तेजपाल सिंह ‘तेज’
17 नवंबर को दिल्ली में आयोजित रामनाथ गोयनका व्याख्यानमाला के छठे संस्कार समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में यह कहा कि भारत को “मैकाले की मानसिक गुलामी” से मुक्त होना होगा। उन्होंने दावा किया कि 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट कर दिया और भारतीयों को अपनी जड़ों से काट दिया। इस बयान ने देश में एक महत्वपूर्ण वैचारिक बहस को जन्म दिया—विशेष रूप से बहुजन समाज के लिए, जिसके इतिहास में अंग्रेजी शिक्षा एक निर्णायक मोड़ रही है।
प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य को केवल एक राजनीतिक घोषणा के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा के चरित्र और दिशा पर गहरे प्रभाव डालने वाली वैचारिक टिप्पणी के रूप में समझा जाना चाहिए। क्योंकि प्रश्न यह उठता है कि मैकाले की शिक्षा को “गुलामी” कहकर आज की सत्ता कौन-सी शिक्षा व्यवस्था को पुनर्स्थापित करना चाहती है—वह आधुनिक व्यवस्था जिसने बहुजनों को पहली बार शिक्षा, कानूनी चेतना और समानता का अधिकार दिया, या वह
परंपरागत वर्णवादी शिक्षा जिसमें ज्ञान केवल कुछ उच्च जातियों की निजी संपत्ति था?
भारत का इतिहास यह गवाही देता है कि शिक्षा किसी भी समाज की दिशा तय करती है—वह या तो मुक्ति का द्वार बन सकती है, या गुलामी की दीवार। यही कारण है कि आज, जब देश की सर्वोच्च सत्ता यह दावा करती है कि भारत को “मैकाले की मानसिकता” से मुक्त करना है, तो बहुजन समाज के सामने कई गंभीर और स्वाभाविक प्रश्न खड़े होते हैं। क्या इस “मुक्ति” का अर्थ आधुनिक, वैज्ञानिक, समानतावादी शिक्षा को छोड़कर उस प्राचीन वर्णवादी शिक्षा-व्यवस्था की ओर लौटना है, जहाँ ज्ञान केवल कुछ जातियों की जागीर था?
भारत के इतिहास में शिक्षा हमेशा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं रही; यह सत्ता, अधिकार और सामाजिक संरचना को नियंत्रित करने का भी सबसे बड़ा साधन रही है। इसलिए जब आज देश की सत्ता यह कहती है कि “हमें मैकाले की मानसिकता से मुक्त होना है”, तो यह सवाल स्वाभाविक हो उठता है कि आखिर यह “मुक्ति” किस दिशा में ले जानी है—आधुनिकता और समानता से आगे, या फिर पुराने वर्णवादी ढाँचे की ओर पीछे?
मैकाले का हस्तक्षेप: हज़ारों वर्षों की जातिगत शिक्षा व्यवस्था पर पहली चोट:
1834 में भारत आए थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने 1835 में अपने प्रसिद्ध दस्तावेज़ “मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन” के माध्यम से भारत की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा देने का प्रस्ताव रखा। यह वह निर्णय था जिसने सदियों से प्रचलित ब्राह्मणवादी शिक्षा संरचना की नींव हिला दी। संस्कृत, अरबी और फारसी पर आधारित गुरुकुल और मदरसा प्रणाली उस समय केवल कुछ जातियों तक सीमित थी; समाज का विशाल बहुजन वर्ग उससे पूरी तरह बाहर था। ऐसे समय में अंग्रेज़ी भाषा, आधुनिक विज्ञान, तर्कशास्त्र और साहित्य को शिक्षा का केंद्र बनाने का विचार किसी क्रांति से कम नहीं था। ब्रिटिश प्रशासन का उद्देश्य भले ही औपनिवेशिक शासन के लिए प्रशिक्षित कार्यबल बनाना रहा हो, पर अनपेक्षित रूप से यह परिवर्तन उन समुदायों के लिए द्वार खोल गया जिन्हें सदियों से शिक्षा से वंचित रखा गया था।
