डॉ हरीश भल्ला
हर साल आषाढ़ मास की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर जाते हैं। पुरी में जगन्नाथ मंदिर से 3 सजे धजे रथ रवाना होते हैं। इनमें सबसे आगे बलराम जी का रथ, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे जगन्नाथजी का रथ होता है।रथ यात्रा की तैयारी और इसके निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से ही शुरू हो जाता है। ये सभी रथ नीम की परिपक्व और पकी हुई लकड़ी से तैयार किए जाते हैं। इसे दारु कहा जाता है। रथ को बनाने में केवल लकड़ी को छोड़कर किसी अन्य चीज का प्रयोग नहीं किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिए होते हैं और यह बाकी दोनों रथों से बड़ा भी होता है।भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष सबसे ऊंचा 45.6 फीट का, उसके बाद बलरामजी का रथ तालध्वज रथ 45 फीट का और उसके बाद बहन सुभद्रा का रथ दर्पदलन 44.6 फीट का होता है। तीनों रथों का रंग भी अलग-अलग होता है। तालध्वज रथ का रंग लाल और हरा होता है। दर्पदलन काले और लाल रंग का होता है। वहीं नंदीघोष पीले और लाल रंग का होता है।रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ एक मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार पर कुछ देर के लिए जरूर रुकता है। पुराने किस्से कहानियों में बताया गया है कि एक बार जगन्नाथजी का यह मुस्लिम भक्त सालबेग अपने भगवान के दर्शन करने के लिए मंदिर नहीं पहुंच सका था।फिर उसके मरने के बाद जब उसकी मजार बनी जो जगन्नाथजी का रथ खुदबखुद उसकी मजार पर रुक गया और कुछ देर के लिए आगे नहीं बढ़ पाया। फिर उस मुस्लिम सालबेग की आत्मा के लिए शांति प्रार्थना की गई तो उसके बाद रथ आगे बढ़ पाया। तब से हर साल रथयात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाली सालबेग की मजार पर जगन्नाथजी का रथ जरूर रुकता है।ऐसा भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस रथ यात्रा में शामिल होकर भगवान के रथ को खींचते है उसे 100 यज्ञ करने के फल मिलता है। साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। पुराणों के अनुसार, आषाढ़ मास से पुरी तीर्थ में स्नान करने से सभी त्तीर्थों के दर्शन करने जितना पुण्य मिलता है।
डॉ हरीश भल्ला

