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सुरत नहीं, होनी चाहिए सीरत उम्दा

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शशिकांत गुप्ते

किसी दार्शनिक ने कहा है।
जो कोई व्यक्ति स्वयं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करना चाहे तो उसकी चाल मतलब आचरण शुद्ध होना चाहिए, चरित्र मतलब उसमें नैतिकता होनी चाहिए,
चेहरा मतलब उसका व्यक्तित्व प्रभावी होना चाहिए। व्यक्तित्व से तात्पर्य वैचारिक परिपक्वता होना चाहिए। यहां चेहरे की सुंदरता से कतई नहीं। इस संदर्भ में शायरा अंजुम रहबर का ये सटीक है।
च बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इल्ज़ाम आईनों पे लगाना फ़िज़ूल है.

चाल,चरित्र,और चेहरा इन शब्दों का जब सियासत में प्रयोग होता है, तब आश्चर्य होता है।
सियासत में चाल मतलब
एनकेनप्रकारेण सत्ता को प्राप्त करने के लिए, साम,दाम,दंड और भेद इन चारो अनीतियों का उपयोग हर्षोउल्लास करते हुए गर्व के साथ करना होता है।
सियासत में “चरित्र” तो गुमशुदा की तलाश है। इसीलिए सियासत में चरित्र की नई परिभाषा गढ़ी गई है। जघन्य अपराधियों को संस्कारित कहने में कोई संकोच नहीं होता है।
भ्रष्टाचार को सदाचार में बदलने के लिए कर्कश आवाज में औपचारिकता निर्वाह करते हुए ऐलान करना ना तो खाऊंगा,ना खाने दूंगा।
सियासत में चेहरे के बात बहुत ही हास्यास्पद लगती है।
कारण सियासत में चेहरे को थोपा जा रहा है। इस संदर्भ में शायर राहत इंदौरी का यह शेर मोजू है।
कहकर तो गए थे,कपड़े बदलकर आतें हैं
लेकिन साले सब चेहरे बदल कर आ गए
वर्तमान में कपड़े भी दिनभर में चार पांच बार बदले जा रहें हैं।
सियासतदानों का यह आचरण,
आमजन की गरीबी को मुहचिढ़ाने का कुत्सित प्रयास ही तो होता है।
इसीलिए कहा गया है।
प्यार,युद्ध,खेल और राजनीति में सब जायज है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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