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ऐप्सटाइन स्कैंडल : सुपरहिट शो ‘सेक्स एंड द सिटी’ जैसा लगने लगा है अब वास्तविक अमेरिका

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बी सिवरामन

“स्त्रियों को सामूहिक वासना की वस्तु और दासी बनाने की चेष्टा उस असीम पतन की अभिव्यक्ति है जिसमें पुरुष केवल अपने लिए अस्तित्वमान होता है।”

1844 में कार्ल मार्क्स ने यह बात ‘आर्थिक व दार्शनिक पांडुलिपियों‘ में लिखी थी।

ऐप्सटाइन फाइल्स के सनसनीखेज मामले ने यह उजागर कर दिया है कि अमेरिकी कुलीन वर्ग, व्यापार दिग्गज और उनके राजनीतिक सहयोगी, कितने पतित हैं। इस बुर्जुआ वासना की अधिकांश शिकार, नाबालिग लड़कियाँ हैं और उनकी संख्या हज़ार से ऊपर है। यह एक भयावह अमेरिकी दुस्वप्न है। इस सूची में शामिल गुनहगारों के नाम वैश्विक अभिजात वर्ग के प्रमुख नामों में से हैं। वास्तविक अमेरिका अब सुपरहिट शो ‘सेक्स एंड द सिटी’ जैसा लगने लगा है।

बाल उत्पीड़न की महामारी

यह सिर्फ एक सनसनीखेज सेक्स स्कैंडल नहीं है। यह दर्शाता है कि बुर्जुआ वर्ग की पूरी व्यवस्था किस हद तक भ्रष्ट हो चुकी है। अमेरिका में बाल उत्पीड़न के लिए सख्त सज़ा अपेक्षित है। 1947 का बाल उत्पीड़न रोकथाम और संरक्षण कानून, 2006 का एडम वॉल्श बाल सुरक्षा और बचाव कानून और अमेरिकी राज्यों में अन्य सम्बन्धित कानून ज़ाहिरा तौर पर काफी कड़े हैं। बाल यौन शोषण में लिप्त अपराधियों के लिए 40 साल तक कारावास की सज़ा का प्रावधान है।

पांच राज्य—लुइज़ियाना, साउथ कैरोलाइना, मोन्टाना, ओकलाहोमा और टेक्सस—बच्चों के साथ बलात्कार के मामले में अभी तक सज़ा-ए-मौत का प्रावधान रखते हैं। बावजूद इसके अमेरिका में बाल उत्पीड़न के मामले किसी महामारी के अनुपात के हैं। 

बाल उत्पीड़न पर एक विकिपीडिया पेज के अनुसार, जो कि एस पी हॉल के 2009 के एक शोध का हवाला देता है, अमेरिका में बाल यौन शोषण के लगभग 6 करोड़ पीड़ित हैं। पहले, 1988 में भी अमेरिका में फ्रैंकलिन स्कैंडल नामक बाल उत्पीड़न का एक बड़ा स्कैंडल सामने आया था। तभी से बाल उत्पीड़न के ‘ऑनलाइन’ मामलों की एक लड़ी सी लग गई है।

जैफ़्री ऐप्सटाइन के सेक्स स्कैंडल में भी अमेरिका के न्यायिक विभाग ने अब तक 1200 पीड़ितों की एक सूची तैयार की है, जिनमें अधिकाँश की उम्र यौन संबंधों के लिए सहमति की आयु(एज ऑफ कंसेंट) से कम है। खुद डॉनल्ड ट्रंप आरोपियों की सूची में शीर्ष पर हैं। राष्ट्रपति क्लिंटन, एलन मस्क, बिल गेट्स, और अन्य अमेरिकी उद्योगपति जैसे रिचर्ड ब्रैनसन और लेस्ली बैक्सनर, प्रिंस एंड्रयू, ड्यूक ऑफ यॉर्क, और एंड्रयू माउंटबेटन जैसे अन्य बड़े नाम इसमें शामिल हैं।

