सुधा सिंह
जो जनविरोधी है वह देशप्रेमी नहीं हो सकता, जो सत्ता के प्रपंचों का भागीदार है वह जनता की आकांक्षाओं का सहयात्री नहीं हो सकता. तथाकथित मुख्यधारा का भारतीय मीडिया इतिहास के किसी दौर में इतना जनविरोधी नहीं रहा, क्योंकि, अतीत में मीडिया भले ही सत्ता से डरा हो, इस डर के कारण सत्ता विरोधी खबरों को दबाता रहा हो, लेकिन वह इतना पतित, इतना निर्लज्ज नहीं हुआ था।
अब दौर बदल चुका है। नवउदारवादी सत्ता लोकतंत्र की नैतिकता के मानकों को बदल कर राजनीति की एक नई दुनिया रच रही है और इस परिवेश ने अगर सबसे अधिक प्रदूषित किसी क्षेत्र को किया है तो वह मीडिया ही है। अब मीडिया सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के षड्यंत्रों का सहभागी है।
मीडिया हाउसेज में शीर्ष पर बैठे लोग यह तय करते हैं कि जनता तक किन खबरों को पहुंचाना है, किन खबरों की भ्रूण हत्या कर देनी है। इस प्रक्रिया में वे ऐसी सूचनाओं को भी बढ़ा चढ़ा कर सामने लाते हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।
ऐसा समाज, जिसमें अशिक्षित और अर्द्धशिक्षित लोगों की बहुतायत हो, सत्ता, पूंजी और मीडिया के ऐसे सम्मिलित षड्यंत्रों का शिकार आसानी से हो जाता है। फिर तो, आप कितने भी गंभीर और प्रामाणिक साक्ष्य सामने लाएं, अर्द्धशिक्षितों की जमात कुछ सोचने समझने को तैयार नहीं होती।
इधर मुगल इतिहास के अनेक अध्यायों को पाठ्यक्रमों से हटाने की नीतियों पर काम शुरू हुआ, उधर मोबाइल खोलते ही मुगलों के बारे में अनाप शनाप खबरें लोगों के सामने आने का सिलसिला शुरू हो गया। मध्यकालीन सामंती समाज के अंधेरों में सिसकती स्त्री अस्मिता को खास मुगल वंश का अभिशाप बताने की कोशिशें इस प्रक्रिया का सबसे खास अध्याय है।
आप मोबाइल खोलिए, न्यूज हंट या ऐसे ही किसी न्यूज प्लेटफार्म पर जाइए, मुगलों से जुड़े एक से एक भ्रामक और नितांत अप्रामाणिक तथ्य अलग-अलग शीर्षकों के साथ आपके सामने आने लगेंगे।
सत्ता के प्रपंचों ने सबसे अधिक दुष्प्रभाव अगर किसी चीज पर डाला है तो वह है जनसमुदाय का इतिहास बोध। विकृत इतिहास बोध किसी भी देश और समाज के आंतरिक विभाजन और वैचारिक पतन का सबसे बड़ा कारण होता है।
इसलिए, सुनियोजित तरीके से हमारे इतिहास बोध को विकृत किया जाने लगा और ऑब्जेक्टिव परीक्षा से बारहवीं के इतिहास में 90 प्रतिशत अंक लाने वाली नई पीढ़ी में भी ऐसे युवाओं की भरमार है जो बोध की विकृतियों को खुद पर लाद कर ऐतिहासिक तथ्यों की षड्यंत्र जनित परिभाषाओं के प्रवक्ता बन चुके हैं।
बीते आठ-दस वर्षों में भारतीय समाज में बौद्धिकता का जो क्षरण हुआ है उसका सबसे बड़ा शिकार इतिहास ही है और इसमें मीडिया के सिर पर सवार आईटी सेल की निर्णायक भूमिका है।
इस दौर में सबसे ताज्जुब यह कि जो जितना बड़ा जनविरोधी है वह उतना बड़ा देशभक्त दिखने की कोशिश करता है। जन और देश को हितों के अलग-अलग द्वीपों पर खड़ा कर अपनी प्रवंचनाओं को जनमानस पर थोपने में मीडिया ने बड़ी सफलता हासिल की है। हिन्दी के कुछ बड़े न्यूज चैनल इसके सटीक उदाहरण हैं।
जब देश पुलवामा हमले के संदर्भ में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के इंटरव्यू पर असमंजस में था, जब डिजिटल मीडिया के छोटे-बड़े प्लेटफार्म उस पर गंभीर चर्चाओं-परिचर्चाओं की श्रृंखला चला रहे थे, हिन्दी के छोटे-बड़े न्यूज चैनलों और अखबारों ने इस खबर को कोई तवज्जो ही नहीं दी।
