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क्या से क्या हो गया?

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शशिकांत गुप्ते

ताश के पत्तो का एक खेल होता है सात हाथ।इस खेल में पत्ते बटने के बाद एक खिलाड़ी को हुकूम बोलना पड़ता है।ताश के पत्तों में बोले जाने वाले हुकूम को ट्रम्प कहतें हैं।बहुत सी बार खिलाड़ी के हाथों में ट्रम्प के पत्ते धरे रह जातें हैं, और दूसरा खिलाड़ी एक ही रंग ( Color) के पत्तों से सात ही हाथ बना लेता है।जिसके हाथों में ट्रम्प होता है वह ट्रम्प के पत्ते हाथों में है,इसी भ्रम में रह जाता है।
जब आश्चर्यजनक घटनाएं घटित होती है,तब एक फ़िल्मी संवाद याद आता है। तुमने काम तो ईमानदारी से किया लेकिन समझदारी नहीं बरती
इस संवाद से एक महत्वपूर्ण बात समझमें आती है।किसी भी व्यक्ति में बहुत सी योग्यताएं हो,बहुत पढ़ा लिखा हो,यहाँ तक की ईमानदार भी हो सकता है लेकिन यह सारी योग्यताएं धरी रह जाती है।यदि व्यक्ति समझदार न हो।
किसी क्या खूब कहा है।
समझदार इंसान दिमाग़ चलाता है
और ना समझ जुबान
फिल्मी गीत यह पंक्तियां प्रासंगिक लगती हैं।
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों हम है अनाड़ी
गलती इंसान से ही होती है।लेकिन किसी भी व्यक्ति को इस भरम में नहीं रहना चाहिए।
समझदार मैं ही हूँ बाकी सब नादान
इसी भरम में आजकल घूम रहा इंसान
जो भी घटित हुआ सच में आश्चर्यजनक ही घटित हुआ है।
हमने तो पठानों की तारीफ में भरी सभा में कसीदे पढ़ने में कोई कमी नहीं की थी।
यहॉ तक दोस्ती की मिसाल प्रकट करते हुए फिल्मी गाने की पंक्तियां भी गुनगुनाई थी।
यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी
इन पंक्तियों का अंग्रेजी अनुवाद भी सुनाया था।बहुत प्रशंसा हुई थी।किंतु परिमाण में यही कहा जाएगा।
नादान की दोस्ती जी का जंजाल

प्राथमिक कक्षा में पढ़ाई से समय का एक वाकया याद आया है।
कक्षा में एक शैतान बच्चा नित नई शरारत करता था।
उसे सबक सिखाने के लिए एक दिन अध्यापक ने एक किस्सा सुनाया।
एक मोहल्ले में एक बहुत ही शैतान बालक रहता था।उसी मोहल्ले में एक पंडितजी भी रहतें थे।पंडितजी जब भी मंदिर पूजा करने घर से निकलते,वह बालक उन्हें गाली बकता था।पंडितजी उसे गाली बकने पर रोज एक आना देतें थे।यदि वह दो गाली बकता तो उसे दो आने देते थे।
एक व्यक्ति ने पंडितजी से पूछा आप उस बालक को गाली बकने पर डांटने के बजाए पैसे देतें हो।पंडितजी हँस कर बात टाल देते थे।एक दिन किसी कारण पंडितजी घर से बाहर नहीं निकल पाएं।वह बालक परेशान हो गया।बालक ने देखा एक हींग बेचने वाला पठान आरहा है।पठान को देख बालक ने सोचा पंडितजी तो मंदिर के पुजारी मात्र है,यदि वे मुझे गाली बकने के एक या दो आने देतें हैं, तो यह पठान तो ज्यादा पैसे दे सकता है।भ्रमवश बालक ने पठान को गाली बक दी।फिर क्या था। पठान ने बालक की अपने ढंग से पूजा की और दक्षिणा दी।उस दिन बाद बालक ने कभी भी किसी को गाली नहीं बकी और हर किसी के साथ शैतानी करना भी छोड़ दिया।
जो भी घटित हुआ है। वह दुनिया के सामने एक गम्भीर प्रश्न है?
रामजी भगवान में आस्था रखने वालों को रामचरितमानस में लिखी यह सूक्ति याद रखना चाहिए।प्रीति और बेर बराबर वालों से करना चाहिए।
अंत में यही कहा जा सकता है।
दुश्मन न करें दोस्त ने वो काम किया है
जिंदगी भर का गम हमें ईमान दिया है
बहुत सी बातें इशारों में ही कही जा सकती है।समझदार को इशारा ही काफी होता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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