सुधा सिंह
_भूकंप सामान्य अर्थ में ऐसी कोई भी परिघटना हैं जिनमें धरती हिलती है- ज़्यादातर धरती बनने के क्रम में बनी फाल्ट लाइंस के बीच की ऊर्जा निकलने से पर अन्य कारणों से भी हो सकती हैं- जैसे ज्वालामुखी फटना, परमाणु परीक्षण, बड़ा माइन ब्लास्ट, भू स्खलन आदि।_
1. भूकंपों को अब रिक्टर स्केल पर नहीं नापा जाता। विज्ञान की प्रगति के साथ साथ उन्हें नापने के तरीक़े अब मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल में बदल गये हैं। यह स्केल असल में भूकंप से निकली कुल ऊर्जा नापती है।
2. मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल में 1 अंक की बढ़त का अर्थ होता है भूकंप का 32 गुना ज़्यादा ख़तरनाक हो जाना! माने 5 मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल से 6 मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल वाला भूकंप 32 गुना ज़्यादा ख़तरनाक होगा, बस थोड़ा सा नहीं!
नोट- तुलना करना चाहें तो 1991 के उत्तरकाशी वाले और 2001 के गुजरात वाले भूकंप की तुलना कर सकते हैं! उत्तरकाशी वाला 6.8 मैग्नीटयूड का था जिसमें 1000 के थोड़ा ऊपर लोग मारे गये थे जबकि वह पहाड़ी दुर्गम्य क्षेत्र में था जिसमें पहले ही ख़तरा था! 2001 गुजरात वाला 7.7 का था जिसमें 20,000 से ज़्यादा लोग मारे गये थे जबकि वह उत्तरकाशी की तुलना में एकदम सपाट और आसान पहुँच वाले क्षेत्र में था!
3. मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल 6 के नीचे के भूकंप ज़्यादातर कोई बड़ा ख़तरा पैदा नहीं करते पर 6 के ऊपर वाले हर दशमलव अंक की बढ़त के साथ भी भयानक ख़तरनाक होते हाते हैं!
4. यह ख़तरा भूकंप के केंद्र के समानुपाती भी होता है, जितने क़रीब होंगे उतना ख़तरनाक!
*मोमेंट मैग्नीटयूड स्केल के अर्थ :*
1. मैग्नीटयूड
ज़्यादातर पता भी नहीं चलता!
2- कुछ कमज़ोर
,बहुमंज़िला इमारतों के ऊपरी तलों पर रहने वालों के सिवा महसूस भी नहीं होता।
3- कमज़ोर
घरों में मौजूद ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं पर अक्सर समझ भी नहीं पाते कि भूकंप था, कोई जहाज़ क़रीब से उड़ कर चला गया हो ऐसा ही अहसास होता है!
4. हल्का
घरों के भीतर ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं पर ज़्यादातर कोई बड़ा नुक़सान नहीं होता- बस कुछ हल्के फुलके सामान जैसे कप प्लेट भले हिल जायें।
5. मध्यम
ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं पर बहुत दुर्योग ना हो तो कोई बड़ा ख़तरा नहीं होता। ज़्यादा से ज़्यादा कुछ कमज़ोर खिड़कियाँ हिल जायें, भारी बिस्तर भी इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
6. शक्तिशाली
सबको महसूस होता है, धरती देर तक हिलती है, पर फिर से- इमारतें अगर पहले से बहुत कमज़ोर ना हों तो इससे ज़्यादा कुछ नहीं होता!
7. बहुत शक्तिशाली
जर्जर इमारतों को ढहा सकता है जैसे बरसात ढहाती रहती है पर मज़बूत इमारतों को बहुत हल्का या नगण्य नुक़सान ही पहुँचाता है! भूकंपरोधी हों तो वह भी नहीं!
8. गंभीर
अब ये वाला भूकंप/अन्य प्राकृतिक आपदाओं जैसे टाइफून आदि को ध्यान में रख कर न बनाई गई हों तो मज़बूत से मज़बूत इमारतें भी गिरा सकता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए बेहद ख़तरनाक!
नोट- भूकंपरोधी इमारतों को कोई बड़ी दिक़्क़त नहीं होती बशर्ते उनको मोरबी पुल के ठेकेदारों जैसों ने न बनाया हो!
9- हिंसक
भूकंपरोधी इमारतों को भी ढहा सकता है यद्यपि उनके बचने कि संभावना भी होती है। सड़कों को तोड़ सकता है, रेलवे ट्रैक उखाड़ सकता है!
10. अति ख़तरनाक
इसमें कुछ बचने की ज़्यादा संभावना नहीं होगी। ये ऐसा होगा जैसे एक साथ कई परमाणु बम फोड़ दिये गये हों! सैकड़ों मील तक असर होगा!
शुक्र है कि सैद्धांतिक रूप से संभव है पर न अब तक हुआ है न वैज्ञानिक मानते हैं कि कभी होगा! इसके लिए सबसे लंबी फाल्ट लाइन चाहिए- वह है तो पर इतनी ऊर्जा संचित करते जाना कि ऐसा भूकंप संभव हो पाये बहुत मुश्किल है- बीच बीच में छोटे भूकंपों में वह ऊर्जा निकलती रहेगी!

