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धर्म ग्रंथों से बाहर करो उत्पीड़ित वर्ग और महिला विरोधी मान्यताओं को

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,मुनेश त्यागी 

       बिहार के राजनेता चंद्रशेखर और स्वामी प्रसाद मौर्य के रामचरितमानस संबंधी बयानों पर हिंदुत्ववादी हलकों में हाय तौबा मची हुई है और चंद्रशेखर पर हो रहे चौतरफा हमले स्वागत योग नहीं है। आइए संक्षेप में जानते हैं कि उन्होंने क्या कहा है? उन्होंने कहा है कि रामचरितमानस जैसे धार्मिक ग्रंथों  ने समाज में उसी तरह नफरत फैलाने का काम किया है जिस तरह मनुस्मृति और गोलवलकर के “विचार नवनीत” ने सामाजिक विभेद को बढ़ाने का काम किया है।

      उन्होंने अपने बयान में वर्णाश्रम समर्थक, स्त्री विरोधी, शूद्र दलित एससी एसटी और ओबीसी विरोधी अंशों को भी उद्धृत किया है। उन्होंने उदाहरण दिया है,,,,

“ढोल गंवार शूद्र पशु नारी 

ये सब ताड़न के अधिकारी।”

और इसी के साथ उन्होंने कहा है,,,,

“पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना 

पूजिए ना शूद्र गुण ज्ञान प्रवीणा।” 

और उन्होंने उध्दृत किया है,,,,

“शूद्र अगर वेद सुने तो उनके कानों में शीशा डाल दो।”

      आज के परिप्रेक्ष में तुलसीदास की इस मान्यता का किसी भी दशा में समर्थन नहीं किया जा सकता है। अगर कोई भी आदमी या संगठन इन विचारों का समर्थन करेगा, तो उसे किसी भी दशा में समाज का भला करने वाला कथन नहीं कहा जा सकता है और वर्तमान परिस्थितियों में इस मानसिकता और सोच का किसी भी हालत में समर्थन नहीं किया जा सकता।

       इस औरत विरोधी और शूद्र विरोधी, जिसमें भारत के एस सी, एस टी और पिछड़े वर्ग आते हैं, यानी जिसमें भारत की कुल आबादी का 90% से ज्यादा हिस्सा शामिल है, मानसिकता और सोच का परिणाम है कि आज समाज में औरतों और शूद्रों के खिलाफ होने वाले अपराधों की सुनामी आई हुई है। रोजाना औरतों के खिलाफ मनमाने अपराधों को जन्म दिया जा रहा है। बच्चियों को गर्भ में ही मारा जा रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा बच्चियों को गर्भ में भारत में ही मार दिया जाता है। औरतों के खिलाफ बलात्कार, दहेज, उत्पीड़न दहेज, हत्या और घरों से निकालने की घटनाओं जैसे अपराध मीडिया में लगातार आते रहते हैं। इसी सोच की वजह से उन्हें रोज प्रताड़ित और अपमानित किया जाता है और उन्हें आज भी दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है। उन्हें आज भी भोग्या और मनोरंजन की वस्तु ही समझा जाता है।

        यही हाल शूद्रों के साथ होने वाले अपराधों का है। उन्हें आज भी घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है, घोडी पर चढ़कर बरात नहीं निकालने दी जाती, घुड़चढ़ी नहीं करने दी जाती, बाजा बजाकर घुड़चढ़ी नहीं करने दी जाती, कई स्थानों पर उनके हाथ का बना खाना नहीं खाया जाता और कई मंदिरों में उनके प्रवेश वर्जित है। आज भी समाज में सबसे ज्यादा अपराध  उन्हीं के खिलाफ हो रहे हैं। छोटे-छोटे अपराधों में वही सबसे ज्यादा जेलों में बंद हैं और सड रहे हैं।

