अग्नि आलोक

मातृभूमि की रक्षा और राष्ट्र निर्माण को समर्पित प्रत्येक क्षण, प्रत्येक कण

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आजादी के दीवानों ने मातृभूमि को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया
और एक-एक दिन, समय का प्रत्येक क्षण, जीवन का प्रत्येक कण, राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया।
आजादी के आंदोलन में न केवल हर देशवासी को एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया बल्कि

नागरिकों में राष्ट्र के प्रति समर्पण के भाव को और प्रबल भी किया। सुहासिनी गांगुली, अब्बास
तैयबजी, बद्रीदत्त पांडेय और दामोदर स्वरूप सेठ ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा
लेते हुए आजादी के लिए वर्षों तक चले कई आंदोलन में भाग लिया। उनका लंबा वक्त जेल की
सलाखों के पीछे गुजारा। साथ ही, इन स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत में सामूहिक चेतना का भी किया
पुनर्जागरण……

सुहासिनी गांगुली

भारत की आजादी के लिए लगा दिया अपना संपूर्ण जीवन

जन्म : 3 फरवरी 1909, मृत्यु : 23 मार्च 1965

भारतवर्ष की स्वतंत्रता का सपना देखने और इसके लिए अपना संपूर्ण जीवन लगा देने वाली महान
स्वतंत्रता सेनानी सुहासिनी गांगुली का जन्म 3 फरवरी 1909 को अविभाजित बंगाल के खुलना जिले
में हुआ था। उनके पिता का नाम अविनाशचंद्र गांगुली और माता का नाम सरला सुंदरा देवी था।
उन्होंने 1924 में ढाका ईडन स्कूल से अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। बाद में वह मूक और बधिर
बच्चों के एक विशेष विद्यालय में पढ़ाने के लिए कलकत्ता चली गईं। माना जाता है कि वहां रहने के
दौरान वह प्रीतिलता वाड्डेदार और कमला दास गुप्ता के संपर्क में आईं जिन्होंने उन्हें जुगांतर
क्रांतिकारी समूह का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया। जुगांतर समूह में शामिल होने के बाद
उन्होंने ‘छात्री संघ’ नामक एक संगठन के लिए भी काम करना शुरू कर दिया।
इसी दौरान समान विचारधारा और भारत की स्वतंत्रता की इच्छा रखने वाले लोगों से उनका परिचय
हुआ। इस बीच सुहासिनी गांगुली की सक्रियता के कारण अंग्रेज उन पर कड़ी नजर रखने लगे थे।
ऐसे में उनके लिए कलकत्ता से बाहर काम करना बहुत मुश्किल हो गया था। चटगांव विद्रोह के बाद
जुगांतर पार्टी के कई सदस्यों को छिपने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसे में सुहासिनी गांगुली को भी
गिरफ्तारी के डर से चंदननगर में शरण लेनी पड़ी, जो फ्रांसीसियों के नियंत्रण में था। वहां वह
क्रांतिकारी शशिधर आचार्य की छद्म धर्मपत्नी के तौर पर रहने लगीं। वहां वह एक स्कूल में नौकरी
करने लगी और सभी क्रांतिकारियों के बीच सुहासिनी दीदी के तौर पर पहचानी जाने लगी। हालांकि,
अंग्रेजों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और चंदननगर के उनके घर पर ब्रिटिश पुलिस अधिकारियों की एक
टीम ने छापा मारा। इसके बाद, सुहासिनी गांगुली, शशिधर आचार्य और गणेश घोष को गिरफ्तार कर
लिया गया। उन्हें खड़गपुर के पास हिजली कारावास शिविर में छह साल तक रखा गया। आगे चलकर
यही हिजली डिटेंशन कैंप खड़गपुर आईआईटी का कैंपस बना।

हिजली से अपनी रिहाई के बाद, गांगुली ने देश की आजादी के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। वह
आधिकारिक तौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़ गईं और उन्होंने पार्टी के कार्यों में सक्रिय
रूप से भाग लेना शुरू कर दिया। भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने वाले एक
क्रांतिकारी हेमंत तराफदार को आश्रय देने की वजह से सुहासिनी गांगुली को फिर से जेल में डाल
दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद वह धनबाद के एक आश्रम में रहने लगी और आजादी के बाद
अपना सारा जीवन सामाजिक, आध्यात्मिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। 23 मार्च 1965 को एक
सड़क दुर्घटना में सुहासिनी गांगुली का निधन हो गया।

अब्बास तैयबजी

डांडी मार्च के नायक ‘छोटा गांधी’

