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लेबर कोड से श्रमजीवी पत्रकारों और अख़बारों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों ने 1955 से मिले सभी लाभ गँवा दिए

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जस्टिस के चंद्रू

21 नवंबर 2025 को अख़बारों ने केंद्र सरकार प्रायोजित पूर्ण पृष्ठ के विज्ञापनों से ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए श्रम सुधारों की घोषणा की, इसे गिग और ऑनलाइन प्लेटफार्म कर्मचारियों के लिए भी नए युग की शुरुआत बताया गया। विडंबना देखिए, इसी के साथ, श्रमजीवी पत्रकारों और अखबारी संस्थानों में कार्यरत अन्य कर्मचारियों ने 1955 से मिले सभी लाभ गँवा दिए। वर्ष 1955 में इनकी सेवा शर्तें और पारिश्रमिक दरें सुरक्षित करने के लिए दो कानून बने थे।

अतीत में, दो राष्ट्रीय श्रम आयोगों ने श्रम क़ानूनों के सुधारों और श्रम विवाद कम करने के सुझाव देने पर काम किया है। न्यायमूर्ति पीबी गजेंद्रगड़कर और न्यायमूर्ति रवींद्र वर्मा क्रमश: पहले (1969) और दूसरे (1982) श्रम आयोगों, ने कई सुझाव दिए जो कागजों पर ही रह गए। इस बीच भारत सरकार श्रम क़ानूनों में, बिना बड़े सुधारों के, छोटे-मोटे बदलाव लाती रही, जो दुनिया में सबसे व्यापक बने रहे।

रवींद्र वर्मा आयोग ने सबसे पहले स्वतंत्र श्रम कानून बनाने और उन्हें संहिताबद्ध करने, सरल बनाने की सिफारिश की थी। इस दौरान अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का दौर आया और श्रम अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, नई निवेश नीति बनने और औद्योगिक उत्पादन में आय बदलावों ने श्रम क़ानूनों को अप्रासंगिक बना दिया। टेक्नोक्रेट अब न्यायिक समर्थन के साथ आउटसोर्स श्रम से काम चलाने लगे और श्रम के आउटसोर्सिंग को न के बराबर सुरक्षा थी।

अखबारी संस्थानों में श्रम नियमन 

अखबारी संस्थानों में मुख्य तौर पर दो किस्म के श्रमिक हैं, पत्रकार और ग़ैर-पत्रकार कर्मचारी जैसे क्लेरिकल स्टाफ और अख़बारों की छपाई तथा वितरण में लगे श्रमिक। जब भारत का पहला श्रम कानून औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (आईडी एक्ट), लाया गया तो इसे समाचार उद्योग पर लागू करना मुश्किल था।

एक तरफ़, कुछ कर्मचारी, श्रमजीवी पत्रकार, आईडी एक्ट के तहत “श्रमिक” की परिभाषा में नहीं आते थे। दूसरी तरफ़ अखबारी संस्थानों के अन्य कार्यों में लगे श्रमिक केंद्र व राज्य सरकारों के बनाये श्रम क़ानूनों में आते थे।

समाचार संस्थानों के प्रेस में मज़बूत श्रमिक यूनियन विभिन्न विवादों के लिए श्रम मशीनरी का इस्तेमाल कर पा रहे थे लेकिन श्रमजीवी पत्रकार अपने हाल पर छोड़ दिए गए थे। उनका वेतनमान कमजोर था और लगभग अख़बारों के सर्कुलेशन पर निर्भर था। इस मुकाम पर, केंद्र सरकार गठित प्रेस आयोग ने श्रमजीवी पत्रकारों के रोज़गार की स्थितियों की पड़ताल की और कानून के ज़रिए उनकी सेवा शर्तों के नियमन और सुधार के सुझाव दिए।

सुझावों में नोटिस की न्यूनतम अवधि, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि, औद्योगिक विवादों का निबटारा, सवेतन अवकाश, कार्य घंटों और न्यूनतम पारिश्रमिक जैसे मुद्दे शामिल थे। आयोग ने उद्योग पर औद्योगिक रोज़गार (स्टैंडिंग ऑर्डर) अधिनियम, 1946 और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1952 लागू करने की भी सिफारिश की।

