
जूली सचदेवा
द्रौपदी नग्न की गयी।
नग्न की गयी ;
हुई नहीं — यह दूसरी बात है।
करने वाले ने कोई कोर-कसर न छोड़ी थी।
करने वालों ने सारी ताकत लगा दी थी।
लेकिन फल आया नहीं,
किये हुए के अनुकूल
नहीं आया फल—
यह दूसरी बात है।
असल में,
जो द्रौपदी को नग्न करना चाहते थे,
उन्होंने ख्याल रख छोड़ा था।
उनकी तरफ से कोई कोर कसर न थी।
लेकिन हम सभी कर्म करने वालों को,
अज्ञात भी बीच में उतर आता है।
इसका कभी कोई पता नहीं है।
वह जो कृष्ण की कथा है,
वह अज्ञात के उतरने की कथा है।
अज्ञात के हाथ है,
जो हमें दिखायी नहीं पड़ते।
हम ही नहीं है इस पृथ्वी पर।
मैं अकेली नहीं हूँ.
मेरी अकेली आकाँक्षा नहीं है।
अनन्त आकाँक्षा है।
और अनन्त की भी आकाँक्षा है।
और उन सब के गणित पर
अन्तत: तय होता है कि
क्या हुआ।
अकेला दुर्योधन ही नहीं है नग्न करने में,
द्रौपदी भी तो है जो नग्न की जा रही है।
द्रौपदी की भी तो चेतना है,
द्रौपदी का भी तो अस्तित्व है।
और अन्याय होगा यह कि
द्रौपदी वस्तु की तरह प्रयोग की जाए।
उसके पास भी चेतना है और व्यक्तिव है,
उसके पास भी सङ्कल्प है।
साधारण स्त्री नहीं है द्रौपदी।
सच तो यह है कि
द्रौपदी के मुकाबले की स्त्री
पूरे विश्व के इतिहास में दूसरी नहीं है.
कठिन लगेगी बात।
क्यों कि याद आती है सीता की,
याद आती सावित्री की,
याद आती है सुलोचना की और
बहुत यादें हैं।
फिर भी मैं कहती हूँ~
द्रौपदी का कोई मुकाबला ही नहीं है।
द्रौपदी बहुत ही अद्वितीय है।
उसमें सीता की मिठास तो है ही,
उसमें क्लियोपैट्रा का नमक भी है।
उसमें क्लियोपैट्रा का सौंदर्य तो है ही,
उस में गार्गी का तर्क भी है।
असल में पूरे महाभारत की धुरी द्रौपदी है।
यह सारा युद्ध उसके आस पास हुआ है।
लेकिन चूँकि पुरूष कथाएँ लिखते हैं।
इसलिए कथाओं में
पुरूष-पात्र बहुत उभर कर दिखायी पड़ते हैं।
असल में दुनिया की कोई महाकथा
स्त्री की धुरी के बिना नहीं चलती है।
सब महाकथाएँ स्त्री की धुरी पर घटित होती हैं।
वह बड़ी रामायण सीता की धुरी पर घटित हुई है।
राम और रावण तो ट्रायङ्गल के दो छोर हैं,
धुरी तो सीता है।
ये कौरव और पाण्डव और
यह सारा महाभारत और
यह सारा युद्ध द्रौपदी की धुरी पर घटा है।
उस युग की और
सारे युगों की सुन्दरतम् स्त्री है वह।
नहीं आश्चर्य नहीं है कि
दुर्योधन ने भी उसे चाहा हो।
असल में उस युग में कौन पुरूष होगा
जिसने उसे न चाहा हो।
उसका अस्तित्व,
उसके प्रति चाह पैदा करने वाला था।
दुर्योधन ने भी उसे चाहा हे और
वह चली गयी अर्जुन के पास।
और वह भी बड़े मजे की बात है कि
द्रौपदी को पाँच भाइयों में
जो भी ले आये हो वह पाँचों भाई बाँट लो।
लेकिन इतनी सरल घटना हो नहीं सकती।
क्योंकि जब बाद में माँ को भी तो पता चला होगा।
कि यह मामला वस्तु का नहीं,
स्त्री का है।
यह कैसे बाँटी जा सकती है।
तो कौन सी कठिनाई थी कि
कुन्ती कह देतीं कि भूल हुई।
मुझे क्या पता था कि
तूम पत्नी ले आये हो।
लेकिन मैं जानती हूँ कि
जो सङ्घर्ष दुर्योधन और अर्जुन के बीच होता,
वह सङ्घर्ष पाँच भाइयों के बीच भी हो सकता था।
द्रौपदी ऐसी थी,
वे पाँच भी कट-मर सकते थे उसके लिए।
उसे बाँट देना ही सुगमतम् राजनीति थी।
वह घर भी कट सकता था।
वह महायुद्ध जो पीछे कौरवों-पाण्डवों में हुआ,
वह पाण्डवों-पाण्डवों में भी हो सकता था।
इसलिए कहानी मेरे लिए इतनी सरल नहीं है।
कहानी बहुत है और गहरी है।
वह यह खबर देती है कि
स्त्री वह ऐसा थी कि
पाँच भाई भी लड़ सकते थे।
इतनी गुणी थी।
साधारण नहीं थी।
असाधारण थी।
उसको नग्न करना
आसान बात नहीं थी।
आग से खेलना था।
तो अकेला दुर्योधन नहीं है कि
नग्न कर ले।
द्रौपदी भी है।
और ध्यान रहे,
