प्रखर अरोड़ा
बचपन में हमारे गाँव के सिर्फ एक लड़के को छोड़कर और कोई भी प्राइवेट ट्यूशन नहीं पड़ता था। वह मेरे ही क्लास का था और अपने बाप का इकलौता बेटा भी था। उसके बाप की यह दिली हसरत थी कि उसका बेटा पढ़ाई में सबसे आगे निकले।
इसलिए जब वह हम पांचवे क्लास में थे, तो मिडिल स्कूल के एक शिक्षक, स्व. राजेश्वरी लाल, को उसे पढ़ाने के लिए घर पर रखा गया था, और आश्चर्य की बात यह हुई कि वह छठे क्लास में प्रथम स्थान पाया। लेकिन, यह उसकी अपनी वास्तविक योग्यता नहीं थी, बल्कि ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षक का करिश्मा था।
खैर, धीरे-धीरे प्राइवेट ट्यूशन का शौक बढ़ता गया और अधिक से अधिक लड़के ट्यूशन पढ़ने लगे। मैट्रिक तक आते-आते मेरे क्लास के करीब दर्जन भर लड़के ट्यूशन पढ़ रहे थे।
इसके बाद तो यह मर्ज समय के साथ-साथ बढ़ता ही गया। मैंने तो कभी प्राइवेट ट्यूशन के बारे में सोचा भी नहीं। कालेज में आने के बाद यह देखने को मिला कि बहुतेरे लड़के ट्यूशन पढ़ रहे हैं, खासकर अंग्रेज़ी और विज्ञान के विषयों में। अंग्रेजी का तो हाल यह था कि शायद ही कोई ऐसा शिक्षक हो, जो ट्यूशन न पढ़ाता था।
शौक से शुरू हुआ यह फैशन बना और बाद में तो क्रेज बन गया। जो ट्यूशन नहीं पड़ता, उसे गरीब मान लिया जाता। ट्यूशन पढ़ने की बीमारी ने धीरे-धीरे महामारी का रूप धारण कर लिया। अब तो हाल यह है कि स्कूल जाने से पहले घर पर ही प्राइवेट ट्यूटर रखे जाने लगे। जिस बच्चे के लिए प्राइवेट ट्यूटर नहीं रखा जाता है, उसे गरीब घर का मान लिया जाता है। उसके माँ-बाप की इज्जत मोहल्ले में घट जाता है।
अब तो अपनी बेहतर सामाजिक स्थिति को प्रदर्शित करने और अपनी इज्जत बचाने के लिए भी लोग बच्चे के लिए प्राइवेट ट्यूटर रखते हैं। स्कूल वाले भी प्राइवेट ट्यूटर की अनुशंसा करते हैं।
आज तो स्थिति यह है कि पूरे देश में प्राइवेट ट्यूशन का बहुत बड़ा बाजार बन गया है, और शिक्षा पूरी तरह से माफियाओं के हाथ में चला गया है। अच्छे प्राइवेट स्कूल में नामांकन से लेकर प्राइवेट ट्यूटर तक की व्यवस्था है, आपको सिर्फ पैसे खर्च करने हैं। प्ले स्कूल में भी बच्चों के लिए इतनी किताबों का बोझ है कि बच्चा उसके भार से ही दब जाएगा।
प्रतिमाह ट्यूशन फी ही स्कूल के अनुसार पटना में ही पांच हजार तक है। किताबें, ड्रेस, परीक्षा फीस, मनोरंजन, गेम्स और अन्य खर्चों को अगर जोड़ दिया जाये, तो यह कुल मिलाकर सिर्फ स्कूल का फीस ही दस हजार रुपये हैं और ऊपर से प्राइवेट ट्यूटर की फीस। सुबह जगने से लेकर रात में सोने तक माँ-बाप बच्चे के लिए बेचैन हैं। पढ़ाई का मानसिक तनाव बच्चे से ज्यादा उसके अभिभावक पर है।
नतीजा होता है कि घर में सभी चिडचिड़े बनते जा रहे हैं। और, सबसे ऊपर परीक्षा का परिणाम और प्राप्तांक का प्रतिशत।
इतने तनाव के बावजूद भी न बच्चों को चैन, न अभिभावक को। तनाव मुक्त होकर पढ़ने के साथ ही खेलने और मनोरंजन की कोई भी व्यवस्था नहीं है। घर में भी बच्चे स्कूल का टास्क पूरा करने में ही लगे रहते हैं। खेलने का कोई समय ही नहीं है। पता ही नहीं चल रहा है कि यह बच्चे की कैसी मानसिक उन्नति हो रही है।
सच्चाई तो यही है कि इतने तनाव में बच्चे अवसादग्रस्त न होंगे तो और क्या होंगे? जहाँ बच्चों के लिए कोई स्वस्थ मनोरंजन, खेलकूद, संगीत या ऐसी ही कोई दूसरी व्यवस्था नहीं है, तो यह असंभव है कि बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास होगा। यह भागमभाग की जिंदगी है, जहाँ अभिभावक से लेकर बच्चे तक सभी सिर्फ भाग रहे हैं। कितने मंजिल तक पहुंचेंगे, और कितने बीच रास्ते ही भटककर अपनी बर्बादी की दास्ताँ लिखेंगे, कहा नहीं जा सकता।
सरकारी स्तर पर शिक्षा को इस तरह बर्बाद कर दिया गया है कि अब उसके पुनर्जीवित होने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है। शिक्षा व्यवस्था का पूर्णतः माफियाकरण हो गया है।
प्राइवेट स्कूल और प्राइवेट ट्यूटर का पूरे देश में इतना बड़ा और दुरूह संजाल बन गया है कि उससे मुक्ति का कोई रास्ता दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। इसमें बदलाव तब तक संभव नहीं है, जबतक कि वर्तमान व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन न हो।

