शशिकांत गुप्ते इंदौर
अंतः Salon खुल गए।यह आधुनिक पीढ़ी को समझने के लिए!Hairdresser की Shop खुल गई।यह फैशनेबल पीढ़ी के लिए।आम आदमी के लिए तो नाई की दुकान खुल गई है।नो हफ्ते बाद सैलून का दृश्य देखने लायक है।स्वेच्छा से हज़ामत बनाने के इच्छुक लोग सैलून पर कतार में खड़े है।सभी को हज़ामत बनावनी है।कतार में खड़े लोगों में प्रमाणित वरिष्ठ नागरिक ही ज्यादा है।हज़ामत बनवाने प्रतीक्षा रत सभी जन बाकायदा निर्धारित दूरी बनाए रखकर खड़े है।प्रतीक्षा में खड़े लोगों आपसे में चर्चा शुरू हुई।एक अनन्य भक्त ने चर्चा शुरू करते हुए कहा कि,तीसरी लहर आएगी? पुनः लॉक डाउन लगेगा?भक्त के उद्बोधन से ऐसा लग रहा था मानो यह सज्जन तीसरी लहर की बाट जोह रहे हैं।तीसरी लहर के स्वागत के लिए आतुर हैं।चर्चा में सहभागी लोग आस्थावान होंगे ऐसा उनकी बातों से प्रतीत हो रहा था।।
आस्थावान लोग सतत भक्ति भाव में लीन रहतें हैं।एक भक्त ने कहा ऐसा अनोख जनसेवक ‘न भूतों न भविष्यति” देश को मजबूती सम्भाल ही लिया साथ विदर्शो की चिंता करते हुए वैक्सीन विदेशों में भी भेजी। भेजी या बेंची? यह बहुत ही संवेदनशील प्रश्न है? भक्तों के बहुमत को देखते हुए, इस प्रश्न को मन में रखना समझदारी है।एक तो भक्ति में इतना भावविभोर हो गया था।भावनाओं में बहते हुए कहने लगा वह बेचारा एकेला क्या करेगा? यह बात सुनकर तो ऐसा लगा कि ऐसे परमभक्त के चरणों में साष्टांगदण्डवत करना चाहिए।
एक ने तो गजब ही कर दिया वह तो रटे रटाए भक्ति संवादों को दोहराने लग गया। “वो तो अच्छा हुआ है, इस व्यक्ति के हाथों में शासन है।यदि उनकी सरकार ( समझने वालों को इशारा ही काफी है) होती तो महामारी के दौरान, चार गुना ज्यादा लोगों की मृत्यु होती।”उसके कथन के भाव में खरीदफरोख्त की झलक प्रतीत हो रही थी मानों कोई कीमती सौदा सस्ते में निपट गया हो।प्रश्न तो यह पैदा हो रहा है कि क्या नदियों में तैरती लाशों की संख्या कम थी?रामनामी चादरों की गिनती की होती तो पता चलता?पुनः समझदारी रखते हुए प्रश्न को मन ही मन मे रखा?
एक भक्त का तो कहना ही क्या?उसने तो भक्ति के भावपूर्ण संवादों की श्रृंखला बगैर पूर्ण विराम के सुनाना शुरू कर दिया।सत्तर वर्ष के शून्य से लेकर न खाऊंगा न खाने दूंगा,अच्छेदिन,महंगाई पर नियंत्रण, 370, तीन तलाक़, दो करोड़ रोजगार,और अंत में नाली (गटर) की महिमा का बखान करते हुए,रटे रटाए संवादों की श्रृंखला सुना दी।एक शायद भक्त नहीं होगा उसने मजाक करते हुए पूछ लिया?सम्भवतः आप सभी को पन्द्रहलाख मिल गए होंगे?सवाल ने बवाल मचा दिया बहस विवाद में तब्दील हो गई।सवाल करने वालें को असहिष्णु, देशद्रोही,के विशेषणों से विभूषित किया जाने लगा।
लेखक क्या करता भक्तों की आपसी चर्चा को ज्यो का त्यों लिखकर अपने आर्ट को साकार करते हुए एक आर्टिकल लिख डाला।प्रतीक्षा का समय जाया नहींहुआ। टाइम पास हो गया और आज के लेख के लिए हज़ामत जैसा महत्वपूर्ण विषय भी मिल।गया।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

