निशांत आनंद
इथेनॉल से जुड़ा विवाद भारत के परिदृश्य में फिर से सुर्खियों में उस समय आ गया जब कांग्रेस जो भारतीय संसदीय मौजूदा सरकार में सबसे बड़ी प्रतिपक्ष की पार्टी है, ने बीजेपी सरकार के मंत्री नितिन गडकरी पर सीधा निशाना साधते हुए कुछ ऐसी बातों को सामने लाई जिससे बीजेपी का भाई भतीजावाद सामने आ गया। इस आरोप के अनुसार देश की दो बड़ी इथेनॉल बनाने वाली कंपनी नितिन गडकरी के बेटों, निखिल और सारंग गडकरी की है। कांग्रेस नेताओं ने इन कंपनियों के भारी मुनाफे को देखते हुए एक बड़ा संदेह उत्पन्न किया है। और यह होना बेहद स्वाभाविक है क्योंकि जो कंपनियां इथेनॉल बना रही हैं वो तो भारी फायदा उठा रही हैं, पर जनता की जेब पर पेट्रोल-डीजल ने कहर बरपा दिए हैं।
बीजेपी सरकार ने शुरू से इस बात पर जोर दिया कि इथेनॉल के उत्पादन को बढ़ा कर हम पेट्रोल की कीमतों में कमी कर सकते हैं। परंतु परिणाम उसके विपरीत है, 2014 की तुलना में पेट्रोल की कीमत लगभग डेढ़ गुने के आस-पास बढ़ गई है। वहीं दूसरा बड़ा सवाल जो इस पूरे प्रोजेक्ट के साथ जुड़ा हुआ था वह था कि कच्चे माल के तौर पर लकड़ियों और वेस्ट प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना था, परंतु उसके विपरीत गन्ने से बना इथेनॉल ज्यादा प्रचलन में रहा जिससे क्षेत्रों में सूखे को समस्या बढ़ी है।
भारत और विश्व आज जिस सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह है बढ़ता हुआ पर्यावरण प्रदूषण और ऊर्जा की निरंतर बढ़ती मांग। वाहन प्रदूषण इसमें सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। पेट्रोल और डीज़ल जैसे जीवाश्म ईंधन न केवल सीमित संसाधन हैं बल्कि इनके जलने से निकलने वाली गैसें वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को भी तेज़ करती हैं। इसी संदर्भ में इथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) को स्वच्छ ऊर्जा की ओर एक बड़े कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में प्रदूषण कम करने का स्थायी समाधान है, या केवल एक आंशिक और अस्थायी उपाय?
इथेनॉल मिश्रण क्या है?
इथेनॉल (C₂H₅OH) एक प्रकार की अल्कोहल है, जिसे मुख्यतः गन्ने, मक्का, गेहूँ, चुकंदर, गुड़ अथवा अन्य जैविक स्रोतों से तैयार किया जाता है। जब इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है तो मिश्रित ईंधन प्राप्त होता है। सामान्यतः प्रयोग होने वाले अनुपात इस प्रकार हैं–
E10 : 10% इथेनॉल + 90% पेट्रोल
E20 : 20% इथेनॉल + 80% पेट्रोल
E85 : 85% इथेनॉल + 15% पेट्रोल (कुछ देशों जैसे ब्राज़ील में प्रचलित)
भारत में 2022 तक 10% इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है तथा 2025-26 तक 20% मिश्रण (E20) को अनिवार्य बनाने की योजना है। हालांकि यह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि जब E 20 की योजना लाई गई थी तब सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल (PIL) डालते हुए इस बात को स्पष्ट किया गया था कि यह पुराने वाहनों को बिल्कुल बाहर कर देगा जिससे मध्यम वर्ग को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है परंतु सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण के लिए आवश्यक पहल को मद्देनजर रखते हुए इस मांग को खारिज कर दिया था।
इथेनॉल मिश्रण से होने वाले लाभ
इथेनॉल मिश्रण को प्रोत्साहित करने का सबसे बड़ा कारण इसका पर्यावरणीय लाभ है।
1. कार्बन मोनोऑक्साइड उत्सर्जन में कमी
पेट्रोल के अपूर्ण दहन से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) निकलती है, जो जहरीली गैस है। इथेनॉल में पहले से ऑक्सीजन मौजूद होने के कारण दहन अपेक्षाकृत अधिक पूर्ण होता है, जिससे CO उत्सर्जन कम होता है।
2. हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में कमी
वाहनों से निकलने वाले अधजले हाइड्रोकार्बन स्मॉग और प्रदूषण के मुख्य कारक हैं। इथेनॉल मिश्रण इन उत्सर्जनों को आंशिक रूप से कम कर सकता है।
3. ग्रीनहाउस गैसों में कमी
यदि इथेनॉल को जैविक अवशेषों से तैयार किया जाए, तो जीवन चक्र (Life Cycle) के स्तर पर यह पेट्रोल की तुलना में लगभग 30–50% तक कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करता है।
4. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत
इथेनॉल कृषि उपज या अपशिष्ट से तैयार किया जा सकता है। इसलिए यह जीवाश्म ईंधनों की तरह सीमित नहीं है।
