
– रामस्वरूप मंत्री
आजाद भारत के इतिहास में 25 जून की तारीख अहम है। इसी दिन यानी 25 जून 1975 को स्वतंत्र भारत के इतिहास का डेड साल लंबा सबसे ज्यादा अलोकतांत्रिक दौर शुरू हुआ था। उस दौर की केवल कल्पना ही आज के युवा कर सकते हैं, खासकर तब जबकि आज अभिव्यक्ति के ढेरों साधन मौजूद है और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर पूरी दुनिया में नये सिरे से आवाज उठाई जा रही है, ऐसे में बड़ा आश्चर्य होता है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र ने नागरिक अधिकारों को छीन लेने, विरोधियों, विपक्षियों और लाखों लोगों को जेल में डाल देने और प्रेस पर प्रतिबंध के जाने कैसे दिन देखे?
50 साल पहले 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की रैली के बाद आधी रात को देश में आपातकाल लगाने का फैसला किया। जिस रात को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, उस रात से पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में एक विशाल रैली हुई. वो पतारीख थी 25 जून 1975. इस रैली में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ललकारा था और उनकी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया. इस रैली में कांग्रेस और इंदिरा विरोधी मोर्चे की मुकम्मल तस्वीर सामने आई, क्योंकि इस रैली में विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेता थे. यहीं पर राष्ट्रकवि दिनकर की मशहूर लाइने सिंहासन खाली करो कि जनता आती है की गूंज नारा बन गई थी।
आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर पुरुष नसबंदी अभियान चलाया गया। इस जबरदस्ती के कारण पुरे देश के ग्रामीण क्षेत्र में भय एवं रोष का वातावरण बन गया एवं पुलिस बल कांग्रेस के नेताओं की अवैध कमाई का जरिया बन गया यह अभियान।
इंदिरा, 12 जून 1975 को आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से पहले से ही बेचैन थीं जिसमें रायबरेली से उनका चुनाव निरस्त कार दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें आधी राहत मिली थी. आखिरकार उन्होंने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर धारा-352 के तहत देश में आतरिक आपातकाल लगाने का फैसला किया. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और इंदिरा गांधी के सहायक आर के धवन कहते हैं कि अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार हो तो वो सिद्धार्थ शंकर रे थे, जिनका रोल सबसे अहम था 29 जून को कांग्रेस विरोधी ताकतों ने हड़ताल का आव्हान किया था इसलिए 25 जून को इमरजेंसी लगानी पड़ी क्योंकि पहले से ही हालत काफी खराब थी।
इमरजेंसी लागू कर तत्कालीन सरकार ने सत्ता सुख के लिए देश को जेलखाना बना दिया था। 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में सारे विपक्षी नेताओं को जेल,
मीसा-डीआईआर का कहर
मीसा (मेंटेनेंस ओफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के नाम से इस विवादित कानून को 1971 में इंदिरा गांधी सरकार ने पास करवाया था. इसके बाद सरकार के पास असीमित अधिकार आ गए, पुलिस या सरकारी एजेंसियां कितने भी समय के लिए किसी को प्रिवेटिव गिरफ्तारी कर सकती थीं, किसी की भी तलाशी बिना वारंट ली जा सकती थी।
सरकार के लिए फोन टैपिंग भी इसके जरिए लीगल बन चुकी थी. अपातकाल के दौरान 1975 से 1977 के बीच इसमें कई बदलाव भी किए गए, आपातकाल के दौरान इसका जबरदस्त तरीके से दुरुपयोग किया गया।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के तहत 100 से अधिक बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई जिसमे जयप्रकाश नारायण, विजयाराजे सिंधिया, राजनारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह कृपलानी, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जॉर्ज फर्नाडीज, मधु लिमये, ज्योति बसु, समर गुहा, चंद्रशेखर, बालासाहेब देवरस, मामा बालेश्वर दयाल, कुशाभाऊ ठाकरे, श्री सुदर्शन जी और बड़ी संख्या में सांसद और विधायक शामिल थे। सरकार का विरोध करने पर दमनकारी कानून मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख ग्यारह हजार लोग जेल में ठूंस दिए गए खुद जेपी की किडनी कैद के दौरान खराब हो गई. कर्नाटक की मशहूर अभिनेत्री डॉ स्नेहलता रेड्डी जेल से बीमार होकर निकली, बाद में उनकी मौत हो गई. उस काले दौर में जेल यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी के सभी सलाखों के पीछे डाल दिए गए, एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गई. बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला लालू-नीतीश और सुशील मोदी जैसे बिहार के नेताओं ने इसी पाठशाला में अपनी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पढ़ाई की। हजारों कार्यकताओं के परिवारों ने भी यातनाएं भुगती थी तथा बहुत सारे साथी दिवंगत भी हो गए। इंदौर जेल में म.