भारत का चंद्रयान-3 मिशन जल्द ही चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग करने वाला है। चांद का दक्षिणी ध्रुव बेहद खास है। वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यहां के छायादार क्रेटरों के अंदर बर्फ के रूप में पानी मौजूद है। चांद पर आपको गड्ढे ही गड्ढे दिखेंगे। आइए जानें चांद से जुड़े फैक्ट्स के बारे में।

भारत कुछ घंटों बाद दुनिया में इतिहास रचने वाला है। भारत चांद की दहलीज में खड़ा है। भारत का चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) चांद (Moon) के बेहद करीब पहुंच चुका है और 23 अगस्त की शाम शाम 6 बजकर 4 मिनट पर चांद के साउथ पोल की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) कर सकता है। अब तक दुनिया का कोई भी देश चांद के साउथ पोल पर नहीं उतरा है। पूरा देश भारत के चंद्रयान मिशन की कामयाबी के लिए दुआएं मांग रहा है। हालांकि इसरो इस बार कोई चांस नहीं लेना चाहता है, इसलिए इसरो ने एक और योजना तैयार कर रखी है। ISRO अहमदाबाद के निदेश नीलेश एम. देसाई ने कहा, ‘चंद्रयान के चांद पर उतरने से 2 घंटे पहले हम लैंडर और चांद की स्थिति का जायजा लेंगे और उसके बाद लैंडर के चांद पर लैंड कराने पर फैसला लेंगे। अगर हमें लगेगा की लैंडर या चांद की स्थिति उतरने के लिए ठीक नहीं है तो हम इसे 27 अगस्त तक के लिए आगे बढ़ा देंगे। हम 23 अगस्त को लैंडर को लैंड कराने की कोशिश करेंगे।’
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में खगोल विज्ञान के प्रोफेसर मयंक एन. वाहिया का कहना है कि ‘चंद्रयान 3 चांद की सतह पर उतरने वाला है। पहले चंद्रयान मिशन ने साबित किया कि चांद पर पानी है। चंद्रयान-2 मिशन में चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर लगाना था लेकिन चीजें ठीक से काम नहीं कर पाईं। लेकिन चंद्रयान-2 का मॉड्यूलर मिशन उल्लेखनीय रूप से सफल रहा। चंद्रमा पर उतरना कितना मुश्किल है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए आप देख सकते हैं कि रूस लूना-25 को उतारने में सफल नहीं हो सका। मुझे पूरा यकीन है कि 23 अगस्त को सफल लैंडिंग होगी। चंद्रयान-3 हमें पानी, जल स्रोतों और खनिजों की पहचान करने में मदद करेगा।
चांद पर साउथ पोल क्यों है अहम?
धरती से चांद का एक हिस्सा दिखता है और जो नहीं दिखता है उसे साउथ पोल या मून का डार्क साइड भी कहते हैं। नेहरू प्लैनेटेरियम के अधिकारियों का कहना है कि चंद्रयान 3 की यही कोशिश है कि यह इस डार्क साइड में उतरकर इसके छिपे राज को जान सके। इससे पहले चांद पर अमेरिका, चीन, रूस का भी स्पेसक्राफ्ट ने लैंड किया गया है मगर साउथ पोल में अब तक कोई भी स्पेसक्राफ्ट नहीं उतरा है। इसी साउथ पोल में जा रहे रूस के लूना-25 स्पेसक्राफ्ट का सफर रविवार को खत्म हुआ, जब यह क्रैश हो गया। 2019 में भारत ने अपने लूनर मिशन के साथ चांद पर चंद्रयान 2 भेजा था मगर ऑर्बिट में पहुंचने के बाद लैंडर अलग भी हुआ, मगर फिर लैंडर के साथ संपर्क टूट गया। सोमवार को इसरो ने बताया कि चंद्रयान 2 के ऑर्बिटर से चंद्रयान 3 के लैंडर का संवाद भी हुआ। 2009 में चंद्रयान 2 भेजा गया था, जिसका संपर्क टूट गया।
भारत के लिए क्यों फायदेमंद ?
