अग्नि आलोक

डाक्टर राम मनोहर लोहिया एवं राजनारायण संवाद 1952

Share

उमेश प्रसाद सिंह,पटना

 राजनायण जी लिखते है — शरतॠतु की रात थी,बनारस मणिकर्णिका घाट के सामने दूर गंगा में दशाश्वमेघ घाट से चलकर बजड़ा रूक गया। रात के 11 बजे से 03 बजे तक बजड़े की छतपर खुली चाॅदनी में दरी पर बिछे चादर पर दो- चार मसनद थे। 

                 तारों का वर्णन था। सप्तॠषिमंड़ल कहाॅ है ,शुक्र कहाॅ है ,कुम्भ स्पष्ट द्दष्टिगोचर होता है, विषयों की चर्चा थी।देश – विदेश की राजनीति ,धर्म ,समाजशास्त्र ,और दार्शनिक मुद्दों पर  गंभीर विषयों पर विचार विनिमय था; किन्तु लोहिया की द्दष्टि मणिकर्णिका घाट पर गड़ी रहती थी। बीच – बीच में  गाॅधी ,राम ,कृष्ण की चर्चा विचारों को उलझाये रहती थी।सन 1952 के सार्वजनिक निर्वाचन मेः राम के प्रभाव क्षेत्र में समाजवादी दल ,कृष्ण के प्रभावक्षेत्र में धर्म – सम्प्रदाय  प्रधान पार्टियाॅ, शंकर के प्रभावक्षेत्र में कम्युनिष्ट पार्टी काॅग्रेस के बाद आयी।प्रश्न का उतर ढ़ूॅढ़ा ही जा रहा था कि बीच में डाक्टर लोहिया बोल उठे — देखो! देखो ,चिता पर घी छोड़ा 

जा रहा है ।मालूम होता है,यह धनी घर का मुर्दा है। पहले जो चिता थी  ,उसमें ऊॅच्ची लहर नहीं उठी थी ,बेचारा किसी गरीब घर का था।अधजले शरीर कोही नदी में फेंक दिया गया। तुम्हारे घर का मुर्दा कहाॅ जलाया जाता है ; राजनारायण? 

                          ” डाक्टर साहब ! हमारे यहाॅ के लोग तो हरिश्चन्द्र घाट पर जलाये जाते हैं ।काशीराज के पारिवारिक लोग । सामने मंच बना है ,उसी के बगल में मालवीय जी की भी चिता लगी थी ,डाक्टर साहब।

                         ” क्या तुम लोगों ने मालवीय जी को जलते देखा था ?”

                      ” हाॅ! ,मैंने काशी विश्वविद्यालय से मालवीय जी के शव को ले चलनेवाली टिकटी के बाॅस से कंधा हटाया ही नहीं ।सडकों पर बहुत भीड़ थी।फूल और माला का बोझ बढ़ता ही जा रहा था,उसको उतार उतारकर हल्का किया जाता था।चन्दन की लकड़ी पर मालवीय जी का शव रखा गया था।कनस्तर का कनस्तर घी ड़ाला गया था।लोहबान ,धूप ,और अन्य सुगंधित डाली गयी थी मालवीय जी के शव को जलाने में बहुत देर नहीं लगी।

                       क्रमश: ।

Exit mobile version