अग्नि आलोक

डॉ राम मनोहर लोहिया ने जातिअंतक छावनी में बड़ी भूमिका निभाई

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चेन्नई कान्फरन्स मे प्रोफे. श्रावण देवरे का भाषण…*

(चेन्नई (तामीळनाडू) में 1 मई22 को नौंवी सामाजिक न्याय परिषद का आयोजन हुआ था। इस परीषद मे निमंत्रित वक्ता प्रोफे. श्रावण देवरे जी का भाषण हुआ। उनके अंग्रेजी भाषण का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।)


परीषदके माननीय अध्यक्ष, सहयोगी वक्तागण, बहने और भाईयो!…….
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मेरे भाषण का टायटल है………
जातिअंत अथवा जाति-पुनर्जीवन?
कांशीरामजीका जाती जोडो पॅटर्न, लोहीयाजीका समाजवादी पॅटर्न और सामी पेरीयारजीका फुलेवादी नॉन-ब्राह्मीण पॅटर्न
ब्राह्मणी अब्राह्मणी सिद्धांत की कसौटी पर —
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दोस्त हो!………
वर्तमान समय यह प्रश्न पूंछ रहा है की, ‘‘जातिव्यवस्था का अंत हो अथवा जातिव्यवस्था का नये उच्चतम स्तर पर पुनर्जीवन?’’ और उत्तर देने की जिम्मेदारी इस देश के वामपंथी कम्युनिस्ट – समाजवादी, प्रगतिशील व फुलेवादी-अंबेडकरवादी आदि के ऊपर है। वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टियों व संगठनों ने जातिव्यवस्था की चुनौती को कभी स्वीकार ही नहीं किया, वे हमेशा जातिअंतक छावनी से हमेशा सुरक्षित दूरी ही रखते आए हैं, इसलिए उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने की जिम्मेदारी वे कभी पूरी कर ही नहीं पायेंगे। समाजवादियों में डॉ राम मनोहर लोहिया ने जातिअंतक छावनी में बड़ी भूमिका निभाई है।

डॉ लोहिया ने तत्कालीन दिग्गज ओबीसी नेता त्यागमूर्ति आर एल चंदापुरी के साथ गठबंधन करके वर्ग संघर्ष व जातिअंतक संघर्ष की एकजुटता का सैद्धांतिक पक्ष सफलतापूर्वक सामने रखा। “पिछड़ा पावे सौ में साठ” यह नारा जातिअंतक लड़ाई का बिगुल ही था। इस संघर्ष से ही 1967 में पहली राजनितिक लड़ाई यशस्वी हो सकी। समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पहले ओबीसी मुख्यमंत्री राम नरेश यादव बने। 1970 में कर्पूरी ठाकुर दूसरे ओबीसी मुख्यमंत्री बिहार में हुए। नेहरू ने 1955 में कालेलकर कमीशन की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल कर ओबीसी के नेतृत्व में संभावित जातिअंतक लड़ाई को दबा देने का प्रयास किया, किन्तु लोहिया ने त्यागमूर्ति आर एल चंदापुरी से गठबंधन करके ओबीसी के नेतृत्व में जाति अंतक लड़ाई को आगे बढ़ाया। इसी लड़ाई से आगे चलकर लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे ओबीसी नेता तैयार हुए जिन्होंने मंडल युग को प्रत्यक्ष में उतारकर देश में ‘ओबीसी केन्द्रित’ राजनीति का नेतृत्व किया।

किन्तु मंडल आयोग के युग का अवतरण होते समय उसका विरोध करनेवाली ब्राह्मणी प्रतिक्रांतिकारी छावनी ने राममंदिर का सांस्कृतिक संघर्ष खड़ा कर दिया। इस सांस्कृतिक संघर्ष का समाजवादी ओबीसी नेता मुकाबला नहीं कर सके, क्योंकि लोहिया खुद राम-कृष्ण के भक्त थे। केवल सामाजिक व राजनीतिक संघर्षों से अवतरित मंडल युग, बिना सांस्कृतिक संघर्ष के कारण कमजोर पिलर पर खड़ा था, जिसका भरपूर फायदा ब्राह्मणी छावनी ने उठाया और 2014 में प्रतिक्रांति हो गई। सामाजिक व राजनीतिक संघर्ष जितनी जल्दी यशस्वी होते हैं, उतनी ही जल्दी असफल भी हो जाते हैं। सांस्कृतिक संघर्ष लंबा होता है, परन्तु अपनी छावनी को मजबूत बनाता है एवं सामाजिक – राजनीतिक लड़ाई का मार्ग सुगम बनाता है।

