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*चुनाव आयोग ने टीएमसी नेताओं के किसी भी सवाल का कोई सार्थक जवाब नहीं दिया*

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अखिलेश अखिल

पिछले दिनों टीएमसी के दस नेताओं की चुनाव आयोग से मुलाकात हुई। मुलाकात के समय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार समेत बाकी के भी दोनों चुनाव आयुक्त आयोग के दफ्तर में उपस्थित थे। कह सकते हैं कि टीएमसी नेताओं की मुलाकात चुनाव आयोग के फुल बेंच से हुई। चूंकि मुलाकात का समय पहले से ही निर्धारित था इसलिए चुनाव आयोग भी तैयारी के साथ बैठा था। यह मुलाकात दो घंटे तक चली। जाहिर है इस दौरान कई औपचारिक और बहुत से अनौपचारिक बातें भी हुई होंगी। मुलाकात के बाद टीएमसी नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बातें कही हैं उसके मुताबिक चुनाव आयोग ने उनके किसी भी सवाल का कोई सार्थक जवाब नहीं दिया है।

टीएमसी की तरफ से पांच सवाल किये जाने की बात सामने आयी है। चुनाव आयोग के सामने जो टीएमसी की तरफ से सवाल रखे गए उनमें पहला सवाल तो यही था कि यह एसआईआर किसके लिए किया जा रहा है? अगर यह सब घुसपैठियों के लिए है तो इसे सिर्फ बंगाल में क्यों? बाकी के सीमाई राज्यों में क्यों नहीं की जा रही है? भारत के कई पूर्वोत्तर राज्य भी बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं, वहां यही सब क्यों नहीं हो रहा है? फिर कुछ राज्यों की सीमा भूटान और म्यांमार की सीमा से भी लगी हुई है, वहां भी यही सब क्यों नहीं किया जा रहा है? फिर असम में वही सब क्यों नहीं हो रहा है जो बंगाल में किया जा रहा है? टीएमसी ने यही कहा है कि चुनाव आयोग उनकी बातों को सुनते हुए बस यही कहा कि सभी राज्यों में एसआईआर कराये जाएंगे।

टीएमसी का दूसरा बड़ा सवाल था कि पुरानी सूची गलत तो सरकार भी गलत? प्रेस वार्ता में टीएमसी नेताओं ने बताया कि हमारी आपत्तियों का जवाब चुनाव आयोग ने नहीं दिया। टीएमसी का अगला सवाल था बिहार मॉडल क्यों? क्या बंगाल में भी वोटर कार्ड होते हुए वोट न देने जैसी स्थिति लाने की कोशिश है? चौथा सवाल था बीएलओ पर दबाव क्यों ? 40 मौतों का आंकड़ा हम दे रहे हैं। चुनाव आयोग मानने को तैयार नहीं। और पांचवां सवाल था बांग्ला सहायकों को शामिल क्यों नहीं किया? इससे प्रक्रिया तेज हो सकती है। इस पर भी चुनाव आयोग मौन ही रहा।

टीएमसी के इन पांच सवालों में दो सवाल बड़े थे। पहला यही कि बंगाल के अलावा बाकी राज्यों में बंगाल की तरह एसआईआर क्यों नहीं ? जाहिर है बंगाल के बारे में यही कहा जाता है कि वहां बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग पहुंचे हैं। इसके साथ ही बहुत से हिन्दू लोग भी पहुंचे हैं। बीजेपी और चुनाव आयोग मानती है कि अवैध बांग्लादेशी बंगाल में आकर जुगाड़ से बस गए हैं और ये सभी टीएमसी के वोट बैंक बने हुए हैं। बांग्लादेश से अवैध रूप से आये हिन्दू किसे वोट डालते हैं इसका कोई ब्यौरा किसी के पास नहीं है। अगर एक भी हिन्दू बीजेपी को वोट डालता है तो उसके बारे में क्या राय रखी जाए? फिर असम में भी भारी संख्या में मुसलमान रह रहे हैं। अधिकतर मुसलमान बांग्लादेश से ही आये हुए हैं।

बहुत से लोगों की नागरिकता ख़त्म भी की गई लेकिन आज तक उन्हें वापस नहीं भेजा गया। बांग्लादेश की सीमा से लगे बाकी राज्यों में भी बहुत से बांग्लादेशी मुसलमान रह रहे हैं और मतदान भी करते रहे हैं। उसके बारे में सरकार क्या सोचती है यह भी साफ़ नहीं है। याद रहे पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्यों में बीजेपी और एनडीए की ही सरकार है। क्या अवैध वोट से ही वहां की सरकार बनती रही है? और बड़ा सवाल तो टीएमसी का वह है कि पिछले सभी चुनाव में जब इन्हीं अवैध लोगों के वोट पड़े हैं तो सरकार भी अवैध हो सकती है। कई राज्यों की सरकार समेत केंद्र की सरकार भी। लेकिन इसका जवाब न तो केंद्र सरकार के पास है और न ही चुनाव आयोग के पास ही।