जन्म : 1 फरवरी, 1854, मृत्यु : 9 जून 1936

अब्बास तैयबजी के बारे में कहा जाता है कि वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बहुत करीबी थे। यही
कारण है कि उन्होंने महात्मा गांधी के साथ वर्षों काम किया और लोग उन्हें प्यार से ‘छोटा गांधी’
कह कर बुलाते थे।

स्वतंत्रता सेनानी और महान देशभक्त अब्बास तैयबजी का जन्म 1 फरवरी, 1854 को गुजरात के
वडोदरा में हुआ था। पढ़ाई के लिए अब्बास तैयबजी इंग्लैंड गए और वहां से वकालत की डिग्री लेकर
भारत लौटे। इसके बाद वह वकालत करने लगे और फिर वडोदरा के चीफ जस्टिस बनाए गए। 1919
में जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए कांग्रेस ने एक जांच समिति गठित की जिसका
अध्यक्ष अब्बास तैयबजी को नियुक्त किया गया। कहा जाता है कि वह एक संपन्न परिवार से आते
थे लेकिन जलियांवाला बाग हत्याकांड का प्रभाव उनके मन मस्तिष्क पर ऐसा पड़ा कि उन्होंने अपने
सारे पश्चिमी परिधान जला दिए। साथ ही, उन्होंने अंग्रेजों की बनाई वस्तुओं का भी बहिष्कार कर
दिया और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े।
अब्बास तैयबजी के बारे में माना जाता है कि वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बहुत करीबी थे। यही
कारण है कि उन्होंने महात्मा गांधी के साथ वर्षों काम किया और लोग उन्हें प्यार से ‘छोटा गांधी’
कह कर बुलाते थे। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को फैलाने का संकल्प लिया। विचारों के प्रसार
के इसी संकल्प के तहत उन्होंने बैलगाड़ी से भ्रमण शुरू किया और खादी के कपड़े तक बेचे। महात्मा
गांधी के उन पर भरोसे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने डांडी मार्च

निकालने का निर्णय लिया तब उनकी गिरफ्तारी की स्थिति में उस मार्च के नेतृत्व के लिए जिस
व्यक्ति को नामित किया गया वह कोई और नहीं बल्कि अब्बास तैयबजी ही थे। अब्बास तैयबजी की
गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू को सत्याग्रह के नेतृत्व के लिये नामित किया गया था। अब्बास
तैयबजी दांडी मार्च नमक सत्याग्रह में सक्रिय रूप से शामिल हो कर ब्रिटिश सरकार का जमकर
विरोध किया था। इतना ही नहीं, अब्बास तैयबजी ने महात्मा गांधी के आह्वान पर देश में होने वाले
सभी छोटे-बड़े आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की और अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक अंग्रेजों के
खिलाफ लड़ते रहे। उन्होंने 1928 में, बारडोली सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल का भी समर्थन
किया था। वह हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे और यही कारण है कि उन्होंने हमेशा इनकी एकता
पर बल दिया। इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने 9 जून 1936 को मसूरी में अंतिम सांस ली।
महात्मा गांधी ने उनकी याद में “हरिजन” अखबार में “ग्रांड ओल्ड मैन ऑफ गुजरात” नाम की हेडिंग
से एक लेख लिखा था जिसमें उन्हें मानवता का दुलर्भ सेवक कहा था।
दांडी मार्च की याद में दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग-मदर टेरेसा क्रिसेंट पर ‘ग्यारह मूर्ति’ स्थापित की
गई थी। ग्यारह मूर्ति में महात्मा गांधी, मातंगीनी हजरा, सरोजनी नायडू के साथ-साथ अब्बास तैयबजी
को भी दिखाया गया है।


बद्रीदत्त पांडेय

जिन्होंने उत्तरायणी मेले में कुली बेगार प्रथा का किया अंत

जन्म : 15 फरवरी 1882, मृत्यु : 13 जनवरी 1965

पत्रकारिता से जन आंदोलन शुरू करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बद्रीदत्त पांडेय का जन्म 15
फरवरी 1882 को वर्तमान उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में हुआ था। उन्होंने अल्मोड़ा में रहकर देश की
आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और कई बार जेल गए। जब वह केवल सात साल के थे
तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। इसके बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी होने तक अल्मोड़ा में
रहे और 1903 में नैनीताल में एक शिक्षक के रूप में कार्य करना शुरू किया। साथ ही उन्होंने
पत्रकारिता शुरू की और 1903 से 1910 के बीच ‘लीडर’ अखबार में काम किया। स्वतंत्रता आंदोलन में
योगदान देने के लिए उन्होंने 1913 में ‘अल्मोड़ा अखबार’ की स्थापना की। हालांकि, ब्रिटिश-विरोधी
खबरें छपने के कारण अधिकारियों ने अखबार को जबरन बंद करा दिया। 15 अक्टूबर 1918 को
उन्होंने ‘शक्ति’ नाम से एक क्रांतिकारी अखबार की शुरुआत की।