उत्तर भारत में इस प्रकार का प्रतिसांस्कृतिक संघर्ष खड़ा करने की जिम्मेदारी मान्यवर कांशीराम साहेब की थी, क्योंकि वे खुद को फुले- अंबेडकर वादी मानते थे। राम- कृष्ण इन ब्राह्मणी प्रतीकों के विरोध में संघर्ष करने के लिए फुले – अंबेडकर ने बलीराजा, शंबूक, कर्ण, एकलव्य जैसे महान प्रतीक दिया है। उत्तर भारत में दिल्ली लखनऊ के बीच वे ऐसे अब्राह्मणी प्रतीकों का जुलूस निकाल सकते थे, जिससे राम के नाम पर बहुजनों के एकतरफा हो रहे ब्राह्मणीकरण को कुछ हद तक रोका जा सकता था। परन्तु कांशीराम साहेब न फुले वादी थे न अंबेडकर वादी। सिर्फ दो तीन जातियों का गठजोड़ तैयार करके राजनीतिक सत्ता हासिल करना, इतना ही उनका उद्देश्य था। उसके लिए उन्होने कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, तो कभी सीधे सीधे ब्राह्मण जाति से एकतरफा दोस्ती किया, जिसका परिणाम आज हम देख ही रहे हैं।

उस समय में हम लोगों ने अपने शक्तिनुसार महाराष्ट्र के धुले – नंदूरबार जिलों में ऐसा प्रयास किया था। सुप्रसिद्ध प्राच्यविद्या पंडित कॉ. शरद पाटील के सत्यशोधक कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में धुले शहर से सीता, शंबूक, एकलव्य के प्रतीकों का जुलूस निकाला व उनके जय जयकार के नारे भी लगाए।

जातिअंत के लिए सांस्कृतिक संघर्ष का सिद्धांत सर्वप्रथम तात्यासाहब महात्मा जोतीराव फुले ने दिया। बलीराजा के पतन के बाद का इस देश का इतिहास ब्राह्मणी – अब्राह्मणी संघर्ष का इतिहास है, यह उन्होंने ऐतिहासिक भौतिकवाद का विवरण देकर सिद्ध भी किया। उसके लिए उन्होने दशावतार का वैज्ञानिक विश्लेषण किया। राम के विरोध में शंबूक -रावण, कृष्ण के विरोध में कर्ण- एकलव्य इस सांस्कृतिक संघर्ष का वर्णन किया। 5000 वर्षों से ब्राह्मणी छावनी ऐसे ही सतत सांस्कृतिक संघर्षों से विजयी होती आई है। और अब्राह्मणी छावनी इसी सांस्कृतिक संघर्ष के अभाव में पराभूत जीवन जीती आई है।

मात्र तमिलनाडु इसका अपवाद है, रामास्वामी पेरियार के नेतृत्व में 1924 से शुरू हुआ सांस्कृतिक आंदोलन 1967 में राजनीतिक क्रांति में यशस्वी रूप में परिवर्तित हुआ। 1967 में तमिलनाडु में पहले ओबीसी मुख्यमंत्री अण्णा दुराई हुए। वहां से आरक्षण की सीमा बढ़ती गई एवं 69% तक पहुंच गई। आरक्षण टिकाए रखने के लिए पहला संविधान संशोधन 1951 में करवाना व मिले हुए आरक्षण को नौंवी अनुसूची में डलवाना ये दो क्रांतिकारी घटनाएं केवल तमिलनाडु के कारण ही संभव हो सकीं। क्योंकि तमिलनाडु लंबे सांस्कृतिक संघर्ष में “अब्राह्मणी राष्ट्र” के रूप में सिद्ध हुआ है। स्वामी पेरियारने जोतीराव फुले को पढ़ा था या नहीं यह तो नहीं मालूम लेकिन उन्होंने फुलेवाद को निरीश्वरवाद की झालर लगाकर ब्राह्मणी – अब्राह्मणी वाद को वृहद रूप में प्रस्तुत किया।

