“द हिंदू” में प्रकाशित कामरेड वृ़दा करात का लेख का हिंदी अनुवाद)
एप्सटीन फाइलों से दस्तावेज़ों के जारी होने ने केवल एक व्यक्ति की विकृतियों को उजागर नहीं किया है। इन दस्तावेज़ों ने राजनीतिक सत्ता, कॉरपोरेट घरानों, वित्तीय संस्थानों, धनाढ्यों और प्रभावशाली लोगों के बीच “बॉन्डिंग” के एक नए मॉडल की काली सच्चाइयों पर रोशनी डाली है। वर्ग-आधारित संरचनात्मक गठजोड़ कोई नई बात नहीं है, न ही अपराध और दंडमुक्ति को विशेषाधिकार की तरह बरता जाना नया है। लेकिन ये फाइलें दिखाती हैं कि सड़ांध कितनी गहरी है—निजी लाभ को समर्पित व्यवस्थाओं में नैतिकता के किसी भी दिखावे तक का लोप हो चुका है।
Jeffrey Epstein अपनी कई अन्य योग्यताओं के अलावा एक पीडोफाइल और दोषसिद्ध यौन अपराधी था। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाता और सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया जाता। लेकिन अमेरिका—जो दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का दावा करता है—वहीं उसकी यही विशेषताएं उसे वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक संबंध विकसित करने के ऐसे मॉडल को गढ़ने में सक्षम बनाते रहे, जिसमें युवतियों और बच्चों का यौन शोषण शामिल था। अमेरिका के धनी श्वेत पुरुष, वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, रूस और यूरोप के बैंकर, पश्चिम एशिया के शेख, और भारत से जुड़े नाम—सभी इन फाइलों में उल्लिखित हैं। यह आवश्यक नहीं कि जिनका नाम आया है वे सभी यौन अपराध पर आधारित “बॉन्डिंग” में शामिल रहे हों। एप्सटीन की सेवाएँ अनेक प्रकार की थीं, सभी यौन नहीं। उनका अपराध यह है कि सत्ता की स्थिति में रहते हुए उनकी निकटता ने उसके इस मॉडल को सामान्य बना दिया।
मिलीभगत और पतन
कई नामित व्यक्तियों के लिए यह उन स्थानों में साझा अनुभवों से जुड़ा था जहाँ नाबालिगों की तस्करी और शोषण होता था। सहभागिता ने आपसी निर्भरता पैदा की, जिसकी गोंद थी गोपनीयता और मिलीभगत। इंटरनेट पर अब सामने आ रहे ईमेल आदान-प्रदान का सरसरी अध्ययन भी दिखाता है कि यौन विकृति की सांकेतिक भाषा किस तरह व्यावसायिक सौदों, वित्तीय लेन-देन, चेतावनी संकेतों की अनदेखी करने वाले बैंकों, और राजनीतिक-आर्थिक संपर्कों तक पहुँच बनाने के संदर्भों के साथ उलझी हुई थी—जहाँ एप्सटीन दलाल और सुगमकर्ता की भूमिका में था। महिलाओं और बच्चों का यौन शोषण लेन-देन का साधन था—नेटवर्क, मुनाफ़े और सत्ता के निर्माण खंड। ये फाइलें पूँजीवाद के नैतिक दिवालियापन की झलक देती हैं।
दोष की विभिन्न डिग्रियाँ हो सकती हैं। कानूनी ढाँचे प्रत्यक्ष अपराध और उकसावे में अंतर करते हैं, और उकसावे की भी अलग-अलग श्रेणियाँ होती हैं। लेकिन 2008 के बाद जो भी एप्सटीन के संपर्क में रहा, उसके लिए अज्ञानता का बचाव टिकता नहीं है। उसके खिलाफ पहली शिकायत 2005 में हुई, जब अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के पाम बीच में एक माँ ने आरोप लगाया कि उसने उसकी 14 वर्षीय बेटी का शोषण किया। पुलिस जाँच में कम-से-कम एक दर्जन और पीड़ितों की पहचान हुई। निर्णायक कार्रवाई के बजाय, तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में संघीय सरकार ने उसके प्रभावशाली वकीलों द्वारा आगे बढ़ाए गए एक विशेष गैर-अभियोजन समझौते को स्वीकार कर लिया। एप्सटीन ने “वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और एक नाबालिग” से जुड़े हल्के आरोपों में दोष स्वीकार किया और उसे 13 महीने की सज़ा मिली, जिसके दौरान उसे रोज़ कार्यालय जाने और रात में जेल लौटने की अनुमति थी। अलग-अलग दलों की सरकारों ने पीड़ितों की आवाज़ों की अनदेखी की और वह दंडमुक्ति के साथ अपनी गतिविधियाँ जारी रखता रहा।