संक्षेप में कहें तो यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब पहली बार ब्राह्मणवादी गुरुकुल-केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था की वैचारिक दीवार हिली। मैकाले ने संस्कृत, अरबी और फारसी केन्द्रित शिक्षा को “सीमित, अप्रासंगिक और अनुपयोगी” बताया और तर्क दिया कि—
· शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो,
· विषय आधुनिक हों—विज्ञान, तर्क, साहित्य, आधुनिक दर्शन,
· और शिक्षा का लाभ सभी भारतीयों को मिले, न कि केवल ऊँची जातियों को।
उनका उद्देश्य प्रशासनिक ढाँचे के लिए ‘अंग्रेज़ी मानसिकता वाले भारतीय’ तैयार करना था। हाँ, अंग्रेज़ शासन शोषक था, परन्तु विरोधाभास यह है कि उनकी शिक्षा नीति ने पहली बार बहुजनों, शूद्रों, दलितों, महिलाओं और किसानों को वह अवसर दिया जिसे मनुस्मृति-नियंत्रित समाज ने हजारों वर्षों तक उनसे छिपाकर रखा था।
भारतीय दंड संहिता—मनुस्मृति के असमान ढांचे पर प्रहार:
मैकाले 1837 में भारतीय दंड संहिता (IPC) का मसौदा भी तैयार करते हैं। मनुस्मृति में दंड जाति के आधार पर तय था—ब्राह्मण को क्षमा, शूद्र को कठोर दंड। IPC बिल्कुल उलट था–
· अपराध समान हो तो दंड भी समान।
· धर्म, जाति, वंश—किसी का प्रभाव नहीं।
यह आधुनिक भारत की कानूनी चेतना की शुरुआत थी।
मनुस्मृति के विरोध में नया कानूनी ढाँचा:
शिक्षा के बाद मैकाले का दूसरा बड़ा योगदान भारतीय दंड संहिता का प्रारूप तैयार करना था। जहाँ मनुस्मृति में दंड जाति के आधार पर तय होते थे—ब्राह्मण के लिए विशेषाधिकार और शूद्रों के लिए कठोर दंड—वहीं भारतीय दंड संहिता इस भेदभाव को समाप्त करने वाली पहली आधुनिक कानूनी संरचना थी। समान अपराध के लिए समान दंड का सिद्धांत भारत के सामाजिक न्याय के इतिहास में एक मील का पत्थर बना। सदियों की असमानता को चुनौती देने वाला यह परिवर्तन भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने की दिशा में पहला कदम था।
इसी शिक्षा से जन्मीं वे क्रांतियाँ जिनके बिना आधुनिक भारत की कल्पना नहीं:
अंग्रेजी शिक्षा के द्वार खुलते ही बहुजन समाज में नई चेतना जागी। ज्योतिबा फुले इस चेतना के प्रतीक बने। अंग्रेजी शिक्षा ने उनकी दृष्टि को व्यापक बनाया, जिससे वे जाति-आधारित अन्याय को एक संरचना के रूप में समझ सके और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण कर सके। इसी समझ ने उन्हें 1848 में देश का पहला बालिका विद्यालय खोलने की प्रेरणा दी—एक ऐसा कार्य जिसने महिलाओं और दलित-बहुजन समुदायों के लिए शिक्षा का वास्तविक रास्ता खोला।
फुले के लिए अंग्रेज़ी शिक्षा केवल ज्ञान नहीं थी; वह ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक वैचारिक हथियार थी। उनकी पुस्तक “गुलामगिरी” यह स्पष्ट करती है कि ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था बहुजनों को शिक्षा देकर कभी भी सशक्त नहीं करना चाहती थी। अंग्रेजी शिक्षा इसलिए उनके लिए मुक्ति का माध्यम बनी।
बिंदुवार उल्लेखनीय है कि इसी शिक्षा से जन्मे फुले और अंबेडकर जैसा युग-नायकत्व