प्रेस आयोग के सुझावों पर संसद ने श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और विविध प्रावधान अधिनियम, 1955 (संक्षेप में डब्ल्यूजे एक्ट) बनाया। अधिनियम का उद्देश्य श्रमजीवी पत्रकारों और समाचार संस्थानों में अन्य कर्मचारियों की कुछ सेवा शर्तों का नियमन करना था। अधिनियम ने धारा 3 के तहत  “अख़बार”, “अख़बार के कर्मचारी”, “श्रमजीवी पत्रकार” और “ग़ैर पत्रकार कर्मचारी” को परिभाषित किया।

इस कानून के कारण श्रमजीवी पत्रकार आईडी एक्ट के प्रावधानों में भी आ गए। इसके अलावा इसने अधिक छँटनी मुआवज़ा दर और तीन वर्षों की सेवा पर ग्रेच्युटी मुहैया करायी गई। 

अधिनियम ने श्रमजीवी पत्रकारों के कार्य के घंटे और छुट्टियों का भी प्रावधान किया। केंद्र सरकार ने पारिश्रमिक दरें तय करने की शक्तियाँ हासिल किन और पत्रकारों व ग़ैर-पत्रकार कर्मचारियों के लिए पारिश्रमिक तय करने हेतु वेज बोर्ड गठित किया।

इन अधिकारों के अलावा, समाचार संस्थानों को निर्देश दिया गया कि अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तों के संदर्भ में औद्योगिक रोज़गार (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) एक्ट के तहत स्टैंडिंग ऑर्डर बनाए और जहाँ संस्थान के पास 20 से अधिक कर्मचारी हैं, उसे भविष्य निधि अधिनियम के दायरे में लाया गया। 

सुप्रीम कोर्ट ने डब्ल्यूजे एक्ट को क्यों बरकरार रखा 

भारत के सबसे बड़े पत्रकार संगठन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के दबाव के कारण केंद्र सरकार ने समाचार संस्थानों के कर्मचारियों का वेतनमान तय करने के लिए वेज बोर्ड का गठन किया। द एक्सप्रेस न्यूज़पेपर्स (प्राइवेट) लिमिटेड और अन्य अख़बारों ने डब्ल्यूजे एक्ट की संवैधानिकता को चुनौती दी। उन्होंने आईडी एक्ट की धारा 5(1)(ए)(iii) के तहत वेज बोर्ड के गठन की सरकार की शक्तियों को भी चुनौती दी।  

1958 में सुप्रीम कोर्ट ने बिना झिझक डब्ल्यूजे एक्ट के प्रावधानों को बरकरार रखा और कहा: 

“अगर समाचार संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों की हालत सुधारने के लिए उपाय करने हैं, तो इसे करने का एकमात्र तरीका यह था कि इस कानून को आम तौर पर प्रेस इंडस्ट्री के मालिकों के खिलाफ लागू किया जाए। इस अधिनियम को समाज कल्याण कानून के तौर पर भी देखें, तो राज्य सभी दूसरे उद्योगों के संबंध में ऐसे ही कानून बनाए बिना कहीं न कहीं शुरुआत कर सकता था और अगर ऐसा इस मामले में किया गया, तो राज्य पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह दूसरों की तुलना में एक इंडस्ट्री के साथ भेदभाव कर रहा है।”

सुप्रीम कोर्ट ने आईडी एक्ट की धारा 5(1)(ए)(iii) को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत गारंटी दिए मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना और इसलिए असंवैधानिक मानते हुए निरस्त करने का निर्णय दिया। 

इस तरह, श्रमजीवी पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को सेवा शर्तों की सुरक्षा के लिए नया श्रम कानून मिला, पर आईडी एक्ट के तहत वेज बोर्ड पाने में वह असफल रहे।

इससे संसद को एक और कानून – श्रमजीवी पत्रकार (पारिश्रमिक की दर निर्धारण) अधिनियम, 1958 बनाना पड़ा। इस अधिनियम का उद्देश्य श्रमजीवी पत्रकारों के संदर्भ में पारिश्रमिक की दरें तय करना था। यह कानून बनने के बाद पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकार कर्मचारियों के लिए कई वेज बोर्ड बने और पिछले सात दशकों में विभिन्न वेज बोर्ड ने आठ अवार्ड लाए। यहाँ तक कि पिछले वेज बोर्ड अवार्ड (मजीठिया वेज बोर्ड अवार्ड) को चुनौती दी गई थी पर सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में उसे बरकरार रखा।

