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भीड़ की भेड़ें, मेरा साथ दें भी तो क्यों? क्योंकि~_ मैं तथाकथित साध्वी नहीं, बगावती हूँ

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डॉ. प्रिया मानवी
(संयोजिका : चेतना विकास मिशन)

_मैं कोई तथाकथित साधवी नहीं हूं। मैं किसी ऐसी परंपरा की ऋषिकन्या भी नहीं हूं। न मुनि हूं, न महात्मा हूं। मैं बगावती हूं। मेरा साथ भीड़ की भेड़ें दें भी तो भला क्यों?_
  लकीरों के फकीरों द्वारा किया जाने वाला मेरा विरोध बिलकुल स्वाभाविक है। मैं रूढ़िवादी नहीं हूं, परंपरावादी नहीं हूं। मैं रूढ़ि-विरोधी हूं, परंपरा-विरोधी हूं। जाति-विरोधी हूं, वर्ण-विरोधी हूं। तथाकथित धर्म विरोधी भी हूँ। मैं 'मानव' वादी हूँ। निरंतर 'विकास' ही मुझे अभीष्ट है।

मैं चाहती हूं कि तुम्हें सारी सीमाओं से मुक्त कर दूं तुम पर कोई सीमा न रह जाए। तुम सिर्फ चैतन्य हो : इसका बोध पर्याप्त है। तुम साक्षी मात्र हो। तुम देह भी नहीं हो, तो भारतीय कैसे हो सकते हो? हिंदू कैसे हो सकते हो? मुसलमान कैसे हो सकते हो? ये सब तो शोषक समाज के खेल हैं इन के जाल हैं।
तो मुझसे तो हिंदू भी नाराज होगा मुसलमान भी नाराज होगा ईसाई भी नाराज होगा। क्योंकि वे सभी परंपराओं में जी रहे हैं। उन सबका जीवन अतीत में है, और मैं चाहती हूं कि~
तुम अतीत से बिलकुल मुक्त हो जाओ तो ही तुम्हारे जीवन में वर्तमान से संस्पर्श होगा। वर्तमान ही परमात्मा है। और वर्तमान से जुड़ जाओ तो परमात्मा का तुम्हें स्वाद मिले।

लोगों द्वारा मेरा विरोध बिलकुल स्वाभाविक है। मैं उसे अंगीकार करती हूं। मैं स्वागत भी करती हूं। चलो कुछ चहल-पहल तो है।
कुछ आंधी तो उठी। चलो सदियों से जड़ बुद्धि में कुछ हलचल तो मची, कुछ तरंगें तो उठीं, कुछ जीवन का तो बोध हुआ। मुर्दे कुलबुलाये तो सही। कीड़े-मकोड़ें बिलबिलाए तो सही।

धर्म का संबंध तो सिर्फ एक चीज से है वह ध्यान है। धर्म की एक ही खोज है एक ही अन्वेषण है वह समाधि है। ध्यान समाधि तक कैसे पहुंचे इसका विज्ञान धर्म है, जिसका आधार समग्र प्रेम मात्र है। शेष सब बकवास है।
शेष सबसे छुटकारा हो जाना चाहिए। मगर उस शेष सबके जंगल में ही असली चीज खो गई है। मैं तो उतने भर को बचा लेना चाहती हूं, जितना मूल्यवान है। जितना वस्तुतः मूल्यवान है, उतना बचाकर बाकी कूड़ा-करकट को बिलकुल आग लगा देना चाहती हूं। इसलिए लोग मुझसे नाराज हैं। उनका नाराज होना स्वाभाविक है।

जो लोग मेरा विरोध करेंगे या मुझ पर नाराज होंगे, उनका कोई कसूर भी नहीं है। जब सदियों पुरानी धारणाओं पर चोट की जाती है तो बेचैनी होती है तिलमिलाहट होती है। यह स्वाभाविक है।
मगर यह करना ही होगा अन्यथा मनुष्य के लिए फिर कोई आशा नहीं है। तथाकथित धर्मों ने मनुष्य को मार डाला है।

मैं दमन-विरोधी हूं रूपांतरण की पक्षपाती हूं। तुम जिसको दबाओगे उसे दबाते ही रहना पड़ेगा बार-बार।
कितना ही दबाओ वह उभर-उभर कर वापस आएगा। जो भी तुम्हें दिया है जीवन ने, उसमें कुछ भी पाप नहीं है और कुछ भी गलत नहीं है। जो भी तुम्हें दिया है जीवन ने वह परम धन है लेकिन ऐसा है जैसे अनगढ़ हीरे।
उन पर चमक रखनी होगी, उनको पहलू देना होगा, उनको साफ करना होगा, तब वे कोहिनूर बनेंगे।

