शशिकांत गुप्ते
किसी भी आदमी के पास कितनी शैक्षणिक योग्यता है, कितनी प्रतिभाएं है,कितनी क्षमताएं हैं,और आदमी निहायत भी ईमानदार है लेकिन यदि आदमी समझदार नहीं हो तो उक्त सारी योग्यताएं नगण्य हो जाती है।
ऐसे लोगों के लिए शायर दुष्यंत कुमार का यह शेर प्रस्तुत है।
कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही
इस शेर का भावार्थ निम्न लोकोक्ति में स्पष्ट होता है।
जहँ जहँ पैर पड़े संतन के, तहँ तहँ बंटाधार’
आज यथार्थ में यही सब कुछ हो रहा है।
उपलब्धियां सिर्फ इश्तिहारोंं में पढों, सूनों और देखोंं।
वास्तव में क्या हो रहा है, बयां होता है,शायर इशरत धौलपर रचित इस शेर में
गुमनाम एक लाश कफ़न को तरस गई
काग़ज़ तमाम शहर के अख़बार बन गए
यह सब कब तक चलेगा?
कबतक सपनों को सच माना जाएगा? इस मुद्दे पर शायर अज़हर इनायती फरमाते हैं।
वो ताज़ा-दम हैं नए शो’बदे दिखाते हुए
(शो’बदे= जादू या इंद्रजाल)
अवाम थकने लगे तालियाँ बजाते हुए
अब सब्र का बांध टूटने में है।
दुष्यंत कुमार के इस शेर का स्मरण होना लाजमी है।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
सब्र की जब इंतिहा हो जाती है,
तब शायर अहमक़ फफूँदवी का यह शेर पढ़ा जाता है।
ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इंक़लाब देखेंगे
अंत में इतना कहना पर्याप्त है।
परिवर्तन संसार का नियम है, जो अटल है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर
ये कह रही है इशारों में गर्दिश-ए-गर्दूं
कि जल्द हम कोई सख़्त इंक़लाब देखेंगे
अहमक़ फफूँदवी