पीड़ितों के साहस और निरंतर संघर्ष के कारण ही जुलाई 2019 में उसे उन आरोपों में गिरफ्तार किया गया जो 2008 के समझौते में शामिल नहीं थे। मुकदमे से पहले अगस्त में उसकी कथित आत्महत्या हो गई। 2002 से 2019 के बीच के ईमेल और दस्तावेज़ अब कई संलिप्तताओं के प्रमाण देते हैं। फिर भी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अधीन न्याय विभाग द्वारा नामों को हटाकर कई शक्तिशाली व्यक्तियों की पहचान सुरक्षित रखी गई। पीड़ितों ने बार-बार आरोप लगाया है कि यह इतिहास के सबसे बड़े पर्दा-फाशों में से एक को दबाने की कोशिश थी।
भारत का पक्ष
अमेरिकी जनता को अपनी संस्थाओं से जवाब माँगना है। भारत से हम न्याय और जवाबदेही की माँग कर रहे साहसी पीड़ितों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं। लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती।
ईमेल में दो भारतीय नाम सामने आए हैं। पहला उद्योगपति अनिल अंबानी का, जिन्हें सत्तारूढ़ नेतृत्व के निकट माना जाता है। दूसरा नाम हरदीप पुरी का है।
श्री अंबानी और एप्सटीन के बीच पत्राचार में महिलाओं के प्रति परिचित और यौन-अपमानजनक भाषा दिखाई देती है। अधिक गंभीर पहलू राजनीतिक पहुँच से जुड़ा है। भारत के प्रधानमंत्री की प्रस्तावित वॉशिंगटन यात्रा से पहले श्री अंबानी ने लिखा: “Leadership would like ur help for me to meet Jared… likely visit to DC by PM in May to meet Donald… Also assistance on that.” यदि ये ईमेल प्रामाणिक हैं और इन्हें जाली नहीं बताया गया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न उठाते हैं। एक दोषसिद्ध यौन अपराधी से संवाद में “Leadership” का हवाला क्यों दिया गया? क्या उन्हें ऐसा कहने का अधिकार था? क्या इन दावों की कोई जाँच हुई?
विदेश मंत्रालय ने इन ईमेल में प्रधानमंत्री के संदर्भों को “एक दोषसिद्ध अपराधी की घटिया कल्पनाएँ” बताया। लेकिन प्रश्न एप्सटीन की विश्वसनीयता का नहीं, बल्कि श्री अंबानी के शब्दों का है। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? या क्या वे सचमुच सरकार की ओर से कार्य कर रहे थे? सरकार को जवाब देना चाहिए।
श्री पुरी, जो वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं, ने 2014 के अपने ईमेल के संदर्भ में एप्सटीन की गतिविधियों की जानकारी न होने का दावा किया। जबकि उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि उनकी कई मुलाकातें हुईं। एक ईमेल में उन्होंने लिखा: “Dear Jeff… let me know when you are back from your exotic island. I would like to come across for a chat…” और बाद में: “Give me a shout when you are back. And, have fun…” क्या यह अज्ञानता दर्शाता है?
संदिग्ध बचाव
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में श्री पुरी ने कहा: “He was convicted for soliciting a prostitute and a woman who was underage. And that’s it.” “Underage woman”? क्या उनका आशय एक बच्ची से है? और क्या यह संबंध तोड़ने के लिए पर्याप्त कारण नहीं?
उन्होंने आगे कहा कि “एक महिला सांसद” ने उनसे कहा कि लोग ईर्ष्या करते हैं। यह किस स्तर की सोच को दर्शाता है? क्या यह हमारे जनप्रतिनिधियों के मानकों को नहीं दर्शाता? उनके शब्द दिखाते हैं कि कुख्यात “exotic island” पर होने वाली गतिविधियों को भी मज़ाक या ईर्ष्या का विषय बनाया गया। यह महज़ शब्दों की चूक नहीं, बल्कि बलात्कार-संस्कृति को मजबूत करने वाला दृष्टिकोण है।
यह भारत के लिए शर्म की बात है कि एक कैबिनेट मंत्री ने एक दोषसिद्ध यौन अपराधी से संपर्क बनाए रखा और फिर उसका बचाव किया। क्या उनका पद पर बने रहना प्रधानमंत्री की स्वीकृति का संकेत है?
संसद को एप्सटीन फाइलों पर चर्चा की अनुमति नहीं दी गई। लेकिन भारत की जनता को कोई रोक नहीं सकता ।

