डॉ. विकास मानव
(मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)
_मुझे सर, स्वामी, गुरुदेव, महात्मा आदि बोला जाता है तो मैं मना करता हूँ. मैं किसी को अपने से क़म स्वीकारने को राजी नहीं हूँ. मूलतः जो मैं हूँ, वही आप है. न तो आप ज़िस्म मात्र के लोथड़े है न ही मैं_.
शरीर के आधार पर, दुनियावी पद- कद, रसूख- रुतवे के आधार पर संबंध बनाने वाले अंधे हैं, मन-मस्तिष्क से अपाहिज. मेरा ट्रस्ट लघुता – दीर्घता में नहीं, समता में है.
_लोग तर्क देते है तो मैं उनको कृष्ण का उदाहरण देते हुए मित्र’मात्र बनने को कहता हूँ. राधा हो, द्रौपदी हों, गोपिकायें हों या अर्जुन, सुदामा, गोप : किसी के वे लघु नहीं माने. सखी- सखा स्वीकारे और हर संभव उनका साथ दिए._
मैडिटेशन और मल्टीपल ट्रीटमेंट शिविरों से इतर मैं देश-विदेश की लगभग पचासों यूनिवर्सिटीज में गया हूँ। क्लास ली है। लेक्चर दिया है। सेमिनार में बोला है। विदेशों में तो ये कल्पना भी संभव नहीं है कोई स्टूडेंट्स किसी टीचर या किसी के भी चरण स्पर्श करे।
मैंने हमेशा हाथ मिलाना पसंद किया है और चरण स्पर्श से मना किया है।
भोपाल जैसे शहरों में पैर छूने की बीमारी सबसे गंभीर है। वहाँ तो स्टूडेंट्स पैर छूने की ज़बर्दस्ती भी कर सकते हैं और पैर न छूने दिया जाए तो दु:खी हो जाते हैं। बहुत ज़्यादा सांस्कृतिक पिछड़ापन है बीमारू प्रदेशों (बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश) में।
चित्र में ये जो नोटिस आप देख रहे हैं, वह पटना विश्वविद्यालय में लगी है।
_पैर छूना मानसिक ग़ुलामी है। एक अच्छा शिक्षक चाहेगा कि उसका स्टूडेंट्स उसके विचारों को चुनौती देने की क्षमता विकसित करे। ज्ञान की सीमाओं का विस्तार करे।_
इसके लिए ज़रूरी है कि स्टूडेंट्स शिक्षक के ज्ञान को चैलेंज करना सीखें। ये यात्रा मानसिक ग़ुलामी के साथ शुरू नहीं हो सकती।
इसी सोच के कारण भारत में वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति नहीं हुई।स्थापित ज्ञान को नकारे बिना विज्ञान की यात्रा असंभव है।
_शिक्षक और छात्र ज्ञान पथ में सहयात्री होते हैं। अक्सर छात्र आगे निकल जाते हैं। पैर छूना बकवास है।_
ये नोटिस तब लगा है जब आरक्षण की वजह से आधे से ज़्यादा टीचर SC, ST, OBC के हो गए हैं। महिलाएँ भी काफ़ी संख्या में है। फिर भी अच्छा है। शुरुआत तो हुई.
{चेतना विकास मिशन)

