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वफादार, श्वान का पर्यायवाची

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शशिकांत गुप्ते

आज समाचार पत्र के साथ रोज़मर्रा की तहत एक pamphlet आया।
Pamphlet का हिंदी अनुवाद होता है। पैम्फलेट प्रायः छोटे आकार के रंगीन पतले कागज पर मुद्रित किए जाते हैं और इनमें स्थानीय सेवाओं या उत्पादों के बारे में सूचनाएं दी जाती हैं। पैम्फलेट या तो हाथों हाथ बांट दिए जाते हैं या समाचार पत्रों के साथ वितरित किए जाते हैं।
आज के पैम्फलेट में पालतू श्वानों के विभिन्न खाद्य पदार्थों के साथ श्वानोंं के लिए लगने वाली अन्य सामग्री की विशाल श्रृंखला उपलब्ध होने का विज्ञापन प्राप्त हुआ।
उक्त विज्ञापन pet dogs मतलब पालतू श्वानों के लिए होता है।
सीतारामजी ने पूछा कुत्ते की जगह श्वान क्यों लिख रहे हो?
मैने कहा,साहित्यकार को अच्छे शब्दों का उपयोग करना चाहिए।
मै तो सड़क पर विचरण करने वाले कुत्तों या अन्य पशुओं को भी आवारा या जानवर नहीं कहता हूं।
नगर निगम या उन लोगों के सामान्य की स्तुति करना चाहिए,जो street dogs और सड़क पर स्वच्छंदता से तफरी करने वाले पशुओं में आवारा पशु ढूंढ लेते हैं।
मै पशु शब्द का प्रयोग करता हूं,जानवर शब्द का कदापि नहीं।
भले ही कोई फिल्म निर्माता जानवर शीर्षक से कोई फिल्म भी निर्मित करें, और कोई अभिनेता उसमें अदाकारी करें?
मै उन लोगों के पुण्य कार्यों की प्रशंसा करता हूं,जो पशुप्रेमी,गली के श्वानोंं को दूध पिलाते हैं,रोटी और बिस्कुट खिलाते हैं।
यही श्वान जब सड़कों पर पद यात्रियों और दुपहियां वाहन चालकों पर लपकतें हैं,उन्हे लबूरतें हैं और काटतें हैं,तब मुझे मानव के संचित कर्मों में किए गए पापों का स्मरण होता है।
गली के श्वानों की एक विशेषता होती है। यह झुंड में रहते हैं। कोई एक श्वान भौंकने लगता है,तो इसके साथ झुंड के सभी साथी भौंकने लगते हैं। इस तरह भौंकने की सार्वजनिक क्रिया किसी अज्ञात भय से की जाती है।
जब मध्यरात्रि में मानव गहरी नींद में निंद्रा मग्न होते हैं,तब गली के श्वानों का सार्वजनिक अट्टहास रंग में भंग करने वाली कहावत का स्मरण करवाता है।
जो भी हो श्वान ही एक मात्र पशु है,जिसे द्वापर युग में सत्य वादी युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग जाने का पुण्य प्राप्त हुआ है।
पालतू श्वान मानवीय भाषा समझ जातें हैं।
श्वान ही एक पशु है जिसे उफादार होने का खिताब प्राप्त हुआ है। साथ ही स्वामी भक्त की उपाधि भी प्राप्त है।
सीतारामजी कहा ध्यान रखना किसी उगादार को गलती से भी श्वान मत कह देना। वर्ना वह गालियों में पारिवारिक शब्दावली का प्रयोग कर सकता है और ज्यादा ही क्रोधित जो जाए तो लबूर भी सकता है।
सीतारामजी की सलाह पर अंत किसी अज्ञात शायर का ये शेर लिख दिया।
वफा का किस्सा जब भी कोई मुझे सुनाएं
ना जाने क्यों हर बार कुत्ता याद आता है

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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