Site icon अग्नि आलोक

अनिवार्य है, आज समझना

Share

शशिकांत गुप्ते

15 अगस्त और 26 जनवरी इन दो राष्ट्रीय उत्सवों को मनाते हुए,प्रायः हम यह गीत जरूरी सुनते है।
सन 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म जागृति का यह गीत लिखा है,प्रख्यात गीतकार स्व.प्रदीपजी ने।
इस गीत में स्वतंत्रता के महत्व को वर्णित किया है। साथ ही इस गीत के माध्यम से अंसख्य देशभक्तों की कुर्बानियों के बाद मिली स्वतंत्रता को संभालने सलाह भी दी है।
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के
मंज़िल पे आया मुल्क हर बला को टाल के
सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के
हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के
तुम ही भविष्य हो मेरे भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के

इन पंक्तियों को सुनने समझने के बाद,जब यह सुनने को मिलता है कि सन 2014 के पूर्व देश का इतिहास शून्य था?तब जागरूक नागरिक के अंतर्मन को गीत का अगला बंद झकझोर देता है। और जिन लोगों का स्वतंत्रता आंदोलन से कोई सरोकार नहीं रहा उनसे देश को बचाने यह संदेश प्रासंगिक लगता है।
देखो कहीं बर्बाद ना होवे ये बगीचा
इसको ह्रदय के ख़ून से बापू ने है सींचा
रक्खा है ये चिराग शहीदों ने बाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के

गीत के अगले बंद की पंक्तियां भावीपीढ़ी को सावधान करती है।
दुनिया के दांव पेंच से रखना ना वास्ता
मंज़िल तुम्हारी दूर है लंबा है रास्ता
भटका ना दे कोई तुम्हे धोखे में डाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के

आज जो विध्वंसक अत्याधुनिक शस्त्र तैयार किए जा रहें हैं। उनसे भी अधिक खतरनाक हैं, सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाने वाली भाषा का प्रचलन और ऐसी भाषा को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रश्रय देने वाली ताकतों को से संभल की सलाह के मद्देनजर गीत की अगली पंक्तियां है।
एटम बमों के ज़ोर पे ऐंठी है ये दुनिया
बारूद के एक ढेर पे बैठी है ये दुनिया
तुम हर क़दम उठाना ज़रा देखभाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के

आज की सियासत जनता को मुफ्तखोर बनाने में आमादा है,और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में विपक्ष को ना सिर्फ कमजोर करने की साज़िश रची जा रही है,बल्कि विपक्ष मुक्त देश बनाने असफल प्रयास भी चल रहा है।युवा पीढ़ी को प्रेरणा देती अगली पंक्तियां प्रासंगिक है।
आराम की तुम भूल भुलैयाँ में ना भूलो
सपनों के हिंडोलों पे मगन होके ना झूलो
अब वक़्त आ गया मेरे हँसते हुए फूलो
उठो छलाँग मार के आकाश को छू लो
तुम गाड़ तो गगन पे तिरंगा उछाल के

तिरंगे झंडे का उल्लेख है।
यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि, तिरंगा मतलब तीन रंगा का।
जो सत्य अहिंसा में विश्वास रखतें हैं। जो धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखतें है। जो लोकतंत्र के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखतें हैं। ऐसे सभी भारतवासियों ने प्रदीपजी के लिखें इस गीत को वर्तमान विचारविहीन,मुद्देविहीन,
सत्ता पूंजी एवं व्यक्ति केंद्रित राजनीति के दौर में बार बार सुनना चाहिए। अमूल्य स्वतंत्रता के महत्व को समझना जरूरी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version