‘वाइल्ड वेस्ट’ सच में बहुत ‘वाइल्ड’ है और ऐसा लगता है जैसे यह पशु जगत से भी कहीं अधिक घिनौना है। कम से कम वे अपने बच्चों को नोच नहीं खाते।

अमेरिका में कानून प्रवर्तन का प्रहसन

शक्तिशाली लोगों की विकृतता 1990 के दशक से ही जारी है। बाल उत्पीड़न के टापू का निर्माता, जैफ़्री ऐप्सटाइन दो दशकों से अधिक समय तक कानून को कैसे चकमा दे सका? अमेरिकी मीडिया में उभरी रिपोर्टों में यह उजागर हुआ कि वह सीआईए और इज़रायली इंटेलीजेंस मोसाद के लिए काम कर रहा था। इसीलिए वह सेक्स ट्रैफिकिंग और वित्तीय अपराध दोनों से दोषमुक्त रह पाया। अमीरों के राज में कानून का शासन हो ही नहीं सकता।

कानून आखिरकार तभी उस तक पहुंच पाया जब 2019 में उसकी गिरफ्तारी हुई। लेकिन बाल उत्पीड़न के गिरोह के अन्य सभी अपराधी अभी भी खुले घूम रहे हैं। ‘लैंड ऑफ फ्रीडम’ शायद यही दर्शाता है।

इससे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिका में अभी तक डोनल्ड ट्रम्प और उन अन्य प्रमुख हस्तियों के इस्तीफ़े की मांग को लेकर जनता द्वारा कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ है, जिन्होंने ऐपस्टाइन स्कैंडल में नाबालिगों का यौन शोषण किया, लेकिन बावजूद इसके अपने पदों पर बने हुए हैं। दरअसल, अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रम्प महाभियोग के कगार पर पहुँच गए थे।

‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिवस’ यानि निचले सदन में उन पर महाभियोग चलाया गया था, लेकिन अमेरिकी राजनीतिक अभिजात वर्ग के द्वारा ऊपरी सदन(सीनेट) में किए मतदान ने उन्हें बचा लिया। यह मुख्य रूप से यूक्रेन को दी जाने वाली 40 करोड़ डॉलर की सैन्य सहायता को रोककर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ‘जो बाइडेन’ के खिलाफ जाँच का आदेश देने के अपराध के लिए था। बाल उत्पीड़न का खुलासा इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है। लेकिन फिर भी वह व्हाइट हाउस में आराम से बैठे हैं।

यह अमेरिकी आपराधिक न्यायशास्त्र की हास्यास्पद स्थिति को दर्शाता है। कानून अमीरों और ताकतवरों के मामलों में दखल नहीं दे सकता!

पूंजीवादी बदहाली पर मार्क्सवादियों के विचार

अमेरिकी, और वैश्विक उदारवादियों के भी ज़मीर को ठोस पहुंची है। वे इस नैतिक और एथिकल संकट पर चीख चिल्ला रहे हैं। लेकिन जैसा रूस के प्रतिभाशाली मार्क्सवादी लियॉन त्रोत्सकी ने दिखलाया है, नैतिकता सामाजिक रूप से निर्मित होती है। सत्ताधारी वर्ग एक नियम और एक नैतिक संहिता जनता के लिए परिभाषित करता है और एक अन्य नियम अपने लिए संरक्षित रखता है। पूंजीवादी संस्कृति इसी बुर्जुआ दोमुँहेपन पर आधारित होती है।

मार्क्सवादी परंपरा में, खुद मार्क्स और एंगेल्स ने पूंजीवाद और खासकर के उसके सत्ताधारी पूंजीपति वर्ग के नैतिक और सामाजिक पतन को बखूबी रेखांकित किया था। लेनिन और स्टालिन ने दिखाया कि बुर्जुआ संस्कृति कितनी पतनशील होती है। माओ त्से तुंग ने बुर्जुआ संस्कृति के अवशेषों के खिलाफ एक सच्ची सांस्कृतिक क्रांति चलाई। लेनिन द्वारा इज़ारेदार पूंजीवाद को मरणासन्न अवस्था में वर्णित करने के सटीक कथन पर सवाल उठाए जाते हैं।

