( इस दुनिया के अंधकार में डूबे,मजबूर नेत्रहीन लोगों की एक आर्तनाद करती हृदयविदारक कविता )
क्या दुनिया सारी है जगमग,
फूल सजे हैं क्या पगपग,
क्या चहूँ ओर हरियाली है,
क्या दुनिया सुंदर आली है।
क्या ग़म है सबके चेहरे पर,या खुशियाँ छाई हैं मुख पर,
कौन किस तरह कैसा है,
क्या पता नज़ारा कैसा है,
मुझको तो कुछ भी पता नहीं
क्या दृश्य किस तरह दिखता है,
मैं नाबीना हूँ नेत्रहीन
मुझसे ही सब कुछ छिपता है।
ये महरूमी अब खलती है,
ख्वाहिश मेरी अब जलती है,
मैं भी दुनिया को देखूँ,
क्या कैसा है सब कुछ देखूँ,
पर कहाँ स्वयम् कुछ होता है,
बिन किए कहाँ कुछ होता है,
दुनिया वालों इक बात सुनो,
तुम सबका सम्मान करो,
खुद भी दुनिया को देखो
दूजों को आँखें दान करो।
हम तुम सभी मुसाफिर हैं,
कोई न अकेला है जग में,
जब कष्ट हरेंगे सब मिलकर
तब खुशियाँ फैलेंगी पग में।
हम प्रबल हमारी इच्छा भी,
अव्वल होती है शिक्षा भी,
है बाधा सबके जीवन में,
मिल जुल कर लेंगे दूर सभी।
बस एक कष्ट यह मेरा है,
आँखों के बिना अंधेरा है,
इंसा-इंसा के काम आए,
सबका सुंदर परिणाम आए,
आगे आकर ऐ जग वालों
एक अनुपम वरदान करो।
खुद भी इस दुनिया को देखो,
और एक आँख को दान करो।
निखिल श्रीवास्तव
,प्रस्तुति-श्री अरूण कुमार मिश्रा,गाजियाबाद, उप्र
.संपर्क-+91 99684 87582
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र