भारत के श्रम क़ानूनों को समेकित करने की प्रक्रिया 

सरकार ने जब नए श्रम कानून समेकित करने और संहिताबद्ध करने का प्रयास किया तो इसने 29 श्रम क़ानूनों को चार संहिताओं में श्रेणीबद्ध किया। पारिश्रमिक संहिता संसद में 2019 में पारित हुई और अन्य तीन संहिताएं भारतीय मज़दूर संघ समेत सभी बड़ी ट्रेड यूनियनों के कड़े विरोध के बीच 2020 में पारित हुईं। इन चारों संहिताओं पर अमल के लिए अधिसूचना जारी करने में ख़ासी देर हुई। 

शुरू में देरी श्रमिक यूनियनों के कड़े विरोध और 2024 के संसदीय चुनावों व बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर हुई। कई राज्य सरकारें भी खुश नहीं थीं और संहिताओं के किर्यान्वयन के लिए आवश्यक नियम बनाने में देरी की।

केंद्र सरकार, जिसने मूल रूप से मसौदा नियम 2020 में अधिसूचित किए थे, एक बार फिर नए मसौदा नियम जारी किए और 30 दिसंबर 2025 को प्रकाशित किए, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले हैं। 

चार संहिताओं में, एक संहिता जिसमें डब्ल्यूजे एक्ट और श्रमजीवी पत्रकार (वेतन दर निर्धारण) अधिनियम समाहित किया गया है, ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020 है। इस संहिता में कारख़ाना अधिनियम, 1948, बागान अधिनयम, 1951, खदान अधिनियम 1952, मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम, 1961, बीड़ी सिगार श्रमिक अधिनियम, 1966 और अनुबंध श्रम (उन्मूलन एवं नियमन) अधिनियम, 1970 समेत तेरह श्रम क़ानूनों को समाहित किया गया है।

यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अलग-अलग उद्योगों में श्रमिकों के विशिष्ट लक्षित समूहों के लिए बनाए अलग-अलग क़ानूनों को डब्ल्यूजे एक्ट के साथ क्लब क्यों किया जा रहा है। 

ओएसएचडब्ल्यू संहिता कैसे श्रमजीवी पत्रकारों के महत्वपूर्ण अधिकार छीनती है 

ओएसएचडब्ल्यू संहिता अधिसूचित किए जाने के साथ 21 नवंबर 2025 से लागू हो गई जबकि इसके मसौदा नियम गैजेट में 30 दिसंबर 2025 को प्रकाशित किए जा सके जिन पर अमल 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी होंगे। तेरह क़ानूनों का एकीकरण चौदह खंडों में 145 धाराओं में किया गया है। 

ओएसएचडब्ल्यू संहिता में धारा 2 (ज़ेडपी), 2(ज़ेडजी), 2 (ज़ेडज़ेडएम) में “अख़बार”, “अखबारी संस्थान” और “श्रमजीवी पत्रकारों” को परिभाषित किया गया है और यह परिभाषा डब्ल्यूजे अधिनियम की धारा 2(बी), 2(डी), और 2(एफ़) के जैसी ही है। ओएसएचडब्ल्यू संहिता में प्रवर्तन अधिकारियों समेत सामान्य प्रावधान पहले दस खंडों में हैं जो 11वें खंड में अनुबंधित श्रम, अन्तर राज्यीय प्रवासी श्रमिक, दृश्य श्रव्य श्रमिक, खदान, बीड़ी, सिगार श्रमिक, निर्माण श्रमिक, कारखानों और बागानों के विभिन्न क़ानूनों को आठ भागों में कवर करती है।

इस तरह, आज की तारीख में, भले श्रमजीवी पत्रकार ओएसएचडब्ल्यू संहिता से कवर हों, लेकिन उन्हें कोई लाभ, फ़ायदा नहीं है।

यह चौंकाने वाला ही है कि श्रमजीवी पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकार कर्मचारियों के संदर्भ में सेवा शर्तों के अधिकार या विशेष क़ानूनों के ज़रिए वेतन दरें तय करने के संदर्भ में कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं।

