-तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत आज जिस मुकाम पर खड़ा है, वह विरोधाभासों से भरा युग है। एक ओर हम “विश्वगुरु” और “विकसित भारत” की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर आम नागरिक का न्याय पर विश्वास डगमगा रहा है। राजनीति, प्रशासन और न्यायपालिका — तीनों ही स्तंभ जिन पर लोकतंत्र की नींव रखी गई थी, आज एक-दूसरे के प्रभाव में झुकते हुए नजर आते हैं। साल 2025 का यह भारत उस “नए नॉर्मल” में प्रवेश कर चुका है, जहाँ जूते फेंकना विरोध का प्रतीक बन गया है, जहाँ अदालतों के भीतर से न्याय की बजाय विमर्श निकलता है, और जहाँ न्याय की देरी अब केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन चुकी है। हेमंत अत्री और रामप्रकाश जी के बीच यह संवाद सिर्फ़ एक टीवी बहस नहीं था, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ था — एक ऐसा आईना जिसमें भारतीय न्यायपालिका, राजनीति और जनमानस का विकृत प्रतिबिंब दिखाई देता है।
1. अदालतों में जूते: विरोध का नया प्रतीक:
1.1 सुप्रीम कोर्ट का जूता कांड: एक चेतावनी का संकेत:
दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (CJI) पर जूता फेंकने की कोशिश ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। हमारे देश में जूता फेंकना अब केवल अपमान नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति गुस्से का प्रतीक बन चुका है। आरोपी व्यक्ति — एक वकील था, जिसने खुद को “गोल्ड मेडलिस्ट” और “सनातन धर्म का रक्षक” बताया। उसने यह हरकत अदालत में की, जहाँ न्याय का सर्वोच्च आसन है। वह न तो कोई आम अपराधी था, न मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति — बल्कि शिक्षित, पेशेवर और विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति था। इससे यह संकेत मिलता है कि अब व्यवस्था के भीतर के लोग भी व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, लेकिन उनका विरोध भी “विचारधारा” से संचालित है, न कि नैतिक विवेक से।
1.2 सरकार और समाज की चुप्पी:
इस घटना के बाद जिस तरह सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया आई, वह और भी भयावह थी। कई लोगों ने इसे “सनातन की रक्षा” बताया, और आरोपी के प्रति सहानुभूति दिखाई। ना कोई सख़्त कार्रवाई हुई, ना कोई स्पष्ट निंदा। जिस व्यक्ति ने देश के सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा पर हमला किया, वह कुछ ही दिनों में “नायक” बन गया। यहीं से सवाल उठता है —क्या अब यह “नया नॉर्मल” है कि सत्ता के अनुकूल विचार रखने वाला व्यक्ति किसी भी अपराध से बच सकता है?
2. अहमदाबाद कोर्ट का जूता प्रकरण: हताशा का विस्फोट:
2.1 28 साल का इंतज़ार:
गुजरात के अहमदाबाद की एक स्थानीय अदालत में एक व्यक्ति ने जज पर जूता फेंका।
पहली नज़र में यह असभ्यता या आपराधिक कृत्य लग सकता है, लेकिन जब पृष्ठभूमि देखी जाती है, तो यह एक गहरी सामाजिक व्यथा बन जाती है। यह मामला 1997 का था —
मोहल्ले में क्रिकेट खेलने को लेकर झगड़ा हुआ। उस व्यक्ति के पिता को चोट लगी, और मामला अदालत पहुँचा। पहला फैसला आया 2017 में, यानी 20 साल बाद — चारों आरोपी बरी हुए। फिर उसने सेशन कोर्ट में अपील की, और 2025 में वही फैसला दोहराया गया। यानी 28 साल का इंतज़ार, और अंत में न्याय की जगह निराशा।
2.2 व्यवस्था पर हमला नहीं, व्यवस्था से निराशा:
जब जज ने फैसला सुनाया, तो उस व्यक्ति ने क्रोध में जूता फेंका। यह किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि टूटे विश्वास का प्रदर्शन था। एक ऐसा विश्वास जो दशकों से अदालतों के दरवाज़ों पर दस्तक देकर थक चुका था। हेमंत अत्री ने ठीक कहा —“कोई भी व्यक्ति अदालत मौज-मस्ती के लिए नहीं जाता। वह न्याय पाने जाता है।” यह घटना न केवल न्याय में देरी की समस्या को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि जनता अब अपने अधिकारों के लिए हिंसक प्रतीकों का सहारा लेने लगी है।
3. वंतारा प्रकरण और न्याय की दो गति:
गुजरात के बहुचर्चित वंतारा केस में, एक महीने के भीतर एसआईटी बन गई, जांच पूरी हो गई, रिपोर्ट तैयार हो गई, और दोषियों को क्लीनचिट भी मिल गई। यह वही गुजरात है जहाँ एक आम आदमी का मारपीट का केस 28 साल तक चलता रहा। यही विरोधाभास भारत के न्यायिक ढाँचे की आत्मा पर चोट करता है। जब सत्ता से जुड़ा मामला होता है, तो न्याय बिजली की गति से दौड़ता है; और जब एक आम नागरिक न्याय चाहता है, तो न्याय व्यवस्था कछुए से भी धीमी हो जाती है। इस दोहरे मानदंड ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है।
