*-अन्ना दुराई*
ऐसे समय जब कबीर परंपरा के गायक श्री भैरूसिंह चौहान को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया जा रहा हो, कबीर की उन सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियों से अब आसीन सत्तारूढ़ दल के नेता दूर होते जा रहे हैं, जिसमें वे कहते हैं निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाय। सत्ता में बैठे नुमाइंदों को अब अपनी निंदा रास नहीं आती। आलोचना में अच्छाई ये ढूँढ नहीं पाते। कोई थोड़ा बहुत बोल दे तो ये सहन तक नहीं कर पाते। सही मायने में नेताओं को सहनशील होना चाहिए। कोई इशारा करे तो उसे समझना भी चाहिए। होता इसका उल्टा है। किसी की सुनना इनकी डिक्शनरी में नहीं। झूठे प्रचार तंत्र के साथ ये बस अपनी ही अपनी चलाते हैं। ये दिन को रात कहे तो रात, या रात को दिन कहे तो दिन। चाहे जिस दल की सरकार हो, जब नेता निरंकुश हो जाते हैं तो सत्ता रूपी घोड़ा भी बेलगाम होकर दौड़ता है। न इधर देखता है न उधर। सीधे अपनी ही दिशा में चलता चला जाता है। आम जन मानस के भले बूरे से इनका कोई वास्ता नहीं रहता। वास्तव में देखा जाए तो अपने नेताओं को सही राह दिखाना भी राष्ट्र प्रेम है। उनके गलत फैसलों को इंगित करना भी राष्ट्र प्रेम है लेकिन यहाँ राष्ट्र प्रेम की परिभाषा बदल गई है। राष्ट्र प्रेम के नाम पर गलत सही सब संभव हो गया है। नाकामयाबी, जवाबदेहीता, अनिर्णयता और अनुभवहीनता को छिपाना आदत बनता जा रहा है।
यही कारण है कि अब मुखरता का स्थान मौन, ताने का स्थान तारीफ, सलाह का स्थान सलाम, वैचारिक आदान-प्रदान की जगह वैमनस्यता और लानत मलामत का स्थान लल्लो चप्पो एवं चमचागिरी ने ले लिया है। सब चुप हैं। कोई अपने खिलाफ एक शब्द नहीं सुनना चाहता। अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक शिकंजा सा कसता जा रहा है। यहाँ डीजे के कान फोडू शोर पर नाचते गाते और झुमते समूह बिना किसी रोक टोक के गुजर जाते हैं लेकिन अपनी जायज माँगों एवं परेशानियों के समर्थन में आम नागरिकों और संगठनों को जुलूस धरना प्रदर्शन की मंजूरी नहीं मिलती। मुद्दा चाहे जो हो, अब सवाल आपस में होते हैं और उनके जवाब भी आपस में ही ढूंढे जाते हैं। सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाती, सिर्फ कयास ही लगते रहते हैं। अपने सवालों के जवाब भी अपनों से ही मिलते हैं। नहीं मानों तो आपसी तनातनी तक हो जाती है। कोई भी घटना दुर्घटना हो, जुबानी जमा खर्च ज्यादा होता है। गुनाह किसका सजा किसको, फर्क नहीं पड़ता। मूल विषय पर बात नहीं होती, सब इर्द-गिर्द घुमते रहते हैं। वाकई देश की जनता भी बहुत भोली है। नदी की उस धार की तरह, जिधर मोड़ो उधर बह जाती है। हो भी यही रहा है, जहां देखो वहाँ हिन्दू मुस्लिम के सिवाय कुछ नहीं। विदेशों में जाकर इन नेताओं के बच्चे एशियावासी हो जाते हैं। विभिन्न देशों के बच्चे एक छत के नीचे साथ साथ रहते हैं और हम हैं कि एक दूसरे को गाली देकर दिन गुजार देते हैं। इस रात की भी सुबह बेहद जरूरी है। आएँगे बिना किसी तनाव वाले दिन भी एक दिन जरूर।

