कुमार सिद्धार्थ
मध्यप्रदेश में शिक्षक शिक्षा और शिक्षा-चिंतन के क्षेत्र में सक्रिय रहे 90 वर्षीय सुरेंद्रनाथ दुबे ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिन्होंने लगभग पाँच दशकों तक शिक्षा जगत में मौन किन्तु प्रभावशाली भूमिका निभाई। 8 मार्च को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। उनका जीवन शिक्षक शिक्षा, शिक्षा नीति, शिक्षक कल्याण और मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा के लिए निरंतर संघर्ष और साधना का जीवन रहा।
सुरेंद्रनाथ दुबे उन शिक्षाविदों में थे, जिनकी पहचान पदों या उपाधियों से नहीं, बल्कि उनके काम और विचारों से बनी। वे शिक्षक शिक्षा, शिक्षा नीति, शिक्षक कल्याण और शैक्षिक विमर्श के ऐसे कर्मठ साधक थे जिनकी दृष्टि शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा तक सीमित नहीं मानती थी। उनके लिए शिक्षा समाज को बेहतर बनाने की प्रक्रिया थी।
सुरेंद्रनाथ दुबे का जीवन प्रारंभ से ही शिक्षा और समाज सेवा से जुड़ा रहा। उन्होंने शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करते हुए शिक्षा व्यवस्था के विभिन्न स्तरों को करीब से देखा और समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनके विचारों और कार्यों का आधार बना।
वे मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा से जुड़े रहे और शिक्षा विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), भोपाल में कार्य करते हुए उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यचर्या विकास और शैक्षिक शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। दुबे जी का मानना था कि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता का आधार शिक्षक होता है। यदि शिक्षक सक्षम, संवेदनशील और प्रशिक्षित होंगे तो शिक्षा अपने आप प्रभावी हो जाएगी।
इसी दृष्टि से उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, शैक्षिक सामग्री और शैक्षिक पत्रिकाओं के माध्यम से शिक्षकों को विचार और संवाद का मंच प्रदान किया। वे परिषद की प्रतिष्ठित शैक्षिक पत्रिका ‘पलाश’ से भी जुड़े रहे और इसके माध्यम से शिक्षा, शिक्षाशास्त्र और समाज से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श को आगे बढ़ाया।
सुरेन्द्रनाथ दुबे का योगदान केवल संस्थागत या प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहा। वे शिक्षा से जुड़े व्यापक नीतिगत प्रश्नों पर भी सक्रिय रहे। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 के अंतर्गत सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया था। दुबे जी इस विचार के प्रबल समर्थक थे और शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने के लिए लगातार आवाज उठाते रहे।
1976 में हुए 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में लाया गया। इस परिवर्तन के पीछे जो बौद्धिक और वैचारिक वातावरण बना, उसमें दुबे जी जैसे शिक्षाविदों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने के पक्षधर थे और इस विषय पर लेखन तथा संवाद करते रहे। बाद में जब शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की दिशा में पहल हुई और 86वें संविधान संशोधन (2002) के माध्यम से बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिला, तब भी दुबे जी ने इस विषय पर अनेक लेख और सुझाव दिए।
दुबे जी का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षक समुदाय के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी। वे मानते थे कि शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता सीधे-सीधे शिक्षक की स्थिति और सम्मान से जुड़ी होती है।
इस दृष्टि से उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षक कल्याण प्रतिष्ठान के साथ मिलकर शिक्षकों के लिए कई पहलें कीं। मध्यप्रदेश के अनेक जिलों में ‘शिक्षक सदनों’ की स्थापना में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। इन शिक्षक सदनों का उद्देश्य शिक्षकों को संवाद, प्रशिक्षण और सामूहिक गतिविधियों के लिए एक साझा मंच प्रदान करना था। शिक्षक समुदाय को संगठित और सशक्त बनाने के लिए उन्होंने अनेक शैक्षिक कार्यक्रमों और बैठकों में सक्रिय भूमिका निभाई।
सुरेन्द्रनाथ दुबे का दृष्टिकोण केवल स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं था। वे शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय विमर्श से भी जुड़े रहे। उन्होंने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लिया और वैश्विक शिक्षा परिदृश्य को समझने का प्रयास किया। प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. गुलाब चौरसिया के साथ उनके संवाद और सहभागिता ने शिक्षा के क्षेत्र में उनके दृष्टिकोण को और व्यापक बनाया।
युनेस्को से जुड़े कार्यक्रमों और चर्चाओं में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। शिक्षा को मानवता, शांति और वैश्विक सहयोग से जोड़ने का विचार उनके चिंतन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
सुरेंद्रनाथ दुबे के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी गांधीवादी विचारधारा थी। वे प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ. एस. एन. सुब्बाराव के संपर्क में रहे और उनसे प्रभावित भी हुए। गांधीवादी सोच के कारण उनके विचारों में अहिंसा, नैतिकता, सामाजिक समानता और सेवा की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती थी।
दुबे जी का शिक्षा दर्शन अत्यंत स्पष्ट और मानवीय मूल्यों पर आधारित था। उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि मनुष्य को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना है। वे अक्सर कहते थे कि यदि शिक्षा में मानवता, करुणा और अहिंसा के मूल्य नहीं होंगे, तो वह अधूरी शिक्षा होगी।
उनका विश्वास था कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो समाज में शांति और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत कर सकती है। उन्होंने कई लेखों और व्याख्यानों में यह विचार व्यक्त किया कि शिक्षा को मानवता की सेवा के साथ जोड़ना आवश्यक है।
सुरेन्द्रनाथ दुबे का व्यक्तित्व जितना विद्वत्तापूर्ण था, उतना ही सरल और विनम्र भी था। वे अपने काम को ही अपनी पहचान मानते थे और व्यक्तिगत प्रचार से दूर रहते थे।
सुरेन्द्रनाथ दुबे लंबे समय तक शिक्षक समुदाय के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहे। वे अनेक शैक्षिक मंचों और समूहों से जुड़े रहे और शिक्षकों को आत्मनिर्भरता, नवाचार और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ काम करने की प्रेरणा देते रहे। उनका मानना था कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल नीतियों से नहीं, बल्कि शिक्षकों की प्रतिबद्धता और समाज के सहयोग से संभव है।
सुरेन्द्रनाथ दुबे का जीवन शिक्षा, सादगी और सेवा का का अद्भुत संगम था। सुरेंद्रनाथ दुबे का व्यक्तित्व अत्यंत सरल और विनम्र था। वे अपने कार्यों का प्रचार-प्रसार करने में विश्वास नहीं रखते थे। उन्होंने जिस निष्ठा और प्रतिबद्धता के साथ शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उनका योगदान यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल संस्थानों और नीतियों का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज की चेतना और भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

