(लेखक सुरेश जैन (आई.ए.एस.) विभिन्न नगरों में स्वयं कलैक्टर और पत्नी न्यायमूर्ति विमला जैन उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहीं। जिम्मेवारी के पदों पर रहते हुए भी आप दोनों समाज सेवा में संलग्न रहे। तथा सेवानिवृत्ति के उपरांत भी 75-77 की आशु में युवाओं की भांति कियाशील समाजसेवा में संलग्न हैं तथा शानदार जीवन जी रहे हैं। आपके स्वयं के अनूभूत पल प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक के लिए संजीवनी के समान औषधि का कार्य करने वाले मार्गदर्शक, प्रेरक व अनुकरणीय हैं। -मनुज )
हम अपने ऐसे वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान करें, जो क्रियाशील रहते हैं, अपने समय, अनुभव, ज्ञान और कौशल का सदैव सदुपयोग करते हैं। स्वस्थ तथा प्रसन्न रहते हैं। सांध्यप्रकाश में पावन गोधूलि को प्रणाम करते हुए अपने अमृतकाल का आनन्द लेते हैं। अस्सी के दशक में यात्रा करते हुए हम अपने जीवन के अमृतकाल के तृतीय वर्ष में अपनी आत्मा के अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं।
75 वर्ष पूर्ण होते ही हमारे जीवन का अमृतकाल (75-100) शुरू होता है। इस काल का आध्यात्मिक महत्व है। यह अपनी आत्मा के सन्निकट रहकर आत्मा की उपासना का काल है। पर्व है। महापर्व है। अद्भुत समय और विशिष्ट अवसर है। जन-जन के समक्ष विविध आदर्श समुपस्थित करने का अच्घ्छा अवसर है। अलौकिक आध्यात्मिक आनन्द प्राप्त करने का काल है। क्रोध, मान, माया और लोभादिक कषायों के प्रशमन का काल है। क्षमा और समतापूर्वक जीवन जीने का काल है। अपने मन में उलझी हुई राग और द्वेष की ग्रन्थियों को सुलझाने का समय है। सबकी भूलों को क्षमाकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का समय है। गीता में दिए गए श्रीकृष्ण के उपदेश को आत्मसात् कर प्राणीमात्र को अपने तुल्य समझने का अवसर है। सभी प्राणियों के साथ हमारी मित्रता है, किसी के साथ वैर नहीं है – महावीर के इस सिद्धांत को आत्मसात् करने का पर्व है। हिंसक प्रवृत्तियों को त्यागकर अहिंसक जीवनशैली अपनाने का काल है। विविध अहिंसक प्रयोग करने का अवसर है। पीछे मुड़कर स्वयं को देखने का स्वर्णिम अवसर है। अहंकार और ममकार के विसर्जन का काल है। आत्म-शोधन और आत्मोत्थान का पर्व है। आत्म-चेतना को जागृत करने का महापर्व है।
हम अपना उद्देश्य पूर्ण जीवन प्रसन्नता पूर्वक जियें। धीरे-धीरे भौतिक जगत से ऊपर उठते हुए आध्यात्मिक जीवन जियें। हम अपने शरीर को सही ढंग से संचालित करते रहें। घड़ी को टिक-टिक करने दें। बढ़ती आयु की चिंता न करें। अपनी धारणा के अनुरूप ही अपनी आयु का मूल्यांकन करें। उम्र के सूचक समंक के प्रतीक संख्यावाची वर्ष की ओर ध्यान न दें।
अपनी जीवटता के कौशल को सीखें और निरंतर अभ्यास से निखारें। अपनी कमजोरियों को दूर करें। अकेलापन महसूस होने पर अपने मित्रों से चर्चा करें। सामाजिक मेल मिलाप बढ़ाएँ। स्वयं से मित्र की भांति बात कर अकेलेपन को दूर करें। अपनी इन्द्रियों पर अपना ध्घ्यान केन्द्रित करें। विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करें।
