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कोरोना के बीच चुनावी रण

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राकेश श्रीवास्तव 
उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों मे चुनाव का बिगुल बज चुका है। इसी के साथ ही कोरोना की तीसरी लहर भी अपने उफान पर है।कोरोना पर नियंत्रण पाने के लिए सरकारों ने अपनी चेतावनी जारी कर दी है।स्कूल, कॉलेज बन्द कर दिए गए हैं। मेले, ढेले, उत्सव, ट्रेड फेयर,सम्मान,पुरस्कार समारोह सब चल रहे है।अखबारों मे प्रोटोकोल का उल्लंघन करते हुए जिम्मेदारों की खूब तस्वीरें आ रही हैं।

 
चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा कर दी है और साथ ही चुनावी रैलियों पर भी रोक लगा दी है।यह एक तरह से खिलाड़ियों को हाथ बांध कर खेलने के लिए कहना है।अब यह रोक कितनी प्रभावी होगी यह तो समय ही बतायेगा। बंगाल चुनाव और उसके बाद उप्र के पंचायत चुनाव के बाद कोरोना महामारी की तबाही की तस्वीरें अभी धुंधली नहीं पड़ी हैं।आक्सीजन की कमी से तड़पते लोग और श्मशानघाट पर जगह का इंतजार करती लाशें अभी दिल और दिमाग से धुंधली होकर गायब नहीं हो पाई हैं। जिन घरों को घाव दे गई है वह तो शायद ही भूल सकें।पर संवैधानिक संस्था का फैसला है तो सबके लिए बाध्यकारी है। 
भयंकर सर्दी मे गरमागरम चाय के साथ ही चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।आचार संहिता का उल्लंघन भी शुरू हो गया है। धारा 144 लगी है पर चुनाव प्रचार के लिए झुंड के झुंड जा रहे हैं। इस के उल्लंघन पर किसी दल विशेष का एकाधिकार नही है। चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्ष कोई किसी से कमजोर नहीं दिखना चाहता है। सपा प्रमुख ने वर्चुअल रैली के नाम पर शक्ति प्रदर्शन किया तो भाजपा प्रत्याशियों ने जुलूस निकाले। भड़काऊ भाषण माहौल को गर्मा रहे हैं। साथ ही मौसम वैज्ञानिक बनने का दावा करने वाले नेतागण अपने अपने आकलन के अनुसार दूसरे दलों की विजय सम्भावना को देख परख कर अपने पाले बदल रहे हैं। प्रत्याशियों की सूची आने के बाद कुछ स्पष्ट संकेत मिल सकते हैं।देखना है कि ऊंट किस करवट बैठने जा रहा है। तब तक प्रतीक्षा किया जाय।

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