*कश्मीर समस्या के पीछे का सच*भाग 10*
*अजय असुर
भारतीय राज्य सत्ता की विस्तारवादी नीति और प्रतिक्रियावादी चरित्र के कारण ही आज कश्मीर की समस्या बनी हुई है। भारतीय शासक वर्ग अपने लोकतांत्रिक या जनवादी स्वरूप के लिए खुद को चाहे जितना लोकतांत्रिक बताये पर हकीकत यह है कि यह शासक वर्ग द्वारा जनता को बेवकूफ बनाने के लिए गढ़ा गया एक और झूठ है। वास्तविक रूप में इस देश की राज्यसत्ता का वास्तविक प्रतिक्रियावादी चरित्र राष्ट्रीयता के जनवादी संघर्षों के दमन और अत्याचार में दिखायी देता है। कश्मीर की बात छोड़ दीजिये भारतीय राज्यसत्ता का प्रतिक्रियावादी चरित्र आपको खुलेआम भी कई जगहं नजर आता होगा, जब भी कोई संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी जनवादी मांग करते हैं या उस जनवादी मांग के लिये धरने पर शांतिपूर्ण संवैधानिक तरीके से सड़क पर उतरते हैं तो उनका भी दमन कर दिया जाता है। इन्होंने हाल ही में दिल्ली किसान आन्दोलन को जिस तरह कुचला है, वह एक मिशाल है।
विशेषकर 1990 के बाद कश्मीरी संघर्ष को कुचलने में शासक वर्ग की राज्य सत्ता ने न सिर्फ कानूनी रूप से ही नहीं बल्कि अपने ही संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए गैर संवैधानिक और गैर-कानूनी ढंग को भी अपनाया है और जनवाद का गला घोंटा है। देश के भीतर चलने वाले अनेक जनांदोलनों को कुचलने में सेना/पुलिस समेत ससस्त्र बलों का व्यापक इस्तेमाल इसके प्रतिक्रियावादी चरित्र को सत्यापित ही करता है। इस प्रतिक्रियावादी चरित्र को हम ऐसे भी देख सकते हैं कि कश्मीर में सत्ता की भारी शक्तियाँ राज्यपाल के पास केन्द्रित हैं और सेना को विभिन्न कानूनों के तहत दमन के लिए असीमित अधिकार प्रदान कर दिये गये हैं। जिससे आये दिन ससस्त्र बल जनता पर खुलकर अत्याचार करते हैं।
भारतीय राज्य के उदारवादी चरित्र को लेकर भी अनेक भ्रम लगातार फैलाये जा रहें हैं लेकिन भारतीय राज्य न तो कभी उदारवादी था और न अब है। भारत ही नहीं विश्व के सभी पूंजीवादी राज्य सत्ताओं का उदारवादी मुखौटा तभी तक कायम रहता है जब तक जनता का कोई आंदोलन या मांग पूंजीवादी राज्य के आम हितों के खिलाफ नहीं होती है। हमें उत्तर कोरिया, चीन की तानशाही मीडिया द्वारा लगातार दिखाई जाती है और उनकी तानाशाही हमें दिखाई भी देने लगती है पर भारत के अन्दर शासक वर्ग की तानशाही है वो नहीं दिखती है क्योंकि दलाल मीडिया राज्यसत्ता की तानाशाही दिखाने के बजाये उसको शासक वर्ग के हितों के अनुसार जस्टीफाई कर उल्टा भारतीय राज्यसत्ता का उदारवादी चरित्र दिखाती है। वैसे तो राष्ट्रीयता के सभी संघर्षों में लेकिन कश्मीर, असम, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम के विशेष संदर्भों में सेना ने क्रूरता अत्याचार, दमन, उत्पीड़न और अमानवीय कार्यवाहियों के नये-नये रिकार्ड कायम किये। सेना का गठन बाहरी आक्रमणकारियों के लिये किया जाता और उसी अनुसार अधिकतम बल प्रयोग के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। पर कश्मीर घाटी के अन्दर सेना जिस तरह बल प्रयोग करती है इससे तो यही लगता है कि कश्मीर घाटी की जनता जो अपने हक-हूकूक के लिये आवाज उठाये वो भारत का शत्रु है।