यह उल्लेखनीय है कि अपनी आयु के सत्तर के दशक में इसकान मूवमेंट के जनक श्री प्रभुपाद ने भगवत-गीता की विशद व्याख्या की। अतः जीवन पथ में आगे बढ़ते हुए उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम नया कार्य चालू करने में तनिक भी संकोच न करें। ऐसे कार्य में हमें सफलता निश्चित ही प्राप्त होगी। अपने उत्तराधिकारियों को अपनी संपत्ति का हस्तांतरण करते समय यह ध्यान रखें कि वारेन बफे ने अपनी 100 बिलियन डालर से अधिक संपत्ति में से 99 प्रतिशत दान कर दी और केवल 1 प्रतिशत अपने बच्चों को दी। बफे ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को इतनी संपत्ति प्रदान की है, जिससे कि वे कुछ भी कर सकते हैं, किन्तु इतना अधिक नहीं दिया कि वे कुछ न कर सकें। हममें से अनेक वरिष्ठ नागरिक सौभाग्यशाली हैं कि हमारे पुत्र और पुत्रियॉं अपने माता-पिता की दौलत प्राप्त करने की अपेक्षा ही नहीं रखतीं हैं।
हम अपने परिवार के सदस्यों में संस्कारों का बीजारोपण और संवेदनाओं का संपोषण करें। उन्हें अपनेपन, त्याग और सहजीवन की सीख दें। परिवार में रहकर ही सुघड़ व्यक्तित्व का निर्माण होता है। सर्वाधिक भावनात्मक संतुष्टि हमें अपने परिवार से ही मिलती है। अनेक परिवार मिलजुल कर समाज का निर्माण करते हैं। प्रत्येक समाज की स्थिरता और प्रगतिशीलता सभी परिवारों की एकता पर टिकी रहती है। अतरू हम स्घ्वच्घ्छंदता वादी सोच से ऊपर उठकर पारिवारिक टूटन से बचें और सभी को बचाएँ। अपने परिवार और समाज को संगठित करें। पारिवारिक मूल्यों के संस्थापन, पुनर्संस्थापन और संधारण के लिए ठोस प्रयास करें। परिवार के लोगों को अपने घर के आसपास बसाने का प्रयास करें। इससे सभी के बीच एकजुटता बढ़ती है। समय पर सभी तुरंत ही एक दूसरे के काम आते हैं।
वृद्धजन प्रतिदिन हल्की सी कसरत करें। हल्का-फुल्का व्यायाम करें, इससे हमारा दिमाग स्वस्थ और दुरुस्त रहता है। भूलने की बीमारी कम हो जाती है। मस्तिष्क की सिकुड़न रुक जाती है और मस्तिष्क में खून के प्रवाह में वृद्धि हो जाती है। नियमित भ्रमण के साथ-साथ प्रायः एक पैर 90 डिग्री मोड़कर दूसरे पैर के सहारे खड़े होने का अभ्यास करें। हर बार और शायंकालीन भोजन के बाद नियमित रूप से 10 मिनिट टहलें। इससे ब्लडशुगर लेवल कम हो जाता है। अधिक मानसिक श्रम से बचें। इससे हमारे सोचने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। थकान इस बात का संकेत है कि हम जो काम कर रहे हैं, अब उसे बंद कर दें। संतोषजनक और आरामदेय काम की ओर बढ़े। अपने आंगन में पोषण वाटिका बनाएँ। उसमें प्राकृतिक तरीके से सब्जी उगाएँ।
आजकल धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में और कुछ पर्यटन स्थलों पर पैदल यात्रियों की भीड़ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह बड़ी आपदा बनती जा रही है। परिणामतः भीड़ से उत्पन्न भगदड़ जैसी अप्रिय स्थितियों के कारण जन-धन की हानि बढ़ती जा रही है। अतः अब ऐसी स्थिति से बचना आवश्यक होता जा रहा है। ऐसी भीड़ से होने वाली जोखिम के प्रबंधन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ऐसी आपदाओं में समूहों के अमर्यादित और अनुशासनहीन व्यवहार से बड़ी गंभीर परिस्थितियॉं उत्पन्न हो जाती हैं। अतः वृद्धजन ऐसी परिस्थितियों से बचने का प्रयास करें। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि प्रत्येक वर्ष में दिल्ली एयर पोर्ट पर 7 करोड़, मुंबई में 5 करोड़, बंगलौर पर 3 करोड़ और हैदराबाद एयर पोर्ट पर 2 करोड़ यात्री आते जाते हैं। वरिष्ठ नागरिक यात्रा करने का निर्णय लेते समय इन तथ्यों को सदैव ध्यान में रखें।
