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को विकसित करने में व्यक्त होती है’. उन्होंने कहा था कि ‘देशी शासन को निरंतर जागरुक और चौकस बनाना है तो प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों को समझे और जहां कहीं भी उस पर चोट होती हो, या हमले होते हों उसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाए।

 डा. लोहिया की कही बातें वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था पर सटीक बैठती हैं. आज देश में गैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, जातिवाद, क्षेत्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्याएं गहरायी हैं और शासन-सत्ता अपने लक्ष्य से भटका हुआ है तो इसके लिए सरकार की नीतियां और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ही जिम्मेदार है।

डॉ. राम मनोहर लोहिया का समाजवाद मार्क्सवादी और गांधीवादी विचारों का एक अनूठा मिश्रण था, जिसे उन्होंने भारतीय समाज की विशिष्ट समस्याओं के अनुरूप ढाला था। उनका समाजवाद केवल आर्थिक समानता तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और जातिवाद का उन्मूलन भी शामिल था। उनके समाजवादी विचारों के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:

. लोहियावादियों के बारे में वह जुमला ही चल पड़ा कि वे दल तोड़क होते हैं. खंड खंड में बंटने को अभिशप्त, आज  खुद को लोहियावादी माननेवाले कांग्रेस, भाजपा, जनता दल, सजपा, तेलुगु देशम से आइपीएफ तक फैले हैं, अर्थशास्त्रियों के संदर्भ में पुरानी प्रचलित कहावत है, पांच अर्थशास्त्री होंगे, तो छह विचार होंगे. यही हालत उनके अनुयायियों की रही. समाजवादियों का अतीत चाहे जितना भी समृद्ध रहा हो, पर आज उनकी विरासत पर सवाल तो उठते ही हैं. 1942 के प्रखर क्रांतिकारी आज क्या विरासत छोड़ गये हैं? 

विचारक और आंदोलनकारी, राजनीतिज्ञ और सामाजिक, क्रांतिकारी, विद्रोही और परंपराशोधक की अंतविरोधी भूमिकाएं उन्होंने एक साथ निभायी. पूंजीवाद विरोधी, साम्यवाद विरोधी, साथ ही गांधी के व्याख्याकार भी, अधिनायकवाद विरोधी, पर संसदीय प्रणाली की सीमाओं के प्रखर आलोचक, दार्शनिक दृष्टि से उदारवादी, पर कार्यक्रम पर अमल की दृष्टि से उग्रवादी. अपरिमित करूणा और अपार क्रोध, साथ-साथ दबे-पीड़ित, पिछड़े हरिजन, नारी के अधिकार के सवाल परप सात्विक आक्रोश से भरे.

‘महारानी के खिलाफ मेहतरानी’ को खड़ा करने के सामाजिक समता के संकल्प से बद्ध वे खुद को नास्तिक मानते थे. परंतु मनुष्य में विश्वास और उसके कल्याण में घोर आस्था रखनेवाले वह असात्विक थे. समता और समृद्धि पर आधारित नहीं सभ्यता का सपना देखनेवाले. भारतीय इतिहास के यक्ष प्रश्न उन्हें मथते रहे.
भारत के तीर्थस्थल, सारनाथ, अजंता, एलोरा, कोणार्क, खजुराहो, महाबलीपुरम, रामेश्वरम, उर्वशीयम जैसी जगहों उन्हें बार बार खींचती थीं. चित्रकूट के किस रास्ते राम दक्षिण की ओर निकले होंगे. उनकी अभिलाषा रही कि ‘एक बार चित्तौ़ड से द्वारिका पैदल जाऊं जिस रास्ते मीरा गयी थी. चित्तौड़ में जौहर इतिहास को महिमामंडित करने के सवाल के बेचैन इंसान. पासपोर्ट के बिना ध्रुव से ध्रुव तक के सभी देश में यात्रा करने की आकांक्षा से प्रेरित विश्व सभ्यता का सपना देखनेवाले डॉ साहब ने अदभुत कार्यक्रम दिये।

सत्याग्रह, सिविल नाफरमानी, घेरा डालो, दाम बांधो, सप्तक्रांति, नर नारी समता, रंगभेद, चमड़ी सौंदर्य, जाति प्रथा के खिलाफ, मानसिक गुलामी, सांस्कृतिक गुलामी, दामों की लूट, शासक वर्ग की विलासिता, खर्च पर सीमा,पन्द्रह आने बनाम 3 आने, संगठन सरकार के बीच का रिश्ता, जैसे असंख्य सवाल-मुद्दे कार्यक्रम उन्होंने उठाये और लड़े-पहली बार केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. धारा के खिलाफ चलने की राजनीति की परंपरा डाली और अपने निकट के लोगों को सही मुद्दे उठा कर चुनाव हारने के लिए खड़ा किया. उन्हें शानदार हार पर बधाई दी।
 इस भटकती दुनिया, (सिर्फ भारत में नहीं) साम्यवाद और पूंजीवाद के विफल होने के बाद की बेचैन दुनिया को आज सबसे अधिक एक नये विकल्प, नयी सभ्यता और संस्कृति की तलाश है. और इसी कारण आज भी लोहिया बहुत प्रासंगिक है।

(*लेखक इंदौर के वरिष्ठ समाजसेवी और समाजवादी पार्टी  की मध्यप्रदेश इकाई के उपाध्यक्ष  है*)*

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