क़मर अब्बास सिरसिवी
ईद का मतलब है ‘खुशी का दिन’ और ईदुल फित्र का ख़ास मतलब है – सिर्फ अपनी या अपने रिश्तेदारों की नहीं बल्कि अपने पड़ोस और अपनी बस्ती के गरीबों की ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए मनाई जाने वाली खुशी | हज़रत अली फरमाते हैं कि हर वो दिन ईद का दिन है जिस दिन कोई गुनाह न किया जाए |
दो ही हालत में गुनाह से बचना मुमकिन है, पहला – इंसान लगातार अल्लाह की इबादत में मसरूफ़ रहे, दूसरा – इंसान अल्लाह के बंदों की भलाई में मसरूफ़ रहे | आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में सारे दिन अल्लाह की इबादत तो मुमकिन नहीं लेकिन अल्लाह के बंदों में खुशी बांटने की कोशिश करना एक ऐसी इबादत है जिसमें आदमी ना तो जल्दी थकता है और ना ही उसका दिमाग किसी फितूर की तरफ राग़िब होता है |
आज मुसलमानों के एक तबक़े ने ईद को नए कपड़ों की खरीदारी, गाड़ियों के शोरगुल, महंगी मिठाइयों की ख़रीद और मल्टीप्लेक्स की तफरीह से जोड़कर इस्लाम से दूर कर दिया है और दुनिया के सामने एक बुरी शक्ल पेश की है इसलिए मुसलमानों के पढ़े-लिखे तबक़े की ये ख़ास जिम्मेदारी है कि वो आम मुसलमान के दरम्यान ईद का सही मतलब और मक़सद पेश करें कि जब हम रमज़ान के महीने में अल्लाह की मर्जी के मुताबिक अपने आप को तमाम बुराइयों से पाक साफ रखते हुए रोज़े की हालत में वक्त गुजारते हैं तो इस पाक महीने के आख़िर तक हमारे जिस्म की बहुत सी बीमारियों के साथ-साथ हमारे नफ्स की तमाम बीमारियां यानी हमारें गुनाह भी खत्म हो जाते हैं और इस पाक हालत में ईद के दिन, हमें अल्लाह की इबादत के लिए दो रक्अत नमाज़ अदा करने से पहले उसके गरीब बंदों की खुशी का ख़ास ख्याल रखने का हुक्म दिया गया है इसीलिए कुरान में बारहा फितरा और ज़कात अदा करने का हुक्म हैं – गरीबों की मदद करो, लोगों की गर्दनें छुड़ाओ यानी गुलामों को आजाद कराओ |
तो अब मुसलमानों के लिए यह फैसला करना आसान है कि आज दुनिया के खतरनाक माहौल में बाजारों में ग़ैरज़रूरी भीड़ लगाकर महज़ शौक़ के ख़ातिर अपना वक़्त और मेहनत से कमाई रक़म ख़र्च करना समझदारी नही है | ये खुशियां बांटने का तरीका नहीं है बल्कि हम एक दूसरे को जिस्मानी और ज़हनी बीमारियां बांट रहे हैं या यूं कह लें कि बेमकसद, अनजाने में गुनाह कमा रहे हैं | इस माहे ईद के पहले दिन हिंदुस्तान के मुसलमानों से हाथ जोड़कर गुज़ारिश है कि खुदाया बेदार हो जाइये, ईद के असल मकसद को समझिए और रमज़ान की मुश्किलतरीन इबादत के बाद आने वाले पुरमुसर्रत ईद के दिन को उसके असली मक़सद के साथ मनाते हुए अपने पड़ोस, ख़ानदान, मोहल्ले और बस्ती के गरीब इंसानों को खुशियां बांटिये वो चाहे पैसे की शक्ल में हो या अनाज की शक्ल में, मिठाई की शक्ल में हो या दवाई की शक्ल में यानी उसकी हर वो बुनियादी ज़रूरत जो वो ख़ुद पूरा करने में मजबूर हो और आप अल्लाह के फज़ल से इतनी हैसियत रखते हों तो उस जरूरत को पहले पूरा कीजिए | सादे और पाक – साफ कपड़ों में पढ़ी गई दो रकअत फरादा ईद की नमाज, बारगाह ए इलाही में यक़ीनन क़ाबिले क़ुबूल होगी जबकि आप उसके ग़रीब और परेशान बंदों को खुशी देकर उसके सामने सर झुका कर खड़े होगें
क़मर अब्बास सिरसिवी