1921 में बागेश्वर कस्बे में रहने वाली कुमाऊं की आम जनता ने एक अहिंसात्मक आंदोलन शुरू
किया जिसे ‘कुली बेगार’ के नाम से जाना गया। कुली बेगार एक ऐसा कानून था जिसमें कुमाऊं की
पहाड़ियों में रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया था कि वह यात्रा करने
आए अंग्रेज अधिकारियों, सैनिकों, सर्वेक्षकों आदि का सामान मुफ्त में ढोएंगे। यह शोषक प्रथा लोगों को
बिना किसी भुगतान के बेगार करने पर मजबूर करती थी। ग्राम प्रधान से यह उम्मीद की जाती थी
कि वह खास समयावधि में कई कुली मुहैया कराएगा। इसके लिए एक खाता बनाया जाता था जिसमें
ग्रामीणों के नाम दर्ज किए जाते थे। अंग्रेज शारीरिक और मानसिक शोषण कर रहे थे। ऐसे में गांव
के लोगों ने इस अपमानजनक प्रथा के खिलाफ विद्रोह करना शुरू कर दिया। 14 जनवरी 1921 को
उत्तरायणी त्योहार के दौरान, सरयू और गोमती नदी के संगम पर कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत
हुई। सरयू मैदान में एक सभा हुई जिसमें, बद्रीदत्त पांडेय ने शपथ ली कि हम प्रतिज्ञा करते हैं कि हम
कुली उतार, कुली बेगार और कुली बरदायश को अब बर्दाश्त नहीं करेंगे। एकत्रित हुए सभी लोगों ने
प्रतिज्ञा ली और भारत माता का नारा लगाते हुए गांव के बुजुर्गों ने बेगार के खातों को नदियों के
संगम में बहा दिया। इस प्रकार अंग्रेजों पर दबाव बनाया गया और यह परंपराएं खत्म कर दी गईं।
इस आंदोलन की सफलता के बाद बद्रीदत्त पांडेय को ‘कुमाऊं केसरी’ की उपाधि से सम्मानित किया
गया। कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को ‘रक्तहीन क्रांति’ का नाम दिया था। 30
दिसंबर 2021 को हल्द्वानी में कई परियोजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास समारोह में प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने बद्रीदत्त पांडेय को याद किया था। उन्होंने कहा था, “देश की आजादी में भी कुमाऊं ने
बहुत बड़ा योगदान दिया है। यहां पंडित बद्रीदत्त पांडेय जी के नेतृत्व में, उत्तरायणी मेले में कुली बेगार
प्रथा का अंत हुआ था।” 1955 में बद्रीदत्त पांडेय अल्मोड़ा के सांसद बने। 13 जनवरी 1965 को उनका
निधन हो गया।

बांस बरेली के सरदार थे स्वतंत्रता सेनानी दामोदर स्वरूप सेठ

जन्म : 11 फरवरी 1901, मृत्यु 1965

प्रसिद्ध क्रांतिकारी एवं देशभक्त दामोदर स्वरूप सेठ का जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में 11
फरवरी 1901 को हुआ था। देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया और
आजादी की लड़ाई में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। वह शुरू से क्रांतिकारी विचार के थे और जब वह
पढ़ाई के लिए इलाहाबाद गए तो वहीं क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। पढ़ाई के बाद वह चंद्रशेखर
आजाद की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ गए। दामोदर स्वरूप सेठ के प्रभाव का
अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भी उनका बहुत सम्मान
करते थे। माना जाता है कि बनारस षड्यंत्र केस और काकोरी षड्यंत्र मामले में भी उनका नाम आया

था और अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी किया था। हालांकि, सरकार उन पर अभियोग सिद्ध नहीं कर
पाई और ऐसे में उन्हें रिहा कर दिया गया। बाद में वह कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए। कहा जाता है कि
सेठ दामोदर स्वरूप छरहरे बदन के थे। ऐसे में अंग्रेज सरकार के खिलाफ पर्चे चिपकाने का काम इन्हें
ही मिलता था। अंग्रेज उन्हें पकड़ने आते तो
दुबले-पतले होने की वजह से बचकर भाग निकलते थे। दामोदर स्वरूप सेठ ने असहयोग आंदोलन में
भी भाग लिया था और जेल गए थे। स्वतंत्रता सेनानियों के सिरमौर माने जाने वाले क्रांतिकारी सेठ
दामोदर स्वरूप को लोग बांस बरेली के सरदार के नाम से भी जानते हैं। एक समय था जब बरेली में
नारा गूंजता था, “बांस बरेली का सरदार, सेठ दामोदर जिंदाबाद।” दामोदर स्वरूप सेठ संयुक्त प्रांत से
भारतीय संविधान निर्मात्री परिषद के सदस्य थे। सभा में वह काफी मुखर वक्ता थे। माना जाता है
कि सदस्य के रूप में उनका योगदान अहम था और उन्होंने संविधान के प्रारूप पर बाबा साहेब भीम
राव अंबेडकर को कई विषयों पर सुझाव दिया था जिसे स्वीकार भी किया गया। आजादी के बाद भी
वह निरंतर देश सेवा में लगे रहे और देश की उन्नति एवं विकास के लिए ईमानदारी से कार्य करते
रहे। साल 1965 में उनका निधन हो गया।