भारत जल्द ही जब चांद की सतह पर उतरने का अपना दूसरा प्रयास करेगा। भारत का चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर 23 अगस्त को उतरने का प्रयास करेगा, जिससे संभावित रूप से कई आर्थिक लाभ मिलने का रास्ता साफ हो सकता है। चंद्रयान-3 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का तीसरा चंद्र अन्वेषण मिशन है और अगर यह कामयाब होता है तो भारत, अमेरिका, पूर्व सोवियत संघ (अब रूस) और चीन के बाद चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश होगा। चंद्रयान-3 की लैंडिंग के बाद चंद्रमा पर एक रोवर तैनात करने और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन करने की योजना है। अंतरिक्ष यात्रा में लगे इस देश के लिए यह केवल राष्ट्रीय गौरव की बात नहीं है। चंद्रयान-3 की सफलता का भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ सकता है। दुनिया ने पहले ही अंतरिक्ष संबंधी प्रयासों से रोजमर्रा की जिंदगी में मिले फायदे देखे हैं जैसे कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर जल पुनर्चक्रण के साथ स्वच्छ पेयजल तक पहुंच, स्टारलिंक द्वारा विश्वभर में इंटरनेट का प्रसार, सौर ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि और स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियां आदि।
चांद से जुड़े फैक्ट्सपृथ्वी का एक मात्र प्राकृतिक उपग्रह चांद है। चांदनी रात में आसमान में आपको सबसे बड़ी चीज यही दिखाई देगी। इंसानों को शुरू से ही इसमें दिलचस्पी रही है। यही कारण है कि दुनिया आज चांद से जुड़े मिशन चला रही है। भारत अपना चंद्रयान-3 लैंड कराने वाला है तो अमेरिका इंसानों को भी भेज चुका है। लेकिन क्या आप चांद से जुड़ी कई खास बातों को जानते हैं? आइए जानें। कैसे बना चंद्रमा?अंतरिक्ष में चंद्रमा पृथ्वी का सबसे करीबी पड़ोसी है। इसके बनने की कहानी बेहद रोचक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि 4.5 अरब साल पहले मंगल ग्रह के आकार का एक खगोलीय पिंड पृथ्वी से टकराया। तब हमारी पृथ्वी बेहद गर्म थी। इससे निकला मलबा अंतरिक्ष में इकट्ठा होने लगा और करोड़ों वर्षों में यह एक गोल चांद बना। चांद का ऑर्बिट है लॉकचांद जब भी आसमान में होता है तो यह एक ही जैसा लगता है। दरअसल पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी घूमती है। लेकिन चांद अपनी धुरी पर नहीं घूमता। इसी कारण हमें इसका सिर्फ एक हिस्सा दिखता है। चांद पर भरे हैं क्रेटरचांद का ज्यादातर हिस्सा क्रेटर से भरा है। ये विशालकाय गड्ढे हैं। हालांकि पृथ्वी पर भी क्रेटर बने हैं, लेकिन समय के साथ वह अपने को पानी, पेड़ पौधों और टेक्टोनिक गतिविधियों से रिपेयर कर लेती है। पृथ्वी पर क्रेटर आसानी से नहीं दिखते, लेकिन चांद पर इनकी भरमार है। माउंट एवरेस्ट समा जाए क्रेटर मेंये क्रेटर कितने गहरे हैं? अगर उदाहरण से बताएं तो चांद के दक्षिणी ध्रुव का ऐटकेन बेसिन सबसे गहरा और सबसे पुराना क्रेटर है। यह 2500 किमी चौड़ा और 13 किमी गहरा है। यह इतना बड़ा है कि पूरा माउंट एवरेस्ट इसमें समा जाए। इसके अंदर भी सैकड़ों छोटे क्रेटर हैं। चांद पर आते हैं भूकंपअपोलो अंतरिक्ष यात्रियों ने चंद्रमा पर अपनी यात्रा के दौरान भूकंपमापी यंत्रों का इस्तेमाल किया। इसके जरिए उन्होंने पाया कि चांद पूरी तरह से मरा हुआ खगोलीय पिंड नहीं है। चंद्रमा की सतह के कई किमी नीचे छोटे-छोटे भूकंप आते हैं, जो पृथ्वी से खिंचाव के कारण हैं। कभी-कभी छोटे-छोटे क्रैक बनते हैं, जिनसे गैस निकलती है। (Credit-NASA) प्लूटो से बड़ा है चांदचांद का आकार प्लूटो से बड़ा है। यह पृथ्वी का एक चौथाई है। कुछ वैज्ञानिक चांद को ग्रह मानते हैं। इस कारण वह पृथ्वी-चंद्रमा को ‘दोहरा ग्रह’ कहते हैं।