अगर ऐप्सटाइन इसी मरणासन्न संस्कृति का प्रतीक नहीं था तो वह और क्या था? डिजिटल युग में इंटरनेट पर सबसे अधिक सर्च पोर्न साइट्स के लिए किए जाते हैं। दुर्भाग्यवश रूप से ये यौन विकृतियां इंटरनेट तक ही सीमित नहीं रहती हैं। यह वास्तविक जीवन में घुस उसे तहस नहस करती है और असहाय महिलाओं को अपना शिकार बनाती है।

फ्रैंकफर्ट स्कूल के अगुआ, मार्क्सवादी और अन्य वामपंथियों ने बुर्जुआ वर्ग के उस सांस्कृतिक उद्योग पर ध्यान केंद्रित किया जो जनता की निम्न स्तर की यौन इच्छाओं को पूरा करता था। बुर्जुआ सांस्कृतिक जीवन के अपने पतन की ओर अग्रसर होने पर अडोर्नो और वॉल्टर बेंजामिन के शब्द, और उनसे पहले लुकाच और ग्राम्शी की रचनाएँ, आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कई नारीवादियों को महिला मुक्ति के ध्वज को आगे ले जाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बुर्जुआ वर्ग के ‘मास कल्चर’ के स्त्री-द्वेषी सार पर प्रकाश डाला।

उन्होंने आधुनिकता के क्षुद्र पक्ष और उसके बाय प्रोडक्ट सेक्सुअल रेवोल्यूशन को उजागर किया, जहाँ यौन दुराचार को आधुनिकता का प्रतीक मान नजरअंदाज किया जाता है। वे सेक्सुअलिटी के प्रश्न पर बुर्जुआ समाज के दोहरे मापदंडों को सामने लाए—महिलाओं के लिए यौन दमन और युवाओं के लिए ‘नियो-विक्टोरियन’ नैतिकता, जबकि बुर्जुआ वर्ग के लिए पूर्णतः यौन अराजकता।

विवाहपूर्व सेक्सुअल संबंध और विवाहेतर व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से हटाना एक बात है, लेकिन बाल शोषण एक अलग ही स्तर का अपराध है और कोई भी सभ्य समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। ऐसे अपराधियों को सभ्य समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है।

महिलाओं का विकृत शोषण

इसके विपरीत, बुर्जुआ वर्ग के नेता स्वयं पतित हैं। बुर्जुआ सांस्कृतिक व्यवस्था में महिलाओं को केवल यौन सुख की वस्तु तक ही सीमित नहीं रखा गया है। उनका ह्रास, यौन उपभोग की वस्तु के रूप में उनके चित्रण से कहीं अधिक है। महिलाओं का प्रत्यक्ष यौन शोषण भी किया जाता है। कैनेडी एक ‘प्लेबॉय’ रहे और इसी कारण वे अपने वर्ग के चहेते थे। गांधी ने अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की क्षमता का परीक्षण करने के लिए किशोरियों के साथ नग्न अवस्था में सोने में कोई संकोच नहीं किया।

और नेहरू एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने संपर्क में आने वाली कई महिलाओं के साथ ‘फ्लर्ट’ किया करते थे और उन्हें ‘सेड्यूस’ करने की कोशिश करते थे। राजगोपालाचारी, पटेल, राजेंद्र प्रसाद और मौलाना अबुल कलाम जैसे नैतिकतावादियों ने स्वतंत्र भारत के इन दो दिग्गजों के खिलाफ शायद ही कभी आवाज उठाई। इस वर्ग के पुरुषों के लिए चुप्पी न केवल एक कोड है बल्कि एक आम वर्गीय नियम है।

मार्क्सवादी और नारीवादी यह तर्क देते हैं कि पूंजीवाद में धन और सत्ता अनिवार्य रूप से महिलाओं पर अधिकार में तब्दील हो जाती है। और इसी अधिकार का प्रयोग उनकी यौन अधीनता में परिणत होता है।