अब मुद्दे की बात। हमारे प्रधानमंत्री ने इसी 15 अगस्त को लाल किले से घुसपैठिये का जिक्र किया था। घुसपैठिया मतलब मुसलमान ,रोहिंग्या आदि। उन्होंने कहा था कि ये घुसपैठिया भारतीय युवाओं की नौकरियों को छीन रहा है। फिर बिहार चुनाव के दौरान पीएम मोदी ने गया में कहा कि देश का डेमोग्राफी बदल रहे हैं और अब इसे ख़त्म करने के लिए डेमोग्राफी मिशन शुरू करने की जरुरत है। जाहिर है अभी जो एसआईआर की कहानी चल रही है उसे डेमोग्राफी मिशन के रूप में ही देखने की ज़रूरत है।

अब सवाल है कि देश में कितने घुसपैठिए हैं? सवाल यह भी है कि आखिर बॉर्डर पार करके ये घुसपैठिए भारत में कैसे पहुँच रहे हैं? जब बॉर्डर का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है तो फिर घुसपैठिये कैसे आ रहे हैं? फिर गृह विभाग अब तक क्या कुछ करता रहा है? अगर दूसरे देश के लोग अवैध रूप से भारत में आ रहे हैं तो गृह विभाग अभी तक क्या करता रहा है? क्या गृह विभाग ने कभी इसकी जिम्मेदारी लेने की कोशिश की है? क्या माना जाए घुसपैठिये गृह विभाग के इशारे पर ही देश में आते रहे हैं और राज्य सरकारें उसे संरक्षित करती रही हैं? क्या इन सरकारों का अपने पद पर बने रहने का कोई औचित्य है ? क्या इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए ?

भारत में कितने घुसपैठिये हैं इसके बारे में कोई बड़ी जानकारी नहीं है। कोई सटीक आंकड़े भी नहीं हैं। साल 2016 में सरकार की तरफ से बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर जानकारी दी गई थी। जिसमें केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि भारत में लगभग 2 करोड़ बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी के बराबर है। इससे पहले यूपीए सरकार ने 2004 में 1.2 करोड़ का आंकड़ा दिया था। ये आंकड़ा सिर्फ और सिर्फ बांग्लादेशी घुसपैठियों का है, जबकि म्यांमार, नेपाल और बाकी देशों से भी अवैध तरीके से लोग भारत आते हैं। अब 2025 तक ये आंकड़ा काफी ज्यादा हो सकता है।

अब अगर राज्यों की बात करें तो पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा ऐसे लोग हैं, जो बिना किसी वैध दस्तावेज के यहां रह रहे हैं। यहां ऐसे लोगों की संख्या 57 लाख से भी ज्यादा बताई गई थी। इसके बाद दूसरे नंबर पर असम आता है, जहां अवैध घुसपैठियों की संख्या करीब 50 लाख बताई गई। यही वजह है कि असम में एनआरसी चलाया गया। जिसमें अवैध प्रवासियों की पहचान की गई। जब एनआरसी की फाइनल लिस्ट जारी हुई तो इससे 19 लाख लोग बाहर हो गए और उनकी नागरिकता पर सवाल खड़े हो गए।

साल 2004 गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने भी आंकड़े जारी किए थे। जिसमें ये भी बताया गया था कि अन्य 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 1,20,53,950 अवैध बांग्लादेशी प्रवासी मौजूद हैं। इसके बाद मोदी सरकार ने 2016 में जो आंकड़े दिए उनमें से संख्या करीब 80 लाख ज्यादा बताई गई थी।

2011 में 6761 बांग्लादेशियों को भारत से वापस भेजा गया था। 2012 में 6537 बांग्लादेशी भारत से वापस भेजे गए। 2013 में 5234 लोगों को वापस उनके देश भेज दिया गया। 2014 में कुल 989 लोग बांग्लादेश वापस भेजे गए। 2015 में 474 लोगों को वापस भेजा गया। और साल 2016 में 308 और 2017 में 51 लोग बांग्लादेश भेजे गए। कल्पना कीजिए कि भारत में अगर लाखों और अब करोड़ों की संख्या में जब घुसपैठिए हैं तो वापस किये गए घुसपैठियों की संख्या इतनी कम क्यों है ? सरकार सबको एक साथ वापस क्यों नहीं भेज देती ?