4. न्यायपालिका में विचारधारा का प्रवेश:
4.1 न्यायाधीशों की वैचारिक झुकाव:
हाल के वर्षों में कई न्यायाधीशों के सार्वजनिक बयान विवादों में रहे हैं। किसी ने कहा कि “बहुमत का शासन सर्वोच्च है”, किसी ने धार्मिक आयोजनों में भाग लेकर संविधान की शपथ को चुनौती दी। यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि उस दिशा का संकेत है जिसमें न्यायपालिका का चरित्र धीरे-धीरे वैचारिक रंग ग्रहण कर रहा है।
4.2 सत्ता से समीकरण और न्याय की निष्पक्षता:
हेमंत अत्री ने कहा —“आज जो जज इस्तीफ़ा देते हैं, वे अगले ही दिन किसी राजनीतिक दल से जुड़ जाते हैं। कुछ खुलेआम कहते हैं कि वे आरएसएस के सदस्य हैं।” जब न्याय का उच्चासन राजनीतिक धरातल पर उतर आता है, तो निष्पक्षता एक भ्रम बन जाती है। ऐसे में अदालतें चाहे कितनी भी सही बातें करें, जनता का विश्वास डगमगा जाता है।
5. ‘जस्टिस डिलेड’ से ‘जस्टिस डिनाइड’ तक:
भारत की अदालतों में करीब 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट से लेकर तहसील स्तर की अदालतों तक, हर जगह फाइलों के ढेर और वर्षों की प्रतीक्षा है। कई मामलों में आरोपी और पीड़ित दोनों ही वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। 75% जेलों में कैदी “अंडर ट्रायल” हैं — यानी जिनकी सजा तय ही नहीं हुई। कुछ लोग जितने साल जेल में रहते हैं, उनसे कम सजा मिलती है। रिहा होने के बाद न कोई मुआवजा, न कोई पुनर्वास। यह व्यवस्था केवल धीमी नहीं, बल्कि अमानवीय भी बन चुकी है। न्याय में देरी, समाज में असंतोष और अविश्वास को जन्म देती है — और यही असंतोष अंततः जूते, नारे और सड़क पर गुस्से में बदलता है।
6. सत्ता, कोर्ट और मीडिया: त्रिकोणीय गठजोड़:
6.1 सत्ता का प्रभाव:
आज अदालतों पर राजनीतिक दबाव के आरोप आम हो गए हैं। सत्ताधारी दल के नेता खुले मंचों से अदालतों को यह कहने लगे हैं कि “फैसले ऐसे हों, जिनका पालन हो सके।” यह कथन सतही लग सकता है, पर उसके पीछे सत्ता का संकेत छिपा है — “न्याय वही जो शासन के हित में हो।”
6.2 मीडिया की भूमिका:
मीडिया, जो कभी “चौथा स्तंभ” कहलाता था, अब अक्सर सत्ता का प्रवक्ता बनता दिखता है। अदालतों की आलोचना को “एंटी-नेशनल” ठहराया जाता है, और सवाल पूछने वालों को “सिस्टम विरोधी” कहा जाता है। जब लोकतंत्र के प्रहरी स्वयं सत्ता की परछाई में खड़े हों, तो जनता के पास कौन-सा मंच बचता है?
7. अदालतों के भीतर की विडंबना: शब्द बनाम फैसले :
हेमंत अत्री ने इसे “वर्बल डायरिया” कहा —यानी अदालतों में शब्दों का अम्बार तो लगता है, पर फैसले आते नहीं। जजों के बयान अखबारों की सुर्खियां बनते हैं, लेकिन उन्हीं मामलों में वर्षों तक कोई ठोस निर्णय नहीं होता। उदाहरण के लिए:
· इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार पर सख़्त टिप्पणी की, लेकिन जांच को लंबा खींच दिया।
· चंडीगढ़ मेयर चुनाव में कैमरे पर स्पष्ट गलती दिखने के बावजूद, दोषी अधिकारी बच निकला।
· राहुल गांधी के मानहानि मामले या सावरकर टिप्पणियों जैसे मामलों में भी न्याय के दोहरे मापदंड नज़र आए।
यह वही स्थिति है जिसे अत्री कहते हैं — “अदालत अब व्यक्ति देखकर नियम तय करती है। तुम मुझे आदमी दिखाओ, मैं तुम्हें कानून दिखाऊँ।”
8. जब न्यायपालिका मौन हो जाती है:
निशिकांत दुबे का बयान कि “देश में गृहयुद्ध के लिए CJI ज़िम्मेदार हैं” — यह किसी लोकतंत्र में कल्पनातीत बात है। पर इस पर न सुप्रीम कोर्ट ने कठोर प्रतिक्रिया दी, न सरकार ने।
यह मौन केवल दुर्बलता नहीं, बल्कि सहमति का संकेत है। जब सर्वोच्च न्यायालय तक सत्ता की आलोचना करने से कतराने लगे, तब लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। ऐसा लगता है कि अब न्याय भी राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा बन गया है।
9. न्यायिक प्रणाली की सामाजिक कीमत:
न्याय में देरी या पक्षपात केवल अदालत की समस्या नहीं, बल्कि समाज की भी है। जब किसी निर्दोष को 10 साल जेल में रखा जाता है, तो उसका पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है — उसकी नौकरी, प्रतिष्ठा, परिवार, सब कुछ। रिहाई के बाद उसे कोई मुआवजा नहीं, कोई क्षमा नहीं। भारत में “अंडर ट्रायल” कैदियों की कहानियाँ बताती हैं कि यह व्यवस्था अब केवल अक्षमता नहीं, बल्कि अन्याय का उपकरण बन गई है। एक व्यक्ति 7 साल बाद बरी होता है, लेकिन उस सात साल का कौन हिसाब देगा? कानून में इस पर कोई उत्तर नहीं।
10. जूता फेंकने वाला कौन है? सनातन रक्षक या निराश नागरिक?