औरतों की सुरक्षा में हिंदुत्व की नाकामी

मोहन भागवत हिन्दू परम्परा के गौरवशाली अतीत पर गर्व कर सकते हैं। लेकिन यही परम्परा देवदासी प्रथा, जिसमें हिंदू समुदाय के द्वारा महिलाओं का सामूहिक यौन शोषण शामिल है, से भी अंकित थी। राजाओं द्वारा अपनी गद्दी बचाने के लिए अपनी बेटियों को विरोधियों के हाथों में दे दिया जाता था। हिंदी पट्टी के कई इलाकों में आज भी हिंदू वधुओं को शादी के बाद उनके पति के पास भेजने से पहले स्थानीय हिन्दू जमींदारों को यौन सेवाएं देने के लिए मजबूर किया जाता है।

लेकिन भागवत और उनके लोग यह मानते हैं कि हिन्दू महिलाएं इसलिए सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि वे घर पे बैठने के बजाय काम पर जाती हैं। एनसीआरबी का डेटा दिखाता है कि भारत में हर 15 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। 1971 और 2012 के बीच दर्ज हुए मामलों में 902 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। सत्ता में 12 साल के दौरान संघ की सबसे बड़ी विफलता महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने की उनकी असमर्थता रही है। उल्टा, इस राज में कुलदीप सेंगर जैसे अपराधियों को फलने फूलने में मदद मिली है।

भागवत अधिक से अधिक यही स्वीकार करेंगे कि समलैंगिक लोग भी इंसान हैं। पर वे इस हद तक नहीं जाएंगे कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का समर्थन करें या एलजीबीटीक्यू समुदाय से किसी को आरएसएस की पंक्तियों में शामिल करें। पर ऐप्सटाइन फाइल्स में उजागर हुए तथ्य पर, कि ऐप्सटाइन द्वारा अनिल अंबानी को एक “ऊंचे कद की सुनहरे बालों वाली स्वीडिश महिला” की पेशकश की गई थी, उनकी चुप्पी ध्यानाकर्षी होगी।

यह बात समझ में आती है, अगर हम याद करें कि जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल, सत्यपाल मलिक ने खुलासा किया था कि उन्हें अनिल अंबानी और आरएसएस के एक बड़े नेता के बीच सौदे को मंजूरी देने के लिए 300 करोड़ रुपए की पेशकश की गई थी। अनिल अंबानी राफेल सौदे में भी अहम भूमिका निभा रहे थे।

जर्मन विचारधारा में मार्क्स ने गौर किया था कि “आधुनिक बुर्जुआ समाज में, व्यवहार में सभी संबंध उस एक अमूर्त मौद्रिक-वाणिज्यिक संबंध के अधीन होते हैं।” धन की शक्ति बुर्जुआ वर्ग को उसके सभी अपराधों से दोषमुक्त कर देती है।

इसी संदर्भ में मार्क्स गोयठे की सराहना करते हुए उन्हें उद्धृत करते हैं:- “मैं कुरूप हूं, लेकिन मैं अपने लिए सबसे सुंदर युवती को खरीद सकता हूं। इसीलिए मैं कुरूप नहीं हूं क्योंकि कुरूपता का प्रभाव—इसकी निवारक शक्ति—पैसे द्वारा निरस्त हो जाती है। मैं बुरा, बेईमान, बेशर्म और बेवकूफ हूँ लेकिन चूंकि पैसा सम्मानित है, इसलिए इसका स्वामी भी। धन सर्वोच्च अच्छाई है इसलिए इसका धनी अच्छा है। धन, इसके अलावा, मुझे बेईमान होने की मेहनत से बचाता है। इसलिए मुझे ईमानदार समझ लिया जाता है।”

इसीलिए ट्रंप, एलॉन मस्क, बिल गेट्स, अनिल अंबानी जैसे थैलीशाह इस मामले से बरी हो जाएंगे और देर-सवेर सम्माननीय व्यक्ति बन जाएंगे।