कोविड के बाद बढ़ती मॅहगाई बुजुर्गों को प्रभावित कर रही है। बढ़ती मॅहगाई से बचत कम होती जा रही है और जीना मुश्किल हो रहा है। उनकी दूसरों पर निर्भरता बढ़ गई है। उनकी हर दिन की लाइफ स्टायल बदल रही है। वे एल्डर-एव्यूज के शिकार हो रहे हैं और उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। बुजुर्गों की देखभाल करने वालों ने उनसे दूरी बना ली है। अतः अनेक वृद्ध व्यक्ति अब निराशा और उदासी में जीने लगे हैं। बेचैनी और हायपरटेंशन के शिकार हो रहे हैं।
वृद्ध जन अपने आपको गंभीरता से लें। अपने बारे में सोचने का समय निकालें। नई भाषा सीखने का प्रयास करें। किसी नए शौक को आगे बढ़ाएँ। अपनी उम्र के सबसे आजाद दौर का पूरा आनन्द लें। अपने मन की बात सुनें। कुछ न कुछ नया सीखते रहें। स्वस्थ आदतें अपनाएँ। अपने ऊपर भरोसा रखें। कुछ न कुछ नया कर दुनिया को दिखाएँ। आत्म-निर्भरता के पथ पर साहसपूर्वक आगे बढ़ते चलें। हमारे जीवन में जटिलताएँ बढ़ने से अनेक चुनौतियॉं उपस्थित हो रही हैं। अतः वृद्धजन उलझनों से निकलने के रास्ते स्वयं बनाएं। अपने असंतोष को परखें। असंतुष्टि के विविध पहलुओं की पहचान कर उनमें बदलाव लाएं। बदलाव लाने में हिचकें नहीं। बच्चों के बाहर और परिवार से दूर जाने से हुए अलगाव के कारण, अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए वृद्धजनों को अनेक संघर्ष झेलने पड़ते हैं। परिणामतः चिंता, उत्तेजना और निराशा जन्म लेने लगती है। ऐसी निराशा से बचें और खुश रहें। खुश रहने से वृद्धजनों का हृदय स्वस्थ रहता है। प्रतिरोधक क्षमता और इम्युनिटी बढ़ जाती है। खुश रहने से बीमारियॉं कम हो जातीं हैं।
भविष्य में अच्छी घटनाएँ होंगी, ऐसी आशा और विश्वास बनाए रखें। छोटी-छोटी बातों में उत्सुकता बनाए रखें। उनमें खुशी प्राप्त करें। इससे हमारा तनाव कम होता है। हमारा मूड बेहतर होता है। छोटी-छोटी खुशियों के विचार आते ही हम बेहतर महसूस करने लगते हैं। भविष्य में होने वाली घटनाओं की अच्घ्छी तस्वीर बनाएँ और खुद को बार-बार दिखाएँ।
खुशहाल बने रहने के लिए महीने में कम से कम एक बार आउटडोर एक्टीविटी करें। परिवार के सदस्यों के साथ प्राकृतिक स्थलों के भ्रमण पर जरूर जाएँ। पिकनिक पर जाएँ। पिकनिक पर जाने के पहले खुशियों की कल्पना करें। पिकनिक की अच्घ्छी स्मृतियों को अपने मस्तिष्क में रखें। अपने परिवार और मित्रों के साथ समय बिताएँ। छोटी-छोटी चीजों का आनन्द लें। पारस्परिक विश्वास को मजबूत करें। यह विश्वास रखें कि दुख में कोई दूसरा मुझे सहारा देकर अवश्य ही उबार लेगा।
संकलन- डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
22/2, रामगंज, जिंसी, इन्दौर
मो. 9826091247