सुप्रीम कोर्ट वाला व्यक्ति —विचारधारा से प्रेरित, संभवतः सत्ता समर्थक वर्ग का प्रतिनिधि। अहमदाबाद वाला व्यक्ति — हताश, टूटा हुआ, 28 साल से न्याय की प्रतीक्षा करता हुआ एक आम नागरिक। दोनों ने जूता फेंका, लेकिन कारण अलग थे। पहला सत्ता के इकोसिस्टम से उपजा अहंकार था, दूसरा व्यवस्था के अन्याय से उपजा रोष। लेकिन परिणाम दोनों में समान रहा —किसी पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई। यानी चाहे विचारधारा का चोला हो या हताशा का ज्वालामुखी — कानून अब दोनों के सामने निष्क्रिय है।
11. न्यायपालिका का “क्लीन चिट कल्चर”:
आज “क्लीन चिट” एक नया राजनीतिक शब्द बन गया है। जिस पर भी आरोप लगें, अगर वह सत्ता से जुड़ा है, तो जांच इतनी तेज़ी से होती है कि आश्चर्य होता है। वहीं, विपक्ष से जुड़े या आम नागरिक के मामलों में जांच सालों तक चलती है। यानी न्याय अब परिणाम नहीं, परिस्थिति से तय होता है।
12. जनता का सवाल: न्याय कब और किसके लिए?
जनता अब यह पूछने लगी है —अगर अदालतें, मीडिया, और प्रशासन — सभी सत्ता के अधीन हैं, तो एक आम व्यक्ति न्याय की उम्मीद किससे करे? हर अदालत के बाहर वही पुराना बोर्ड लगा है — “सत्यमेव जयते” — पर भीतर बैठी व्यवस्था अब मानो “सत्तामेव जयते” में बदलती जा रही है।
सारांश : न्याय के नाम पर मौन क्रांति:
भारत के इस “नए नॉर्मल” की असली त्रासदी यह है कि लोग अब अन्याय को भी सामान्य मानने लगे हैं। कभी अदालतों के फैसले जनता के लिए आदर्श होते थे, अब अदालतों की चुप्पी ही व्यवस्था की भाषा बन गई है। हेमंत अत्री ने अपने संवाद के अंत में कहा — “सरकार खुश है, क्योंकि उसे कोई चुनौती नहीं दे रहा। न्यायपालिका भी संतुष्ट है, क्योंकि उसका मौन सबको सूट करता है।” यह कथन असल में उस मौन क्रांति का वर्णन है जो भारत के भीतर चल रही है —जहाँ जनता के भीतर का विश्वास टूट रहा है, जहाँ संस्थाएँ ‘स्वतंत्रता’ की जगह ‘सुविधा’ चुन रही हैं, और जहाँ विरोध अब तर्क नहीं, जूते के रूप में प्रकट होता है। अगर यही नया नॉर्मल है, तो खतरा बहुत गहरा है। क्योंकि जब न्याय पर भरोसा टूटता है, तो संविधान केवल एक किताब रह जाता है, और लोकतंत्र — एक अभिनय।
समापन विचार:
भारत को आज किसी नए कानून या नीति की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की आवश्यकता है। हमें तय करना होगा —क्या हम न्याय को केवल सत्ता की परिभाषा से देखेंगे, या फिर उस आम आदमी की आँखों से, जो 28 साल बाद भी अदालत की चौखट पर खड़ा है, और सोच रहा है — “क्या मेरे पिता के लिए न्याय अब भी जिंदा है?”
(संदर्भ: https://youtu.be/W6EnIUzjw6s?si=weXYa5z4yc3noJ4Y) हेमंत अत्री संवाद पर आधारित विश्लेषण)