ज्योतिबा फुले पहले सामाजिक सुधारक थे जिनकी आँखें अंग्रेजी शिक्षा के कारण खुलीं। उन्होंने समझा कि ब्राह्मणवाद के बंधन को तोड़ने का एकमात्र रास्ता—आधुनिक शिक्षा है। इसी शिक्षा ने उन्हें—
· बालिका विद्यालय खोलने,
· बाल-विवाह का विरोध करने,
· विधवा विवाह का समर्थन करने,
· और जाति-उन्मूलन की क्रांति करने में सक्षम बनाया।
“गुलामगिरी” में फुले स्पष्ट लिखते हैं—ब्रिटिश शिक्षा ने वह दिया जो ब्राह्मणों ने कभी नहीं दिया और वह है –ज्ञान, तर्क और मुक्ति का मार्ग।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन इस ऐतिहासिक परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रमाण है। यदि अंग्रेज़ी शिक्षा और विदेश में उच्च शिक्षा का अवसर उन्हें न मिला होता, तो शायद भारत को वह महामानव न मिलता जिसने आधुनिक भारत की सामाजिक-राजनीतिक नींव रखी। अंबेडकर ने स्वीकार किया कि अंग्रेजी शिक्षा ने बहुजन समाज को कानूनी चेतना और समानता की समझ दी, जिसने उन्हें अन्याय के विरुद्ध संगठित होने की शक्ति दी।
ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के बिना डॉ. अंबेडकर जैसा व्यक्तित्व संभव नहीं था। अंग्रेजी शिक्षा और विदेश में उच्च अध्ययन ने उन्हें वह वैचारिक शक्ति दी जिससे उन्होंने—
· वंचित समाज को कानूनी चेतना दी,
· जाति व्यवस्था की जड़ों को चुनौती दी,
· और दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान रचा।
डॉ. अंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि अंग्रेजी शिक्षा बहुजनों के लिए हथियार थी—ब्राह्मणवाद के खिलाफ, शोषण के खिलाफ, अंधविश्वास के खिलाफ। फुले और अंबेडकर की आलोचनाएँ—अंग्रेज़ भी शोषक थे, पर…दोनों ने यह भी स्वीकार किया कि ब्रिटिश नीतियाँ पूरी तरह न्यायपूर्ण नहीं थीं—
· कर भार किसानों पर डाला गया,
· उच्च पदों पर ब्राह्मणों की नियुक्तियाँ जारी रहीं। लेकिन उनके बावजूद, शिक्षा का द्वार पहली बार सबके लिए खुला। यह ऐतिहासिक सच है जिसे कोई भी नकार नहीं सकता।
फुले और अंबेडकर की संतुलित दृष्टि: समर्थन भी, आलोचना भी:
यह भी उतना ही सत्य है कि फुले और अंबेडकर ने अंग्रेजी शासन को पूर्णतः आदर्श नहीं माना। उन्होंने स्वीकार किया कि ब्रिटिश सरकार कई बार ब्राह्मणों के प्रभाव में कार्य करती है, किसानों पर कर बढ़ाती है, और प्रशासन में ऊँची जातियों को प्राथमिकता देती है। लेकिन इन आलोचनाओं के साथ-साथ दोनों इस बुनियादी तथ्य को भी मानते थे कि अंग्रेजी शिक्षा ने बहुजनों के लिए वह दरवाजा खोला जिसे मनुवादी समाज ने हज़ारों वर्षों से बंद कर रखा था। अंग्रेज़ों के इरादे चाहे कुछ भी रहे हों, पर उनका प्रभाव बहुजन समाज के लिए मुक्ति का आधार बना।
आज का भारत: शिक्षा के नाम पर मनुवाद की वापसी का खतरा?
अब प्रश्न यह है कि जब प्रधानमंत्री यह कहते हैं कि “हमें मैकाले की मानसिकता से मुक्त होना है”, तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ यह है कि—
· हम फिर उस शिक्षा प्रणाली में लौटें जहाँ वेदों-पुराणों के बाहर कुछ नहीं था?
· जहाँ महिलाओं को शिक्षा नहीं, केवल सेवा और आज्ञापालन सिखाया जाता था?
· जहाँ बहुजन समाज को ज्ञान से दूर रखा जाता था?
