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सबकी बारी आएगी, धर्मध्वजा धारी शंकराचार्य की और योगी की हुई फजीहत…..

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  –सुसंस्कृति परिहार 

मुस्लिम, दलित, आदिवासी, ईसाई के बाद अब सनातन धर्म के ध्वजधारी  शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर योगी की भाजपा सरकार के हमले की ख़बरें यह बता रही हैं कि अब वे दिन दूर नहीं जब सनातनी कथित हिंदुओं पर भी वज्र पात होगा।उसका सिलसिला शुरू हो चुका है और वह निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है।

विदित हो राममंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के मुहूर्त सही ना होने पर समारोह का सभी शंकराचार्यों ने विरोध किया था।संघ और सरकार प्रमुख के साथ ही राज्यपाल की उपस्थिति इनको युक्तिसंगत नहीं लगी थी।राम मंदिर की लड़ाई ट्रस्ट से जुड़े लोग लड़ रहे थे उसमें संघ का पदार्पण होना और  मंदिर मुद्दे पर राजनीति की शुरुआत भाजपा ने शुरू की तथा जनता को बरगलाया और बहुसंख्यकों के ध्रुवीकरण करने की कोशिश की जिससे 2014 के चुनाव में मात्र 31%वोट पाकर सत्ता स्थापित कर ली गई।

इसके बाद तो मंदिर,साधु-संत और कथा प्रवाचकों के भक्तों का वोट बैंक पक्का किया गया।ये सब संविधान की घोर अवज्ञा थी। किंतु सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का। अन्य धर्मावलंबियों के खिलाफ हेट न्यूज और नफ़रत का सिलसिला बढ़ चला है।अब तो इनके लिए घुसपेठिए माना जा रहा है।

लेकिन अब यह नफ़रत शंकराचार्य के अपमान और उनके समर्थकों की पिटाई तक आ पहुंची है। जबकि उनका समर्थन तीनों शंकराचार्य कर रहे हैं।इससे दुखद और क्या हो सकता है शंकराचार्य और उनके शिष्यों पर हमले से नाराज़ होकर बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और अब इसके जवाब में”जिसका नमक खाते हैं, उसका आदर करना चाहिए। मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ”यह कहकर रुदन करते हुए अयोध्या में GST के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने मोदी–योगी के समर्थन में इस्तीफा दे दिया।उन्होंने कहा– “स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा CM योगी आदित्यनाथ पर की गई टिप्पणी से आहत हूं” 

यानि अब शासकीय लाबी भी धर्म के इस दंगल में सीधी कूद पड़ी है। एक तरफ़ गोरखनाथ के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ हैं तो दूसरी ओर हैं ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद। इसमें कोई शक नहीं कि  योगी एक साथ दो पदों पर काबिज़ हैं उनकी ताकत ज्यादा है उनके समर्थन में और भी अधिकारीगण ये कदम उठा सकते हैं।अभी जिन्होंने योगी के अपमान पर त्यागपत्र दिया है वे ठाकुर साहिब योगी की जाति वाले समृद्ध और बड़े भ्रष्ट लुटेरे हैं। ये आंसू और उनकी निष्ठा उन्हें आगत चुनाव में विधायक बनाने के लिए काफी है। दूसरी ओर ज्योतिष पीठ का जन्म भी राजनीतिक और विवादित रहा है।

 इधर योगी आदित्यनाथ पर विवादित शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद 

 ने कहा है, ”संत और धर्म गुरु का सियासत में दखल देना कोई गलत बात नहीं है। खुद योगी आदित्यनाथ भी गो रक्षा पीठाधीश्वर के पद पर बने रहते हुए पिछले 9 सालों से यूपी के मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले वह कई बार सांसद भी रहे हैं। मीडिया और सोशल मीडिया में माघ मेले को लेकर जो तस्वीरे और वीडियो सामने आए हैं। उनके आधार पर साफ तौर पर कहा जा सकता है कि वहां पर शंकराचार्य पूरी तरह सही थे। पुलिस और प्रशासन ने ठीक तरह से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई।इसी तरह की बात कथित साध्वी उमाभारती ने भी कही। ये भी राजनीतिक हैं मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।

”गौरतलब है कि माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पालकी में स्नान के लिए जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें रोकते हुए पैदल जाने को कहा. इस पर आपत्ति जताने के दौरान उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की की स्थिति बनी।प्रयागराज विवाद पर अब द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि अविमुक्तेश्वरानंद अकेले नहीं हैं, उन्हें सभी शंकराचार्यों का साथ है। प्रशासन की ‘सर्टिफिकेट’ वाली मांग को उन्होंने धार्मिक परंपरा का अपमान बताया  है।

शंकराचार्य भी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उससे लगता है कि वे भी राजनीति में आने की पिपासा रखते हैं। इसलिए योगी को नहीं पुलिस को दोषी मान रहे हैं। धर्म और राजनीति के तालमेल को इसलिए वे गलत नहीं मानते।जबकि धर्मनिरपेक्ष देश में  किसी भी धर्म का राजनीति पर सवार होना संवैधानिक तौर पर गलत है।

कुल मिलाकर मंदिर और मठाधीशों पर हमले निरंतर बढ़ते जा रहे हैं।काशी, वृन्दावन मथुरा, चित्रकूट में जिस तरह का बर्ताव योगी सरकार कर रही है तथा पंडितों के साथ असभ्य हरकत हो रही है उससे नहीं लगता कि ये दोनों धर्म धुरंधर सनातन के रक्षक हैं ये धर्म का दुरुपयोग कर राजनीतिक सत्ता के हकदार बने हुए हैं और बनने बेताब हैं।लड़ने मरने के लिए हिंदू लोग है ।अब लगता यही है कि इस धर्म- राजनीति के युद्ध में अब हिंदुओं की बारी है। सोचिए शंकराचार्य का ये हाल हुआ है तो भक्तों का क्या होगा?

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