यह तो तुम्हें पता होगा कि कोहिनूर जब मिला, जिस व्यक्ति को मिला, उसके बच्चे उससे खेलते रहे तीन साल तक, यही समझ कर कि कोई चमकदार पत्थर है।
एक संन्यासी मेहमान हुआ, जो कि संन्यास लेने के पहले जौहरी रह चुका था। उसने बच्चों को उस पत्थर से खेलते देखा। उसने बच्चों के पिता को कहा कि तुम पागल तो नहीं हो! मैं जौहरी हूं–था, इससे बड़ा हीरा मैंने अपने जीवन में न देखा, न सुना। यह क्या कर रहे हो?
उन्होंने कहा, यह तो तीन साल से हमारे घर में है। मैं खेत पर था, वहां मुझे मिला। मेरे खेत में से एक छोटा सा झरना निकलता है, उसकी रेत में मुझे पड़ा मिल गया, मैंने सोचा बच्चे खेलेंगे। तो यह तो पड़ा रहता है यहीं आंगन में, बच्चे खेलते रहते हैं। कोई उठा भी ले जाता तीन साल में, मुझे क्या पता कि हीरा है। तब उसे जौहरी के पास ले जाया गया।
आज कोहिनूर दुनिया का सबसे बड़ा हीरा है। करोड़ों उसकी कीमत है। उससे बड़ा कीमती कोई हीरा नहीं है। इंग्लैंड की महारानी के मुकुट में वह जड़ा है।
जब मिला था तो उसका तीन गुना वजन था, अब सिर्फ एक तिहाई वजन है, लेकिन कीमत उसकी करोड़ों गुना ज्यादा है। क्या हुआ? दो तिहाई वजन कहां गया?
दो तिहाई वजन छांटना पड़ा, काटना पड़ा। वह कट गया तो यह सौंदर्य प्रकट हुआ। वह छंट गया तो यह सौंदर्य प्रकट हुआ।

तुम्हारे भीतर जो भी है, अनगढ़ पत्थर है अभी। बहुत कुछ छांटना होगा, बहुत कुछ काटना होगा, धार रखनी होगी, चमकाना होगा। लेकिन हीरे हैं। सब हीरे हैं।
कामवासना ही तुम्हारे भीतर ब्रह्मचर्य बनती है। कामवासना ऐसा समझो कि जैसे सिर के बल खड़ा हुआ आदमी, और ब्रह्मचर्य ऐसा समझो कि पैर के बल खड़ा आदमी। बस इससे ज्यादा फर्क नहीं है। तुम्हारे भीतर जो आसक्ति है, वही प्रेम में रूपांतरित होती है।
मैं रूपांतरण की पक्षपाती हूं। मैं रूपांतरण की कीमिया को ही धर्म कहती हूं, और तुम्हें सिखाया गया है दमन। दमन से कभी रूपांतरण नहीं होता। रूपांतरण जागरण से होता है। जागरण ही असल सदाचरण देता है। जागरण चेतना के विकास से आता है। चेतना विकास की खुराक अंतस की तृप्ति है, जिसका आधार प्रेम है।

मैं पाखंड-विरोधी हूं, और तुमने पाखंड की इतनी पूजा की है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि मुझे गालियां पड़ेंगी, लोग मुझ पर नाराज होंगे।
मुझसे तो केवल वे ही लोग राजी हो सकते हैं, जिनके पास थोड़ी प्रतिभा है, जिनके पास थोड़ी बौद्धिक क्षमता है, जिनके पास थोड़ा आत्मबल है, थोड़ा आत्मगौरव है, जो थोड़े आत्मवान हैं; जिनमें इतना साहस है कि छोड़ दें सारे अतीत को और चल पड़ें मेरे साथ अज्ञात की यात्रा पर–उनके अतिरिक्त, मेरे साथ भीड़ नहीं चल सकती है।
मेरी यह अभिव्यंजना चेतना मिशन की देशना से मिली क्षमता पर आधारित है. जिंदा हो तो, जिंदा नज़र भी आओ. दब्बू, कायर, यथास्थितिवादी या अपाहिज बने रहने मे घुटन होती है तो आप पूरी तरह मुर्दे नहीं हुए हो. ऊर्जा से भरपूर क्षमता विकास के लिए हमसे व्हाट्सप्प 9997741245 पर जुड़ो. हम कुछ भी नहीं चाहते : ना तो क़ीमत के रूप मे और ना ही उपहार के रूप में.
☯️चेतना विकास मिशन

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