लेकिन इस सवाल का उत्तर आखिर कौन देगा? हमारे देश में वक्त के साथ सभी राजनीतिक दलों ने अपने मुताबिक घुसपैठियों का उपयोग किया है। यह खेल ठीक वैसा ही है जैसा कि वंशवादी राजनीति। जिस तरह से कोई भी पार्टी परिवारवाद और वंशवाद से परे नहीं है ठीक वैसे ही कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जिसने घुसपैठियों का वोट ग्रहण नहीं किया हो। कोई कम ज्यादा वोट मिलने का दावा कर सकता है लेकिन लाभान्वित सभी पार्टियां रही हैं।

बड़ा सवाल तो यही है कि अभी हाल में हुए बिहार चुनाव के दौरान ही जब 65 लाख से ज्यादा लोगों के वोट को निरस्त किया गया जबकि यही वोटर पिछले लोकसभा चुनाव में वोट डालते रहे हैं। पूर्वोत्तर समेत कई राज्यों में अवैध नागरिकों के वोट भी कई पार्टियों को मिलते रहे हैं। बंगाल में भी सभी पार्टियों को वोट मिलते रहे हैं। ऐसे में अवैध नागरिक से अवैध वोट पाकर चुनाव जीतने वाली पार्टियों और सरकार को अवैध ही कहा जा सकता है। लेकिन देश मौन है ?

इसमें कोई शक नहीं कि भारत में घुसपैठियों की आबादी बढ़ी है लेकिन यह उतना ही सच है कि इन घुसपैठियों को भारत में लाने का काम भी पार्टियां ही करती रही हैं। अब चूंकि बीजेपी को लग रहा है कि मुस्लिम वोट उनके पाले में नहीं जाता इसलिए उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाए। लेकिन क्या यह सब संभव हो सकता है ?

दुनिया ने देखा, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका से अवैध प्रवासियों को निकाला। किसी दुश्मन देश के प्रवासी को नहीं, भारत जैसे दोस्त देश के अवैध प्रवासियों को भी ट्रंप की सरकार ने हथकड़ी और बेड़ी पहना कर सेना के विमान में भर कर भेजा था। जंजीरों में बंधे भारतीयों को लेकर अमेरिकी विमान अहमदाबाद में उतरा तो अमृतसर में भी उतरा। जंजीरों में जकड़े भारतीयों की फोटो अमेरिका की सीमा की सुरक्षा करने के लिए जिम्मेदार सर्वोच्च अधिकारी ने खुद जारी की। भारत के अलावा कई और लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देशों के अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकाला। इसका असर भी तुरंत दिखने लगा। अब अमेरिका में अवैध रूप से घुसने के प्रयास में बड़ी कमी देखी गई है।

क्या ऐसी कोई तस्वीर भारत की ओर से कभी जारी हुई है? क्या भारत ने दुनिया को कभी दिखाया है कि देखो, ये बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं या ये म्यांमार से आए रोहिंग्या हैं, जिनको भारत बाहर निकाल रहा है? भारत में सिर्फ बातें होती हैं। घुसपैठियों के मुद्दे पर चुनाव लड़े जाते हैं।

अब पश्चिम बंगाल का चुनाव इस मुद्दे पर लड़ा जाएगा कि एक एक घुसपैठिए को बाहर निकालेंगे। असम में तो खैर पिछले 10 साल से इसी मुद्दे पर भाजपा की सरकार चल रही है। लेकिन विडम्बना देखिए कि जिस राज्य में लाखों बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने की बात भाजपा के नेता करते हैं वहां से कुछ हजार घुसपैठिए भी नहीं निकाले जा सके हैं।

असम कांग्रेस के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष देवब्रत सैकिया ने सरकारी आंकड़ों के आधार पर कहा कि 2016 के बाद से अभी तक कानूनी रूप से सिर्फ 26 बांग्लादेशी घुसपैठियों को डिपोर्ट किया गया है। हालांकि उनको भी देश से निकालते हुए वैसी तस्वीर नहीं आई, जैसी अमेरिका से भारतीयों के निकाले जाने की थी। जब कानूनी रूप से कथित घुसपैठियों को डिपोर्ट करने में सरकार नाकाम रही तो पुशबैक की पॉलिसी अपनाई गई, जिसके तहत कथित घुसपैठियों को नोमेंस लैंड में धकेल दिया जाता है और बाद में वे वापस आ जाते हैं।

सच तो यही है कि भारत की पूरी राजनीति ही भ्रष्टाचार पर टिकी हुई है। किसी भी पार्टी की यही ख्वाइश होती है कि चुनाव में किसी भी तरह से उसकी जीत हो जाए और सरकार बन जाए। जो बातें लोगों के मन में भा जाए उसके नारे लगाए जाए। सरकार बनने के बाद देश और राज्य की आर्थिक स्थिति कैसी है और चुनावी वादे पूरे करने के लिए सरकार के पास धन है या नहीं इसके बारे आज तक कोई भी पार्टी चिंतन नहीं करती। सच यही है कि देश का भले ही कबाड़ा हो जाए पार्टी की सरकार बनती रहे और जुमलों की बरसात होती रहे। मजे की बात यह होगी कि बंगाल में एसआईआर के बाद कितने बांग्लादेशी हटाए जाते हैं इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। और ऐसा नहीं हुआ तो इस देश को बर्बादी से भला कौन बचा सकता है?

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