निजी जिंदगी में ट्रंप सबसे निकृष्ट व्यभिचारियों में से एक है लेकिन उन्होंने पारिवारिक मूल्यों को अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बनाया। यही है बुर्जुआ नेताओं का पाखंड और उनका दोमुंहापन। उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में अपनी प्रतिद्वंदियों हिलेरी क्लिंटन और कमला हैरिस दोनों के खिलाफ कटु और लिंगभेदी व्यक्तिगत टिप्पणियां की। अमेरिकी लोग इसी दुष्ट को अपना समर्थन देने की कीमत आज चुका रहे हैं।

मानव दुराचार होलोकास्ट, वियतनाम या उपमहाद्वीप में बंटवारे की हिंसा के साथ खत्म नहीं हुआ। कलुषता का यह खेल आज हमारी आंखों के सामने खेला जा रहा है। हम सभी इसके मूक दर्शक हैं। हमारी बेटियां सुरक्षित नहीं है इसीलिए वे मुक्त नहीं है। ऐपस्टाइन मामले का खुलासा ट्रंप के रंगीन आपराधिक जीवन में एक मामूली घटना मात्र है। बहुत सारे देशों में अपराधी आज सीधा शासक बन रहे हैं। दुखद यह है कि उन्हें जनता की सहमति प्राप्त है।

बुर्जुआ अभिजात वर्ग द्वारा बाध्य यह राजनीतिक सांस्कृतिक व नैतिक पतन हमें उस खतरनाक नियति की ओर ले जा रहा है जहां तथाकथित प्रबुद्ध समाज ‘एपस्टिनी’ बुराइयों को नजरअंदाज कर देता है। ऐपस्टाइन मामला निर्णायक बिंदु की भूमिका निभाएगा या नहीं इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। 

उच्चतर पूंजीवादी विकास के साथ उन्नतम सामाजिक विकास जिसके फल स्वरुप बेहतर सामाजिक मूल्यों का प्रतिपादन होगा का यह सिद्धांत आज मिथ्या साबित हो चुका है। असलियत इसके उलट है। जितना अधिक विकास होता है उतना ही अधिक दुराचार होता है। इस पर कहाँ और कैसे रोक लगाई जा सकती है? 

आगे क्या?

अपनी वैधता बनाए रखने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को कभी-कभार अपने ही अभिजात वर्ग के एक हिस्से के खिलाफ कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। लेकिन यह काम बहुत सावधानी से किया जाता है। अमेरिकी न्यायिक विभाग द्वारा अत्यधिक विवादास्पद फाइलों को जारी करने के लिए उसे न्याय की मूर्ति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इस कांड से फैले जनाक्रोश के बाद ही उन्हें इन फाइलों को जारी करने के लिए बाध्य होना पड़ा था।

यहाँ तक कि न्यायिक विभाग ने सभी फाइलें एक साथ जारी नहीं की। जनमानस की चेतना में इसके विस्फोटक प्रभाव से वह बचना चाहते थे। उन्होंने दस्तावेजों की भारी मात्रा का बहाना बनाकर फाइलों को चुनिंदा रूप से किस्तों में जारी किया। और एक-एक कर नाम सामने आने लगे। ट्रंप प्रशासन ने उन सभी फाइलों को, जिनमें ट्रंप का नाम था, रोकने की भरपूर कोशिश की। फिर उन्होंने यह तर्क पेश किया कि केवल फाइलों में ट्रंप का नाम होने का तथ्य इस बात का सबूत नहीं है कि वह अपराधी है।

एक ही मिट्टी के बने सभी लोग इस घिनौने बाल शोषण को अंजाम देने के लिए साथ आए थे। ऐपस्टाइन खुद एक धनी फाइनेंसर व अरबपति था। रजनीश जैसे भारतीय सेक्स गुरु पर लौह शिकंजा कसने वाला वही वेस्टर्न एस्टेब्लिशमेंट इस मामले में लंबे समय तक आंखें मूंदता रहा क्योंकि यह मामला उसे आइना दिखा रहा था।

यह मामला विलंबित जांच, सील बंद रिकॉर्ड के माध्यम से लीपा-पोती, पारदर्शिता की कमी और विवादास्पद समझौते के लिए जाना जाता है। ऐपस्टाइन के समझौते के कारण बाल यौन शोषण के इस व्यापक कांड से जुड़े अधिकांश अपराधी अब सुरक्षित है। 