प्र. नीमच के बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी कहते थे की अब हमारी लाशें ही बाहर जायेगी। आपातकाल में सरकार विरोधी लेखों की वजह से कई पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। आपातकाल की घोषणा के बाद एक प्रमुख अखबार ने अपने पहले पैज पर पूरी तरह से कालिख पोतकर आपातकाल का विरोध किया। आपातकाल में जेल गए पत्रकार केवल रतन मलकानी, कुलदीप नैयर, दीनानाथ मिश्र, वीरेंदर कपूर एवं विक्रम राव प्रमुख थे और सैकड़ों पत्रकारों की नौकरी चली गई थी। इंदौर शहर से प्रकाशित नईदुनिया ने सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाई थी। जो अफसर प्रतिदिन प्रेस के चक्कर लगाते थे। उन्होंने रात 12 बजे प्रेस पर धावा बोल दिया । उस समय प्रकाशचंद सेठी म. प्र. के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने अपने विरोधियों को भी जेल में डालने का काम किया था।
मीसा बंदियों को पेंशन
अपातकाल के दौरान ही गैर कानोसी राज्यों की सरकार मीता में बंद किए गए लोगों को पेशन देने का काम करती थी।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकारों ने डीआरआई और मैसा में बंद कैदियों को 10-15 हजार रुपये पेंशन देता शुरू किया। इसके बाद साल 2014 में राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार में भी 800 मीस बंदियों को 12 हजार रुपये प्रति माह की पेंशन देने का फैसला किया। बीजेपी देशभर में आज भी आपातकाल की बरसी पर मीसा बदियों को सम्मानित करती है। म.प्र. सरकार ने मीसा बंदियों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर सम्मानित भी किया है। है कि आज म.ए. सरकार ने उन्हें भी मीलबंदी सन लिया है जो एक दिन के लिए भी गिरफ्तार नहीं हुए थे।
कई छात्र नेता भी इंदौर जेल में बंद किये गए थे। आपातकाल का वो दौर इतना भयानक था कि कांग्रेस भी अब उसे भूल मानती है लेकिन उस वक्त की बगावत जैसे हालात की दुहाई भी दी जाती है तो क्या देश में सचमुच बगावत के हालात बन रहे थे? सच ये है कि सरकार की नीतियों की वजह से महंगाई दर 20 गुना बढ़ गई थी. गुजरात और बिहार में शुरू हुए छात्र आंदोलन से उद्वेलित जनता सड़कों पर उतर आई थी. उनका नेतृत्व कर रहा था सत्तर साल का एक बूढ़ा जयप्रकाश नारायण जिसने इंदिरा सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। जयप्रकाश नारायण ने इसे ‘भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ बताया था। जयप्रकाश जी के आह्वान से प्रेरित होकर देशभर से कई महिलाओं और पुरुषों ने खुद को लोकतंत्र बचाने के आदोलन में झोंक दिया। आपातकाल के दौर
पैनल कोर्ट की धारा 124 चली आ रही है कि की धारा के समय से
वहीं वरा लाभावीध में लगाई गई अपने देश से हटा दी है विटिश सरकार ने देश में जरी सुप्रीम कोर्ट ने वेवास्ता सिंह विहार केले में के देशद्रोह काल तामी में कभी होना चाहिए। व्यापक की सरकार को पहले ही सुप्रीम कोर्ट बताकर है। सरकार फॉलो करे अन्याया हमारे पास केस अप तो हम रद कर देंगे।
देश को वहुत प्रतिशत नागरिक अब भी इमोन्टी जैसा महदूत करते है। अहको बाहर है यह सरकार भी क्यों? जोकि कई संविध क्षेत्र की यही बात रखाना चाहते है तो उन्हें के जरिये रोक दिया जाता है और कहा कि पार्टी फोरम पर बोल सकते है पर सार्वजनिक नहीं बताते है। पेटा समीराजाको नहीं। रिशप के काराा क्षेत्रको विधानसभा में उठ नहीं पाती है। में बातें साप ही
राजीतिक दलों के पये में पेरेंसी हो वे बोला है। हसको पहचारी को B०% चया मिल्न और बाराबदल 20 में बिजय चंदा देने वालों में डर बहुत जाया है इस बात से पता चलता है। के इलेक्ट्रॉनिक कोड सिपाही सकती है पर किसी भी राजनितिक दल को नहीं मिलती। ये ब एकन फिर से उठ रहे है।
की तानाशाही के विरोध में ‘लोक संघर्ष समिति’ बनायी गयी। इसके बैनर तले सत्याग्रह हुआ, जिसमें देश भर में डेढ़ लाख लोगों ने गिरफ्तारी दी। इंदिरा जी ने सबको बंदकर सोचा कि अब आंदोलन दब गया है। अतः उन्होंने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये। जेल में बंद नेताओं ने जनता पार्टी’ के बैनर पर चुनाव लड़ने का निश्चय किया गया। अधिकांश बड़े नेता तो हिम्मत हार चुके थे, पर जब उन्होंने जनता का उत्साह देखा, तो वे राजी हो गये। इंदिरा गांधी की भारी पराजय हुई। चुनाव के बाद जनता पार्टी का शासन आया जनता पार्टी ने अपने वाई वर्ष के कार्यकाल में संविधान में ऐसे प्रावधान कर दिये, जिससे फिर आपातकाल न लग सके। 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आते ही उन्होंने इस कानून को रद्द कर दिया। इस कानून में आपातकाल के दौर में बंद लोगों को मीसाबंदी कहा गया।
(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक अग्नि आलोक के संपादक हैं)