शशिकांत गुप्ते
आज यकायक सन 1951 में प्रदर्शित फ़िल्म बहार के इस गीत का स्मरण हुआ। यह गीत अभिनेत्री वैजयंतीमाला पर फ़िल्मया है। गीत को स्वरबद्ध किया लता मंगेशकरजी ने
इसे लिखा है गीतकार राजेद्रकृष्णजी
दुनिया का मजा लेलो
दुनिया के बाप हो तुम
दुनिया तुम्हारी है
यह दुनिया तुम्हारी है
दुनिया से डरोगे तो
यह दुनिया दबायेगी
आँखे दिखाएगी रौब जमायेगी जी हँसि उड़ाएंगी
चैन ना लेने देगी जान जलायेगी
तान के सीना चलो
दुनिया तुम्हारी है
यह दुनिया तुम्हारी है
दुनिया का मजा ले लो
गीत की उक्त पंक्तियों को गुनगुना रहा था, उसी समय मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी का आगमन हुआ।
मेरे मुँह से उक्त के बोल सुनकर सीतारामजी हँसने लगे।
हँसते हुए कहने लगे मजे लेने के लिए सत्तर वर्ष पीछे जाने की ज़हमत क्यों उठातें हो।
वर्तमान में देश में सर्वत्र हास्यव्यंग्य का ही माहौल चल रहा है।
हाथ कंगन को आरसी क्या…..।
अभी टी वी ऑन करो देखों हास्य और व्यंग्य का एक साथ आनंद मिलेगा।
सीतारामजी की बात सुनकर मैने टीवी ऑन किया।
सीतारामजी ने न्यूज चैनल लगाने के लिए कह।
न्यूज चैनल ऑन करते ही देखा कोई विरोधी पक्ष का विरोधी महंगाई पर अपना आक्रोश प्रकट कर रहा था।
ठीक उसी समय दूसरें न्यूज चैनल पर क्रिकेट प्रेमियों को क्रिकेट मैच देखने के महंगे टिकिट खरीदने की लंबी कतार दिखाई दे रही थी।
एक समाचार देख और सुनकर तो मै हदप्रभ हो गया? महंगी मोटर कार और मोटरसाइकिल की बेतहाशा बिक्री होते दिखाई दे रही थी।
एक विरोधी बेरोजगरों की समस्या पर क्रोध प्रकट रहा था। दूसरी ओर राजनैतिक रैलियों में तादाद बढाने के लिए दिहाड़ी मजदूरों को बाकायदा पारिश्रमिक देकर बसों और ट्रकों में भरकर रैली स्थल पर ले जया जा रहा है। यह दृश्य देखकर सीतारामजी ने कहा यह भी एक व्यापार है। यह व्यापार आरपार लोग ही कर सकतें हैं।
सीतारामजी ने ताक़ीद दी कि,अब आरपार का मतलब मत पूछना।
एक दृश्य ने मेरी मानस को झकझोर कर रख दिया। इस दृश्य में कुपोषण से पीड़ित कृशकाय बच्चें दिखाई दिए। इस समाचार के पूर्ण होते ही एक विज्ञापन में माँ अपने बच्चे को पौष्टिक पेय पिलाकर तंदुरुस्त कर रही है।
मैने कहा ऐसे तंदुरुस्त बच्चे प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए भारी भरकम स्कूल बैग उठाने में सक्षम हो जातें हैं।
बड़े होने पर इन्ही बच्चों को अपने माँ बाप बोझ लगतें हैं। वृद्धाश्रम की सुविधा मुहैया है ही?
सीतारामजी ने क्रोधित होते हुए कहा कि हर एक मुद्दे पर व्यंग्य करना ठीक नहीं है।
ऐसा करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग होता है?
मैने कहा इनदिनों विवेकहीन लोगों की स्मृति मलिन हो गई है। विवेकहीन लोग ही स्वामी विवेकानंद का नाम ले रहें हैं। और उनके इतिहास को तोडमोरोड कर प्रस्तुत कर रहें हैं।
सीतारामजी ने कहा आप भी अपनेअंदर के व्यंग्यकार को रोक नहीं पाते हो?
चर्चा को यहीँ विराम देते हुए,चाय बिस्कुट ग्रहण कर सीतारामजी रवाना हो गए।
जाते जाते कह रहे थे मै अभी और भी रुकता लेकिन बात निकलती है दूर तलक जाती है। व्यंग्य का रायता ज्यादा नहीं फैलाना चाहिए।
जय जय सियाराम।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