स्कैंडल पर वर्ग की स्पष्ट छाप

ऐपस्टाइन स्कैंडल अन्य अपराधों जैसा नहीं है। इसमें स्पष्ट रूप से वर्ग की छाप थी। इस स्कैंडल का वर्ग चरित्र और भी साफ हो जाता है जब हम इसके अपराधियों और पीड़ितों के सामाजिक चरित्र पर निगाह दौड़ाते हैं। अधिकांश अपराधी अरबपति थे और निर्विवाद रूप से अमेरिकी सत्ता के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों में से थे। इसके विपरीत, पीड़ितों में नाबालिग लड़कियाँ थी जो गरीब तथा प्रवासी पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती थीं। यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि अभी और कितने नाम सामने आएंगे।

मुजरिमों पर भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। अमेरिकी कुलीन वर्ग से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह हारा-किरी(एक तरह की जापानी आत्महत्या) कर ले। यह जाँच एफबीआई और डीओजे द्वारा की जा रही है, जो दोनों ही ट्रंप प्रशासन के अंतर्गत काम करते हैं, न कि किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा।

अभी तक सामने आए दस्तावेजों और कुछ पीड़ितों द्वारा दर्ज की गई गवाहियों ने इस मामले में अमेरिका के कई प्रभावशाली व्यक्तियों को सम्मिलित पाया है। लेकिन अभी तक सिर्फ ऐपस्टाइन और उसके मुट्ठीभर सहयोगियों की गिरफ्तारी ही हो पाई है।

अमेरिकी कुलीनों ने अपना गुस्सा खुद ऐपस्टाइन पर ही निकाला। वे इस बात से दंग रह गए थे कि वह अपने क्लाइंट्स के रिकॉर्ड्स किस ढंग से संभालकर रखता है। ऐसा लगता है कि वे उससे छुटकारा पाना चाहते थे। हालांकि वह उनके लिए एक मनोरंजक था, लेकिन उसका जीवित रहना उनके अस्तित्व और अमेरिकी समाज में उनके पद के लिए खतरा बन चुका था। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जेफरी ऐपस्टाइन की 10 अगस्त 2019 को मैनहट्टन के एक फेडरल डिटेंशन सेंटर में रहस्यमय तरीके से मृत्यु हो गई।

आधिकारिक रूप से, उसकी मृत्यु को “सुसाइड बाय हैंगिंग” करार दिया। लेकिन कई प्रश्न थे जो अनुत्तरित थे। यह अजीब था कि उस डिटेंशन सेंटर में सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे। उचित प्रोटोकोल का पालन नहीं करने का आरोप, जिसकी वजह से वह उस उच्चतम सुरक्षा वाले जेल में खुद को फांसी लगा पाया, जेल के गार्डों के मत्थे मढ़ दिया गया। शायद यही वह विचित्र तरीका है जिससे पूंजीवादी व्यवस्था अपना शुद्धिकरण करती है।

आखिरकार, यह वही देश है जो “न्याय करने के लिए”, थर्ड डिग्री टॉर्चर देने के लिए कुख्यात गुआंतानोमो बे के नाम पर अपनी पीठ ठोकता है। कोई आश्चर्य नहीं कि कुलीनों के मनोरंजन के लिए ऐप्सटाइन का अपना खुद का एक द्वीप था। मनोरंजन का वही खेल आज मुख्यभूमि के ऊपर मंडरा रहा है।

ऐपस्टाइन जा चुका है। उसके साथ, और बातों के बाहर आने का खतरा भी टल चुका है। लेकिन आधिकारिक तौर पर, बचे हुए दोषियों के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई करने का एक भी शब्द जारी नहीं हुआ है। अधिक संभावना यही है कि यह व्यवस्था इस मामले को पूरी तरह दबा दे!

(बी सिवरामन शोधकर्ता और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। अनुवाद : शुभम रौतेला)

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