ओएसएचडब्ल्यू कोड की धारा 143 के तहत डब्ल्यूजे अधिनियम और श्रमजीवी पत्रकार (वेतन दरें निर्धारण) अधिनयम समेत पिछले श्रम क़ानूनों की एक सूची दी गई है जो कि केंद्र सरकार की तरफ़ से ओएसएचडब्ल्यू अधिनियम, 2020 की धारा 1(2) के तहत जारी अधिसूचनाओं की तारीख़ से रद्द माने गए है। केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 तारीख़ निर्धारित की है जिससे कि ओएसएचडब्ल्यू कोड के प्रावधान अमल में आ चुके हैं।

इस तरह, आज की तारीख़ में, श्रमजीवी पत्रकारों और ग़ैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए कोई विशेष कानून नहीं हैं, 1955 के बाद यह स्थिति पहली बार है। हालांकि नई ओएसएचडब्ल्यू संहिता में वह दो कानून समाहित किए जा चुके हैं लेकिन उनके रोज़गार के बारे में वर्तमान संहिता में विशेष प्रावधानों, जो पिछले दो क़ानूनों में थे, शामिल नहीं किए गए हैं।

इस तरह भले आज श्रमजीवी पत्रकार ओएसएचडबली से कवर होते हों लेकिन उन्हें कोई लाभ नहीं हैं।

उदाहरण के लिए, यदि ओएसएचडब्ल्यू की धारा 25 देखी जाये जो कार्य घंटों के संबंध में है, यह सामान्य कार्य घंटों की बात करती है, जो आठ घंटे हैं। धारा 26 साप्ताहिक और प्रतिपूरक छुट्टियों के बारे में बात करती है।

जहाँ अधिकतम घंटे डब्ल्यूजे अधिनियम की धारा 6 जैसे हैं, धारा 6(2) में, जो पत्रकारों को सात दिनों की अवधि में 24 घंटे के अवकाश की अनुमति देता है, सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक की अवधि के बारे में कोई ज़िक्र नहीं है।

इसी तरह, वेतन दरों के रिवीजन के बारे में और औद्योगिक रोज़गार (स्टैंडिंग ऑर्डर) अधिनियम, 1946, और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम, 1952 के लागू होने के बारे में कुछ नहीं है जो कि पिछले क़ानूनों के तहत श्रमजीवी पत्रकारों पर लागू होते थे।पहले जहाँ श्रमजीवी पत्रकार कम वर्षों की अवधि के लिए ग्रेच्युटी पाते थे (जो सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में बरकरार रखी थी) और छँटनी मुआवज़ा भी अधिक था, वर्तमान ओएसएचडब्ल्यू कोड उन्हें ऐसे मिलने वाले लाभ छीन लेता है।

डब्ल्यूजे एक्ट की धारा 5(2) एक महत्वपूर्ण प्रावधान था जहाँ जब एक श्रमजीवी पत्रकार अपने पद से अंतरात्मा की आवाज़ के आधार पर इस्तीफ़ा देता है, फिर भी वह श्रम न्यायालय में केस लड़ सकता है और माना जा सकता है कि अख़बारी संस्थान ऐसा इस्तीफ़ा स्वीकार ना करे। ऐसा अधिकार पत्रकार के कार्य की विशिष्ट प्रकृति के कारण था और यह संपादक समेत सबको हासिल था प्रबंधकीय या प्रशासनिक कार्य करने वाले संपादक को छोड़कर।

ऐसा महत्वपूर्ण अधिकार किसी श्रम कानून में नहीं पाया जाता था और अंतरात्मा वाले पत्रकारों के बचाव के लिए था। ओएसएचडब्ल्यू में यह प्रावधान नहीं है। 

नए ओएसएचडब्ल्यू कोड का असर है कि अखबारी संस्थान फिर उन क़ानूनों से कवर किए जाएँगे जो डब्ल्यूजे अधिनियम और श्रमजीवी पत्रकार (वेतन दरें निर्धारण) अधिनियम, 1958 से पहले लागू थे। कहने का मतलब यह है कि ग़ैर पत्रकार कर्मचारी पूर्व 1955 क़ानूनों के तहत श्रमिक माने जाएंगे लेकिन श्रमजीवी पत्रकार लगभग विकल्पहीन हो गए हैं। इसने पत्रकारों और ग़ैर पत्रकार कर्मचारियों से 70 सालों से मिल रहे लाभ एक झटके में छीन डाले हैं और वह वापस अपनी पुरानी स्थिति में पहुँच गए हैं।

(जस्टिस के चंद्रू (सेवानिवृत्त) का लेख लीफलेट से साभार। अनुवाद : महेश राजपूत। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)

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