अग्नि आलोक

गाँधी की छूआछूत विरोधी प्रसिद्ध यात्रा के कुछ अंश

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शिवानन्द तिवारी,पूर्व सांसद

खादी,हिन्दू मुसलमान सद्भाव और छुआछूत विरोध गांधीजी के तीन सबसे बड़े कार्यक्रम थे।लेकिन उनकी ज़्यादा दिलचस्प और प्रभावी यात्रा हरिजन यात्रा थी.जिसे उन्होंने 1934 में छुआ छूत की समाप्ति और मंदिर प्रवेश के लिए की थी. आज कई दलित नेताओं को हरिजन शब्द पर आपत्ति है. लेकिन गांधी जी ने बहुत चरचा और सोच विचारकर यह नाम दिया था और अछूतोद्धार का ज़्यादातर काम ( जो अन्य किसी दलित आंदोलन की तुलना में ज़्यादा प्रभावी हुआ ) इसी नाम के साथ हुआ. गांधी होते तो शायद आज का दलितों का रुख़ देखकर हरिजन शब्द वापस भी ले सकते थे.

गांधी ने इस यात्रा में कुल 12,504 मील अर्थात क़रीब 20 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय की. यह क़रीब साढ़े नौ महीने चली.

इस यात्रा का बहुत सुंदर विवरण बहुत बड़े लेखक वियोगी हरि और बड़े उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला ने लिखा है. उससे ही पता चलता है कि गांधी ने बिहार के भूकंप को वहाँ के समाज में द्वारा बरते जाने वाले हुआछूत से क्यों जोड़ा था. इस यात्रा में छपरा के देहात में जब वे डोम जाति के लोगों के घर पर गये तो उन्होंने छुआ छूत का सबसे गंदा रूप देखा. उनको पानी भरने में भी जितनी दिक़्क़त होती थी वह सोचा नहीं जा सकता. पर गांधी के इस बयान  की मंशा और राजनीति को समझने की जगह उसको अवैज्ञानिक बताने की होड़ लग गयी और इस विवाद में रवि बाबू यानी रवींद्रनाथ टैगोर भी उतर गये. लेकिन गांधी अपनी बात पर डटे रहे .

यह यात्रा बहुत शोर शराबे और फूल माला या तोरण द्वार वाली तो नहीं थी. लेकिन इसमें उत्साह ज़बरदस्त था. लेकिन कई जगह विरोध भी रहा. मंदिर प्रवेश का विरोध आम तौर पर नहीं हुआ और गिनती के ठिकाने थे जिनके लिए बाद में आन्दोलन चलाना पड़ा. पूरा समाज आम तौर पर ऐसे व्यवहार कर रहा था कि गांधी यह मुद्दा उठाकर और दलितों को मुख्यधारा में लाकर समाज की कोई गलती सुधार रहे हैं और समाज के सीने से कोई बोझ उतार रहे हैं. उनके एहसानमंद होने का भाव ही प्रमुख था. दलितों की भावना भी ऐसी ही थी.

पर चार जगहों पर विरोध बहुत ज़्यादा था. पुणे, बनारस, पुरी (ओड़िसा) और देवघर (बिहार). वैसे भी ये सनातनी कट्टरता के ठिकाने रहे हैं. देवघर में गांधी पर गंभीर हमला हुआ. वे जिस घर में रुके थे वह पंडों के निशाने पर था. गालियों और पत्थरों की बरसात में गांधी बाल-बाल बचे. लेकिन घर को और गाड़ी को नुक़सान हुआ. हालाँकि गांधी ने अपना कार्यक्रम किया.

बिड़ला जी ने यात्रा का रोचक विवरण लिखा है. ‘लोगों को लगता था कि गांधी क्या आए हैं, भगवान आ गए है’. वे गांधी के आगे आगे कीर्तन करते चलते थे.  क़ाफ़िले में दो दो हज़ार आदमी साथ चलते हैं. प्रार्थना में हज़ारों लोग शामिल होते हैं. लोग बड़े जतन से ताम्बे के टुकड़े, पैसे, अधेले, भारतसे, अधेले, पाई लाते हैं और गांधी जी के चरणों में रख देते हैं. वे आगे लिखते हैं 20-20 कोस से चल कर आने वाले नर कंकाल धोती के सात गाँठों से जतन से एक पैसा निकाल कर गांधी जी के चरणों में रख देते हैं और वह दृश्य सचमुच रूलाने वाला होता है. उन्होंने अपना जो अनुभव लिखा है वह कम रुलाने वाला नहीं है. वे उड़ीसा के मध्य में यात्रा में शामिल हुए थे. जब वे यात्रा के उस पड़ाव वाले दफ़्तर पहुँचे तो सभी निकल चुके थे और खाना ख़त्म हो गया था. अब बिड़ला आये हों तो सत्कार तो होगा ही. आयोजक में किसी ने पूछा कि क्या खाएँगे पूछा. बिड़ला जी को लगा कि अब ख़ाने और बनवाने का झंझट कौन करे. सो उन्होंने कहा कि दूध पी लेंगे. फिर यह हुआ कि उनको स्नान करना था. उन्होंने लिखा है कि स्नान के लायक पानी ही नहीं था. और जब किसी तरह कुएँ से एक बाल्टी पानी निकला तो वह कीचड़ भरा था. और ज़ब वे खाने बैठे तो मालूम हुआ कि तीन चार गांयों को दूह कर आधा सेर दूध जुटाया गया था. उसे पीते हुए बिड़ला जी को अपराध बोध ही होता रहा कि जानें किन बच्चों का दूध छीन कर उनको पिलाया जा रहा है. 

यह असरदार यात्रा दो अक्टूबर 1934 को बनारस समाप्त हुआ. इस बीच सर्दी गर्मी और बरसात सब झेलना पड़ा. बल्कि जब यात्रा ओड़िसा में थी तो इतनी बरसात होने लगी यात्रा को कुछ समय रोकना पड़ा और ओड़िसा का कार्यक्रम अधूरा ही रहा. इसे बाद में पूरा किया गया.

(अरविंद मोहन की किताब ‘गाँधी कथा’ पर आधारित)

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