· जहाँ पद, नौकरी और अधिकार योग्यता के आधार पर नहीं, जाति के आधार पर तय होते थे?
क्या आधुनिक, वैज्ञानिक, समान अवसर वाली अंग्रेजी शिक्षा को “गुलामी” कहकर उसकी जगह वर्णवादी शिक्षा प्रणाली को स्थापित करने की तैयारी की जा रही है? आज जब भाजपा सरकार “भारतीय ज्ञान प्रणाली” के नाम पर शिक्षा में गहरे बदलाव कर रही है, तो बहुजन समाज को यह समझना होगा कि—
· क्या यह बदलाव ज्ञान का लोकतंत्रीकरण है या
ब्राह्मणवादी ज्ञान-एकाधिकार की पुनर्स्थापना?
· क्या यह शिक्षा सुधार है या
मनुवाद को पुनर्जीवित करने की रणनीति?
जब आज प्रधानमंत्री यह घोषणा करते हैं कि भारत को “मैकाले की मानसिक गुलामी” से मुक्त करना है, तो यह सवाल उठता है कि इस “मुक्ति” की वास्तविक दिशा क्या है। क्या यह मुक्ति—
· आधुनिक, वैज्ञानिक और समान अवसर आधारित शिक्षा से दूर जाने की तैयारी है?
· उस शिक्षा मॉडल में लौटने की कोशिश है जहाँ ज्ञान वेद-पुराण और कर्मकांडों तक सीमित था?
· वह व्यवस्था फिर से स्थापित करने का प्रयास है जहाँ ज्ञान, पद और अधिकार योग्यता से नहीं, बल्कि जाति से निर्धारित होते थे?
अभी जो परिवर्तन “भारतीय ज्ञान प्रणाली”, “परंपरा आधारित शिक्षा” और “राष्ट्रवाद-केन्द्रित पाठ्यक्रम” के नाम पर किए जा रहे हैं, उनमें यह खतरा छिपा है कि शिक्षा फिर से एक विशेष सामाजिक वर्ग के नियंत्रण में चली जाए। यह वही वर्ग है जिसने सदियों तक शिक्षा को अपने वर्चस्व का साधन बनाकर समाज के विशाल हिस्से को अज्ञान और गुलामी में धकेलकर रखा।
बहुजन समाज के सामने आज का सबसे बड़ा प्रश्न:
बहुजन समाज को स्वयं से यह पूछना होगा—
· क्या हम उस सोच से मुक्त होना चाहते हैं जिसने फुले, सावित्रीबाई, अंबेडकर जैसे युगनायक दिए?
· या उस सोच को अपनाना चाहते हैं जिसने बहुजनों को हजारों वर्षों तक शिक्षा, सम्मान और अधिकार से वंचित रखा?
आज का समय केवल राजनीतिक बहस का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना का है। यदि शिक्षा फिर से किसी एक जाति, एक विचारधारा या एक पुजारी वर्ग की बपौती बन गई, तो बहुजन समाज को सबसे बड़ा नुकसान होगा। इसलिए यह संघर्ष केवल इतिहास का नहीं—भविष्य का संघर्ष है।
आज बहुजन समाज को यह तय करना है कि वह किस सोच को अपनाना चाहता है—
क्या वह उस आधुनिक सोच से मुक्त होना चाहेगा जिसने फुले, सावित्रीबाई और अंबेडकर जैसे महापुरुषों को जन्म दिया? या वह उस सोच को वापस लाना चाहेगा जिसने बहुजनों को ज्ञान, शिक्षा, अधिकार और सम्मान से वंचित रखा? यह केवल शिक्षा का सवाल नहीं—भविष्य का सवाल है। यदि शिक्षा फिर से किसी एक जाति या विचारधारा की जागीर बन गई, तो बहुजन समाज को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए आज का संघर्ष इतिहास की रक्षा का नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का है। शिक्षा बताएं, समानता बताएँ, संविधान बचाएँ।
(संदर्भ : MNT News ttps://www.facebook.com/share/v/17ooKH8jwq/)