सेव द चिल्ड्रेन फंड (Save the Children Fund) के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय के वशीर अहमद द्वारा किये गये एक अध्ययन में बताया गया है कि 1999 तक कश्मीर में 60 हजार आम नागरिक मारे गये हैं। इसमें से 80% लोग सुरक्षा बलों द्वारा या हवालात में मारे गये हैं। श्रीनगर के हिस्टीरिया के 93% रोगी ऐसे होते हैं जो किसी न किसी प्रकार से सेना की अमानवीय क्रूरता के कारण ऐसी अवस्था में पहुंचे हैं। कश्मीर में सेना स्थानीय अधिकारियों की तो बात बहुत ही दूर है राज्य सरकार को भी कोई एहमियत ही नहीं देती है। यहाँ तक कि वह न्यायालयों के निर्णयों को ठेंगा दिखाते हुए उनका मखौल उड़ाती रही है। बलात्कार, निर्दोष नागरिकों की गिरफ्तारी, अपमानजनक तलाशियों, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोषों की हत्या, हवालात में अमानवीय क्रूरता कश्मीर में सेना का इससे ज्यादा अच्छा परिचय अन्य नहीं हो सकता। और यह सैनिक सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) Armed Forces Special Power Act और Disturbed Area Act (अशांत क्षेत्र अधिनियम) आदि द्वारा दिये गये सुरक्षा एक्ट के तहत काम कर रहे हैं। असीमित अधिकारों ने सेना को हर प्रकार की मनमानी करने की छूट दे दी है। सेना कश्मीरियों के दमन और अत्याचार के दौरान निर्दोष लोगों की हत्या के लिए अकेले ही नहीं है वरन कई बेरोजगार कश्मीरी नागरिकों को ही लगा रखा है कश्मीरी लोगों को मारने के लिये। यह कथित कश्मीरी लड़ाकू न सिर्फ सेना के सुरक्षा घेरे में ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय रायफल्स के शिविरों में रहते हैं। और इन नौजवान लड़ाकुओं की सुरक्षा राष्ट्रीय रायफल्स करती है। राष्ट्रीय रायफल्स और बी. एस. एफ. दोनों साथ मिलकर इन लड़ाकुओं पर नजर करती है और कार्यवाहियों के लिये निर्देश देती है। यह कश्मीरी लड़ाकू इख्वान उल मुस्लिमीन तथा जम्मू व कश्मीर साउथ इख्यान जैसे ग्रुप से हैं। इन संघठनों का निर्माण शासक वर्ग ने जनवाद की मांग करने वालों की हत्या करने और कश्मीरी जन संघर्ष को तोड़ने के लिये किया गया है, साथ ही साथ सेना इनके माध्यम से अनेक ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिलवाती है जिससे कश्मीरी संघर्ष को बदनाम किया जा सके।
देश के अनेक धार्मिक, गैर धार्मिक सहित अनेक संगठन और सभी राजनैतिक दल कभी जटिल परिस्थितियों के नाम पर तो कभी सेना के मनोबल पर पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर हर ऐसी बर्बर और अमानवीय कार्यवाही पर या तो चुप रहते हैं या फिर उल्टे सेना का ही समर्थन करते हैं। सांप्रदायिक या राजनैतिक दलों द्वारा सैनिक क्रूरता को न्यायसंगत ठहराने के कारण सेना का हौसला ही बढ़ता है। आज कश्मीर का एक भी ऐसा परिवार नहीं बचा होगा, जो किसी न किसी रूप में सेना/पुलिस के अत्याचार का शिकार न हुआ हो। सेना के दमन और अत्याचार ने कश्मीर समस्या के समाधान को और भी ज्यादा जटिल कर दिया है। सैनिक दमन और अत्याचार की सत्यता को आप इस बात से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि आज जम्मू-कश्मीर में सभी सैन्य बलों को मिलाकर तकरीबन 7 लाख के आस-पास सैनिक तैनात हैं। जम्मू-कश्मीर में हर 17 व्यक्ति पर एक सैनिक है और इसको आप प्रत्यक्ष तौर पर यूं समझ सकते हैं कि आप स्वंय देखें कि बहुत कम दूरी पर सैनिकों, बंकरों, बैरिकेड और नाकों पर सेना तैनात है और कश्मीर के चप्पे-चप्पे पर सेना की मौजूदगी बताती है कि यहां पर कितने असामान्य रूप से कड़े सुरक्षा इंतज़ाम हैं। निश्चित ही सेना के बल पर ही भारतीय राज्यसत्ता कश्मीर पर अपना नियंत्रण बनाये हुए है।
*शेष अगले भाग में…*
*अजय असुर*