महाराष्ट्र को ‘अब्राह्मणी राष्ट्र’ बनाने में फुले के अनुयाई सफल नहीं हो सके क्योंकि वे ऐन वक्त पर गांधीवाद के झांसे में आकर कांग्रेसी ब्राह्मणवाद के शरण में चले गए। किन्तु उसी समय में स्वामी पेरियार ब्राह्मणी कांग्रेस को लात मारकर बाहर आते हैं और ब्राह्मणी संस्कृति के विरोध में युद्ध छेड़ देते हैं, परिणामस्वरूप तमिलनाडु (मद्रास) प्रांत यह ‘अब्राह्मणी राष्ट्र’ बनता है। ब्राह्मणों का पहला व अंतिम अड्डा मंदिर होता है। इस अड्डे से ब्राह्मणों की हकालपट्टी करनेवाला तमिलनाडु देश का एकमात्र राज्य है , इसी एक सबूत के आधार पर ही यह सिद्ध होता है कि तमिलनाडु ‘अब्राह्मणी राष्ट्र’ है।

किन्तु इसका अर्थ यह कतई नहीं कि तमिलनाडु में जाति व्यवस्था नष्ट हो चुकी है। भारत में जाति व्यवस्था को कायम रखकर अकेले तमिलनाडु से जाति व्यवस्था नष्ट करना संभव ही नहीं है। उसके लिए तमिलनाडु के ओबीसी नेतृत्व को देश स्तर पर जातिअंतक लड़ाई का नेतृत्व करना होगा। तमिलनाडु के ओबीसी नेतृत्व को देशव्यापी कृति कार्यक्रम ताबड़तोड़ हाथ में लेना होगा।

1) उत्तर भारत में ब्राह्मण वाद ने पूरी तरह से कब्जा किया हुआ है, तो भी दक्षिण के राज्यों में अभी भी ‘ अब्राह्मणवाद’ थोड़ा कम ज्यादा मात्रा में जीवित है। उसे पूरी ताकत से खड़ा करने के लिए तमिलनाडु के ओबीसी नेतृत्व में ” सीता, शंबूक,रावण व बलीराजा गौरव यात्रा” दक्षिण के राज्यों से निकलनी चाहिए।
2) तमिलनाडु में स्वामी पेरियार के विचारों – कार्यों पर आधारित पुस्तकों का देश की सभी भाषाओं में अनुवाद करके सभी राज्यों में भेजने चाहिए।
3) हम लोग 27 वर्षों से ‘फुले- अंबेडकर विद्यापीठ’ स्थापित करके महाराष्ट्र में प्रगतिशील पुस्तकों पर परीक्षा का आयोजन करते हैं। उसी तरह ” स्वामी पेरियार फुले अंबेडकर विद्यापीठ” की स्थापना करके देश भर में विभिन्न भाषाओं में राज्यस्तरीय परीक्षा आयोजित हो, तो युवा पीढ़ी को स्वामी पेरियार के विचारों व कार्यों की जानकारी होगी।
4) प्रत्येक राज्य में कुछ ओबीसी कार्यकर्ता प्रमाणिक रूप से कार्य कर रहे हैं, किन्तु भिन्न भिन्न पार्टियों के ओबीसी नेताओं की तरफ से उनके कार्य में बाधाएं उत्पन्न की जाती हैं, ऐसे कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देने के लिए तमिलनाडु सरकार को उन्हें गौरवान्वित करना चाहिए और उनके साथ खड़े रहना चाहिए।
5) प्रत्येक राज्य के ऐसे प्रमाणिक कार्यकर्ताओं को साथ लेकर देश स्तर पर ओबीसी के नेतृत्व में नई “अब्राह्मणी पार्टी” बनाई जा सकती है।
6) हिंदी भाषा के अभाव में तमिलनाडु देश से कटा हुआ है, अब हिंदी भाषा का सदुपयोग करते हुए तमिलनाडु देश से खुद को जोड़े और जातिअंतक अब्राह्मणी क्रांति करे।
उपरोक्त कृति कार्यक्रम ताबड़तोड़ हाथ में लेकर देश स्तर पर जातिअंत आंदोलन का नेतृत्व करे और देश में सही अर्थों में समतावादी “बलीराष्ट्र” स्थापित करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़े! * धन्यवाद!

वक्ता – प्रोफे. श्रावण देवरे,
नाशिक, महाराष्ट्र.
*संपर्क – 94227 88546 / 88 301 27 270

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