5. आर्थिक और सामरिक लाभ
भारत जैसे देश, जो पेट्रोलियम आयात पर भारी निर्भर हैं, इथेनॉल मिश्रण के ज़रिए विदेशी मुद्रा की बचत कर सकते हैं। साथ ही यह किसानों को गन्ना अथवा अन्य फसलों का बेहतर दाम दिलाने में सहायक है।
इथेनॉल मिश्रण की सीमाएँ और चुनौतियाँ
हालाँकि इसके लाभ स्पष्ट हैं, परंतु यह कहना कि इथेनॉल मिश्रण पूरी तरह प्रदूषण कम कर देगा, सही नहीं होगा।
1. नए प्रदूषकों की संभावना
इथेनॉल मिश्रण से कुछ उत्सर्जन घटते हैं, लेकिन दूसरी ओर एसीटैल्डिहाइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रदूषक बढ़ सकते हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
2. NOx उत्सर्जन में वृद्धि
कई अध्ययन दर्शाते हैं कि इथेनॉल मिश्रण के साथ नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जन बढ़ सकता है। यह गैसें स्मॉग और अम्लीय वर्षा का कारण बनती हैं।
3. जल और भूमि पर दबाव
गन्ने और मक्का जैसी फसलों से इथेनॉल उत्पादन हेतु अत्यधिक पानी और भूमि की आवश्यकता होती है। भारत जैसे देश में यह “खाद्य बनाम ईंधन” (Food vs Fuel) विवाद को जन्म देता है।
4. वाहनों की तकनीकी समस्या
पुराने इंजन इथेनॉल मिश्रित ईंधन से प्रभावित हो सकते हैं। इसमें धातु पर जंग लगने, रबर सील खराब होने और माइलेज घटने जैसी समस्याएँ देखी गई हैं। अगर इसे मूल रूप से दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह एक बिजनेस को प्रश्रय देने वाला तरीका भी है, अगर पुरानी गाड़ियां तेजी से बाजार से बाहर जाएंगी तभी तो नई गाड़ियां बाजार में आएंगी। जिसका सीधा फायदा बड़ी कंपनियों को होगा और इसका अप्रत्यक्ष पर बड़ा फायदा विदेशी तकनीक और अनुसंधान कंपनियों को होगा जो इनोवेशन और नोवेशन के नाम पर भरी मात्रा में फायदा उठाएंगी।
5. ऊर्जा संतुलन का प्रश्न
यदि इथेनॉल उत्पादन में जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली या उर्वरक का उपयोग अधिक होता है, तो इसके पर्यावरणीय लाभ काफी कम हो जाते हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
ब्राज़ील में कई दशकों से इथेनॉल का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। वहाँ लचीले इंजन (Flex Fuel Vehicles) विकसित किए गए हैं जो शुद्ध इथेनॉल पर भी चल सकते हैं। अमेरिका में E10 और E15 प्रचलित हैं। उत्सर्जन के परिणाम मिले-जुले हैं; कुछ प्रदूषक घटे हैं, तो कुछ बढ़े हैं। भारत देश में मिश्रण की गति तेज़ी से बढ़ रही है। 10% लक्ष्य हासिल कर लिया गया है और 20% लक्ष्य के लिए तैयारी चल रही है। लेकिन जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में गन्ने से इथेनॉल उत्पादन को लेकर चिंताएँ हैं।
क्या यह मिथक है या वास्तविकता?
समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इथेनॉल मिश्रण न तो पूर्ण मिथक है और न ही संपूर्ण समाधान। यह वास्तविकता है कि इथेनॉल मिश्रण से कुछ प्रदूषकों, विशेषकर कार्बन मोनोऑक्साइड और अधजले हाइड्रोकार्बनों में कमी आती है। यह भी सत्य है कि जीवन चक्र के स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम हो सकता है।
लेकिन यह भी तथ्य है कि NOx, एसीटैल्डिहाइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रदूषक बढ़ सकते हैं और जल–भूमि पर दबाव बढ़ जाता है।
पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण प्रदूषण घटाने की दिशा में एक आंशिक और सहायक कदम है, न कि अंतिम समाधान। यह उन उपायों में से एक है जिन्हें भारत जैसे बड़े और प्रदूषण-ग्रस्त देश को अपनाना ही होगा। परंतु साथ ही हमें इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार, स्वच्छ सार्वजनिक परिवहन, कड़े उत्सर्जन मानक और वैकल्पिक ईंधनों (जैसे हाइड्रोजन, बायोगैस) पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि इथेनॉल मिश्रण प्रदूषण कम करने की वास्तविकता तो है, किंतु यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। यदि इसे अन्य उपायों के साथ संतुलित रूप से अपनाया जाए, तभी यह पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में सार्थक योगदान दे सकेगा। जहां तक पर्यावरण न्यायशास्त्र का सवाल है वह देश में भी कई प्रकार से देश की परिस्थितियों के अनुसार देखने का प्रयास नहीं समझा जा सकता है खास कर जहां विदेशी पूंजी के आवा जाही में कोई समस्या खड़ी हो रही हो। इसलिए यह और भी चिंता का विषय है