यह इस तथ्य का प्रमाण है कि कभी जनहितैषी और देशभक्त के रूप में जन्म लेने वाला हिन्दी मीडिया का मुख्यधारा किस तरह पूंजी पोषित सत्ता का पालतू बन चुका है और इस तरह निर्लज्जता की कितनी सीमाओं का अतिक्रमण कर चुका है।
पुलिस की निगरानी में अतीक अहमद की हैरतअंगेज तरीके से हुई हत्या के बाद जब सवाल सरकार और पुलिस की कार्यशैली पर उठने चाहिए थे, हिंदी मीडिया हमें तफसील से बताने में लग गया कि गैंगस्टर बनने के बाद किस ईसवी में अतीक अहमद, उसके भाई या उसके गुर्गों ने किसकी हत्या की थी, किसकी जमीनें हड़प ली थी या किस ठेके को हासिल करने के लिए किन खूनी तरीकों को अंजाम दिया था।
गौतम अडाणी के आर्थिक उभार और अचानक से महज आठ सालों में अविश्वसनीय तौर पर विकसित उसके व्यापारिक साम्राज्य पर जब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर संदेहों के बादल घिरने लगे तो हिन्दी न्यूज चैनलों और अखबारों ने इस पूरे प्रकरण को ही विमर्श से बाहर करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी।
जन चेतना को कारपोरेट परस्त सत्ता के हितों और षड्यंत्रों से विमुख करने के सामूहिक और कुत्सित प्रयास में हिन्दी मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका के ये पतित उदाहरण हैं। अपने शैशव काल में हिन्दी मीडिया जन जागरण के एक अभियान की तरह सामने आया और देश की राजनीतिक आजादी या बौद्धिक समृद्धि में इसकी ऐतिहासिक भूमिका किसी भी हिन्दी भाषी के लिए गर्व का विषय रही है।
अपनी युवावस्था में भी हिन्दी मीडिया, जब अखबार और पत्रिकाओं का दौर था, पूंजी संचालित होने के बावजूद एक नैतिक धरातल पर खड़ा था और जनाकांक्षाओं के साथ कदमताल करने की कोशिशें करता था।
वह अक्सर सत्ता से डरता था, कभी कभी उसके एजेंडा का वाहक भी बन जाता था लेकिन उसमें लाज थी, जनता के प्रति प्रतिबद्धता का एक स्तर था।
अब जब, यह परिपक्व हो चुका है, जब हिन्दी मीडिया तकनीक की ऊंची छलांग के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से घर-घर तक अपनी पहुंच बना चुका है, जब गैजेट्स के माध्यम से तमाम हिन्दी न्यूज चैनल और अखबार लोगों की उंगलियों तक पहुंच चुके हैं, हिन्दी मीडिया अपनी आभा को चुका है, अपने जनसापेक्ष रूप को त्याग चुका है और इतना अनैतिक, इतना जनविरोधी हो चुका है कि भारत और हिन्दी पट्टी के विशेष संदर्भ में इसे इस दौर का सबसे बड़ा अभिशाप कहा जा सकता है।
हिन्दी, जिसे आज हम जिस रूप में जानते-बोलते हैं, अपने जन्म से ही प्रतिरोध की भाषा रही है। प्रतिरोध…साम्राज्यवाद का, उपनिवेशवाद का, सर्वसत्तावाद का, सामाजिक और सांस्कृतिक विभाजन का। हिन्दी साहित्य के साथ ही हिन्दी मीडिया भी इन मूल्यों का वाहक रहा।
किंतु, बाजारवाद और जनविरोधी षड्यंत्रवाद के इस दौर में, जब हिन्दी साहित्य अभी भी अपनी भूमिका निभा रहा है, हिन्दी के मुख्यधारा का मीडिया नैतिक और वैचारिक पतन के गर्त्त में जा चुका है। इसने देशभक्ति की जो नई परिभाषा रचने की कोशिश की है वह भयानक रूप से विकृति की शिकार है।
हिन्दी पट्टी के युवाओं के बौद्धिक और सांस्कृतिक पतन की जो गाथा आज का हिन्दी मीडिया लिख रहा है उसके लिए निश्चित ही इतिहास की अदालत में उत्तरदायी ठहराया जाएगा। (चेतना विकास मिशन).