       आजादी के 75 साल बाद भी वही मनुवादी सोच हमारे समाज में जारी है। तुलसीदास भी इसी सोच से नहीं बच पाए। आखिर ऐसे विवादित हिंसक, परपीडक , उत्पीड़न करने वाली और प्रताड़ित करने वाली प्रवृत्ति के अंशों को हमारे धार्मिक ग्रंथों से निकाल क्यों नहीं दिया जाता? और इन्हें आज भी वही स्थान क्यों दिया जा रहा है? यह बहुत ही विचारणीय सवाल है कि आज के जमाने में ऐसे विवादित, उत्पीड़क और अपमानजनक विचारों की कोई जरूरत नहीं है।

      आज हम समतावादी, समानतावादी, समाजवादी और भाईचारे को बढ़ाने वाली मानसिकता और सोच को बढ़ाने और बनाए रखने वाले, संवैधानिक समय में रह रहे हैं। आज नागरिक कानून की नजर में सब बराबर हैं। आज किसी भी जाति या धर्म के लोगों को, दूसरी जाति के लोगों को ऊंच-नीच या छोटा समझने की इजाजत नहीं है और ऐसा समझना कानून की नजर में एक बड़ा कानूनी जुर्म है।

        और भी देखिए, आज के हमारे धार्मिक ग्रंथ क्या कह रहे हैं कि “पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना, पूजिए ना शूद्र गुण ज्ञान प्रवीणा।” यानी कि किसी भी ज्ञान, गुणहीन ब्राह्मण की पूजा कीजिए और गुण, ज्ञान में प्रवीण और निपुण शूद्र को मत पूजिए। यह सोच और मानसिकता कहां तक सही है? और कहां तक मान्य है? हकीकत यही है कि इसी प्रकार की सोच और मानसिकता हमारे समाज में आज भी कार्य कर रही है।

     हमारे यहां उच्च जातियों के भ्रष्ट, बेईमान, अज्ञानी, अंधविश्वासी, धर्मांध, मक्कार और अपराधी लोगों को मान सम्मान दिया जाता है मगर बहुत से लोगों की नजरों में और सोच में, उन गरीबों, दलितों और पिछड़ी जातियों के लोगों का मान, सम्मान नहीं है जो ज्ञानी, गुणी, निपुण, विशेषज्ञ और निपुण है। उन्हें आज भी नीची, अपमानजनक, गिरी हुई और ऊंच-नीच की निगाह से देखा जाता है। यह कहां तक सही और जायज है?

        आज जनवादी, लोकतांत्रिक, जनवादी और समाजवादी सोच का जमाना है। बहुत सारे समाजवादी और प्रगतिशील देशों और समाजों जैसे रूस, चीन, कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, न्यूजीलैंड, नार्वे, स्वीडन और दक्षिणी अमेरिका के विभिन्न देशों में, सब जातियों, नस्लों और धर्मों के लोगों को बराबरी समता और समानता का अधिकार है। सबको शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार का अधिकार है। इन देशों में ऊंच-नीच और छोटे बड़े की मानसिकता, सोच और व्यवहार को तिलांजलि दे दी गई है। वहां कानून की निगाह में सब बराबर है। 

      वहां समानता और समाजवादी विचारों को धरती पर उतार लाया गया है। अब वहां समता, समानता, बराबरी और भाईचारे का जमाना है, लोगों में आपसी प्रेम और मोहब्बत है। तमाम तरह के अपराधों, गरीबी, शोषण, भेदभाव, अन्याय और अत्याचारों को अलविदा कह दिया गया है।

         हमारे देश में भी वक्त का तकाजा है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में दलितों, पीड़ितों और गरीबों के प्रति अपमानजनक, अमर्यादित, उत्पीड़नकारी, इस्तेमाल की जाने वाली, ऊंच-नीच की भाषा, मानसिकता, सोच और व्यवहार को इतिश्री कहकर, उन्हें वहां से निकालकर और संशोधित करके, एकदम तिलांजलि दे देनी चाहिए और समानता, बराबरी धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और आपसी भाईचारे वाली सोच, मानसिकता और व्यवहार को अमल में लाया जाना चाहिए। तभी इस प्रकार के गैरजरूरी विवादों और अनावश्यक आपसी झगड़ों से निजात पाई जा सकती है।

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