व्यक्तित्व: शंभूनाथ डे

जन्म : 1 फरवरी 1915
मृत्यु : 15 अप्रैल 1985

जिनके शोध ने बचाई हैजा के मरीजों की जान

‘ब्लू डेथ’ यानि ‘कॉलरा’ जिसे हिंदुस्तान में एक नया नाम दिया गया ‘हैजा’। एक समय था जब यह
बीमारी जानलेवा समझी जाती थी। देखते ही देखते यह महामारी का रूप धारण कर लेती थी और
गांव के गांव इस बीमारी के चपेट में आ जाते थे। साल 1884 में रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने उस
जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है लेकिन इस बीमारी का इलाज नहीं खोजा जा
सका। 75 साल बाद इस बीमारी से होने वाली वाली मौत के सही कारण की खोज एक भारतीय
वैज्ञानिक शंभूनाथ डे ने की। उनके इस प्रयास ने लाखों लोगों की बचाई जान……

ओरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) आज बहुत सामान्य दवाई है जिसे कोई भी आसानी से
अपने घर पर भी बना सकता है। जिस वैज्ञानिक के शोध के आधार पर ओआरएस का इजाद हुआ
वह शोध करने वाला कोई और नहीं बल्कि शंभूनाथ डे थे जिनका जन्म 1 फरवरी 1915 को पश्चिम
बंगाल के हुगली जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम दशरथी डे और माता का नाम चित्रेश्वरी देवी
था। कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण शुरूआती दिनों में उन्हें पढ़ाई करने में काफी दिक्कतों का
सामना करना पड़ा। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और पढ़ाई जारी रखी। बाद में कोलकाता
मेडिकल कॉलेज में उनका चयन हो गया और शोध में दिलचस्पी रहने के कारण वह पढ़ाई के लिए
लंदन चले गए। वहां से वह 1949 में भारत लौटकर आए और कलकत्ता के एक मेडिकल कॉलेज में
सेवा
देने लगे।
माना जाता है कि साल 1817 से सामने आई इस बीमारी से उस समय लगभग 1 करोड़ 80 लाख
लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भी अलग-अलग समय पर इसका प्रकोप भारत और अन्य देशों को
झेलना पड़ा। हैजे के जीवाणु की खोज वैसे तो 1884 में कर ली गई थी लेकिन वैज्ञानिक उसके उचित
इलाज की खोज करने में असफल रहे थे। ऐसे में शंभूनाथ डे ने हैजा का उचित इलाज ढूंढ निकालने
का प्रण लिया। स्वतंत्रता पूर्व भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की नींव रखने में अहम योगदान देने
वाले शंभूनाथ डे कॉलेज में अपना काम खत्म करने के बाद हैजा पर शोध करने लगे। उन्होंने पता
लगाया कि जीवाणु द्वारा पैदा किया गया ऐसा जहर शरीर में पानी की कमी और खून के गाढ़े होने
का कारण बनता है, जिसके कारण आखिरकार हैजे के मरीज की जान चली जाती है।
साधनों की कमी के बावजूद भी उन्होंने हैजा के जीवाणु द्वारा पैदा किए जाने वाले जानलेवा टॉक्सिन
के बारे में पता लगाया। साल 1953 में उनका शोध को प्रकाशित हुआ जो एक ऐतिहासिक शोध था।
उनकी इस खोज के बाद ही ओआरएस का इजाद हुआ।
शंभूनाथ डे की खोज के कारण दुनिया भर में अनगिनत हैजा के मरीजों की जान मुंह के रास्ते तरल
पदार्थ देकर बचाई गई। अपने काम के लिए शंभूनाथ डे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उन्हें
नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया। हैजा पर शोध करने वाले वैज्ञानिक शंभूनाथ डे का
15 अप्रैल 1985 को निधन हो गया। लोगों को हैजे के कारणों और बचाव के प्रति जागरूक करने के
लिए हर साल 23 सितंबर को विश्व भर में हैजा दिवस मनाया जाता है।

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