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……निगेहबान है आखें

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शशिकांत गुप्ते

सन 1962 प्रदर्शित फिल्म सन ऑफ इंडिया के इस गीत का स्मरण हुआ। यह गीत लिखा है शकील बदायुनी ने।
इसे फिल्माया है बाल कलाकार साजिद खान पर।
फिल्म में यह बाल कलाकार सड़कों पर जोर शोर से गाना गाते हुए अखबार बेंचता हैं।
गीत की पंक्तियों को सुनने पर देश के लोकतंत्र पर गर्व होता है।
खबरों को इतनी बेबाक तरीके लिखना और बेखौफ होकर सरे राह आम जनता तक पहुंचाना तारीफे काबिल है।
गीत की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है।
आओ काकाजी इधर आओ मामाजी इधर सुनो दुनिया की खबर
आज एक भक्त ने भगवान का मंदिर लूटा
एक बेईमान ने मस्जिद में चुराया जूता
काले बाज़ार की एक टोली पुलिस ने धर ली
संभवतः साठ वर्ष पूर्व काला बाजार करने वाले विदेश भागने के हूनर से अनभिज्ञ थे।
या तात्कालिक समय …. मौसेरे भाईयों के समूह को टोली कहते होंगे,माफिया शब्द का प्रचलन नहीं था। तात्कालिक समय में काला बाजार करने वाले एक ही नाम राशि नहीं होंगे। अन्यथा भगोड़े भी अगड़ी पिछड़ी की गणना में किसी स्व नामराशि वाले की मान की हानि कर बैठते?
गीत की निम्न पंक्तियां भी विचारणीय है।
एक धनवान ने अपना धरम छोड़ दिया
आज एक भूखे ने फुटपाथ पे दम तोड़ दिया
हर कोई पाप के धंधे में लगा रहता है
कहीं से आज का इंसान कहीं पहुंचा है
फिर भी सच्चाई के रास्ते पे नहीं पहुंचा है।
क्या आज खबरों इसतरह बेबाक तरह से लिखकर सड़क पर जोर शोर के साथ लोगों तक पहुंचाने का साहस किया जा सकता है?
जी बिलकुल साहस किया जा सकता है,अपने देश की माटी में लोकतंत्र मजबूती से रचा बसा है।
यह सूक्ति है। इस सूक्ति को किसी ने कभी भी भूलना नहीं चाहिए।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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