बहुत बातें हैं इस में,
जो खयाल में ले लेने जैसी है।
जब तक कोई स्त्री स्वय नग्न न होना चाहे,
तक इस जगत में कोई पुरूष
किसी स्त्री को नग्न नहीं कर सकता है,
न हीं कर पाता है।
वस्त्र उतार भी ले,
तो भी नग्न नहीं कर सकता है।
नग्न होना बड़ी घटना है।
वस्त्र उतरने से
निर्वस्त्र होने से
नग्न होना
बहुत भिन्न घटना है।
निर्वस्त्र करना बहुत कठिन बात नहीं है,
कोई भी कर सकता है,
लेकिन नग्न करना बहुत दूसरी बात है।
नग्न तो कोई स्त्री तभी होती है,
जब वह किसी के प्रति खुलती है स्वयं।
अन्यथा नहीं होती ;
वह ढँकी ही रह जाती है।
उसके वस्त्र छीने जा सकते हैं।
लेकिन वस्त्र छीनना स्त्री को नग्न करना नहीं है।
और बात यह भी है कि
द्रौपदी जैसी स्त्रीं को नहीं पा सकता दुयोर्धन।
उसके व्यंग तीखे पड़ गये उसके मन पर।
बड़ा हारा हुआ है।
हारे हुए व्यक्ति –
जैसे कि क्रोध में आये हुईं बिल्लियाँ
ख़म्भे नोचने लगती हैं।
वैसा करने लगती हैं।
और स्त्री के सामने जब भी पुरूष हारता है —
और इससे बड़ी हार पुरूष को कभी नहीं होती।
पुरूष से लड़ ले,
हार जीत होती है।
लेकिन पुरूष जब स्त्री से हारता है।
किसी भी क्षण में तो इससे बड़ी हार नहीं होती है।
तो दुर्योधन उस दिन
उसे नग्न करने का जितना आयोजन कर के बैठा है,
वह सारा आयोजन भी हारे हुए पुरूष मन का है।
और उस तरफ जो स्त्री खड़ी है हँसने वाली,
वह कोई साधारण स्त्री नहीं है।
उसका भी अपना सङ्कल्प है अपना विल है।
उसकी भी अपनी सामर्थ्य है ;
उसकी भी अपनी श्रद्धा है ;
उसका भी अपना होना है।
उसकी उस श्रद्धा में वह जो कथा है,
वह कथा तो काव्य है कि
कृष्ण उसकी साड़ी को बढ़ाये चले जाते हैं।
लेकिन मतलब सिर्फ इतना है कि
जिसके पास अपना सङ्कल्प है,
उसे परमात्मा का सारा सङ्कल्प
तत्काल उपलब्ध हो जाता है।
तो अगर परमात्मा के हाथ उसे मिल जाते बैन,
तो कोई आश्चर्य नहीं।
तो मैंने कहा,
और मैं फिर कहता हूँ,
द्रौपदी नग्न की गयी,
लेकिन हुई नहीं।
नग्न करना बहुत आसान है,
उसका हो जाना बहुत और बात है।
बीच में अज्ञात विधि आ गयी,
बीच में अज्ञात कारण आ गय।
दुर्योधन ने जो चाहा,
वह हुआ नहीं।
कर्म का अधिकार था,
फल का अधिकार नहीं था।
यह द्रौपदी बहुत अनूठी है।
यह पूरा युद्ध हो गया।
भीष्म पड़े हैं शय्या पर —
बाणों की शय्या पर —
और कृष्ण कहते हैं पाणडवों को कि
पूछ लो धर्म का राज,
और वह द्रौपदी हँसती है।
उसकी हँसी पूरे महाभारत पर छायी है।
वह हँसती है कि
इनसे पूछते हैं धर्म का रहस्य,
जब मैं नग्न की जा रही थी,
तब ये सिर झुकाये बैठे थे।
उसका व्यंग गहरा है।
वह स्त्री बहुत असाधारण है।
काश,
हिन्दुस्तान की स्त्रियों ने
सीता को आदर्श न बना कर
द्रौपदी को आदर्श बनाया होता तो
हिन्दुस्तान की स्त्री की शान और होती।
लेकिन नही,
द्रौपदी खो गयी है।
उसका कोई पता नहीं है।
खो गयी।
एक तो पाँच पतियों की पत्नी है।
इसलिए मन को पीड़ा होती है।
लेकिन एक पति की पत्नी होना भी
कितना मुश्किकल है,
उसका पता नहीं है।
और जो पाँच पतियों को निभा सकती है,
वह साधारण स्त्री नहीं है।
असाधारण है,
सुपरवुमन है।
सीता भी अतिमानवीय हैं लेकिन
ट्रू वुमन के अर्थों में।
और द्रौपदी भी अतिमानवीय है,
लेकिन सुपर ह्यूमन के अर्थों में।
पूरे भारत के इतिहास में द्रौपदी को
सिर्फ एक आदमी ने ही प्रशंसा दी है।
और एक ऐसे आदमी ने
जो बिलकुल अनपेक्षित है।
पूरे भारत के इतिहास में
डाक्टर राम मनोहर लोहिया और ओशो को छोड़ कर
किसी आदमी ने द्रौपदी को सम्मान नहीं दिया है।
हैरानी की बात है।
पाँच हजार साल के इतिहास में मुझे मिलाकर
सिर्फ़ तीन इंसान हैं
जो द्रौपदी को सीता के ऊपर रखने को तैयार हैं