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असत्य अर्धसत्य__की_आधी_रोटी_पर_अंधभक्ति_की_दाल …निजी जीवन से रीति नीति तक मिथ्यावाचन सिद्ध

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डॉ_राकेश_पाठक
देश के प्रधानमंत्री के एक बयान पर बहस छिड़ी हुई है। अब तक की पड़ताल में इतना ही साबित हुआ कि बांग्लादेश को मान्यता देने की मांग पर जनसंघ ने प्रदर्शन किया था। नरेंद्र मोदी किस शहर में प्रदर्शन में शामिल हुए और गिरफ़्तार हुए यह अब तक साबित नहीं हुआ है।
न उनकी ख़ुद लिखी क़िताब ‘संघर्षमा गुजरात’ में इस बात का उल्लेख है और न उनके अधिकांश जीवनीकारों ने लिखा है। मोदी जी की बीसियों जीविनी,बीसियों भाषाओं में उपलब्ध हैं।(शायद एक को छोड़कर लेकिन उसमें भी कोई प्रमाण नहीं है)
बहुत थोड़े में समझ लीजिये…
1) नरेंद्र मोदी ने ‘बांग्लादेश की आज़ादी’ के लिये आंदोलन में शामिल होने का,जेल जाने का दावा किया है।
जनसंघ का आंदोलन बांग्लादेश की आज़ादी नहीं उसे औपचारिक मान्यता देने की मांग पर था। 
यह मान्यता इंदिरा गांधी यथासमय देने ही वाली थीं।
फिर भी अगर मोदी इस आंदोलन में जेल गए तो वह साबित होना चाहिये। यह कोई कठिन काम नहीं है।तिहाड़ जैसी जेल में सौ साल से ज्यादा का रिकॉर्ड मिल जाएगा।
2) बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई मुक्तिवाहिनी लड़ रही थी जिसकी पीठ पर भारत का खुला हाथ था।
निर्णयक लड़ाई के समय भारत की सेना ने धावा बोला और बांग्लादेश दुनिया के नक्शे पर उभरा। इंदिरा गांधी का साहसी नेतृत्व और भारत की सेना का शौर्य इतिहास में सोने के अक्षरों में लिखा है।बाक़ी बांग्लादेश की आज़ादी के संघर्ष का पूरा क्रम, पूरी टाइम लाइन कोई रहस्य नहीं है,सब मौजूद है ख़ुद देख लीजिये।
वैसे मोदी जी ने अपने भाषण में इंदिरा गांधी का जिक्र मुश्किल से डेढ़ लाइन में किया है।
दरअसल यह 2014 से पहले मोदी जी के जीवन चरित, उनके कद को ‘लार्जर देन लाइफ़’ बताने, बनाने वाली कहानियों का विस्तार ही है। उनको लेकर गढ़े गए मिथकों,सच्चे झूठे किस्सों पर बिना तर्क किये आप करतलध्वनि करते रहे। हालत यह हो गई है कि अब वे संसद से सड़क तक मिथ्यावाचन करते रहते हैं।उनके झूठ पर आप आज भी ताली बजाते हैं और सत्य का आईना दिखाने वाले ‘ईश-निंदा’ के दोषी कहलाते हैं।
ज्यादातर कहानियां उनकी ख़ुद की बताई,सुनाई गईं हैं जिन्हें बाक़ायदा इवेंट कंपनियों,आईटी सेल और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के स्नातक,परा स्नातकों की अक्षोहिणी सेना ने दिग-दिगन्त तक पहुंचाने का काम किया।
◆ पहले निजी जीवन की बानगी देखिये
उनके निजी जीवन को लेकर फैलाये गए लगभग सब मिथक निराट झूठ साबित हो चुके हैं। 
बचपन की कथित गरीबी की पोल खोलने के लिये टाई-बो लगाई स्कूल यूनिफॉर्म की तस्वीरें हैं। पैंतीस बरस भिक्षा मांग कर खाने की चुगली के लिये योरोप,अमरीका की सैर, एफिल टॉवर, हॉलीवुड आदि आदि के सामने कोट पहनकर खिंचाई गईं फोटो पर्याप्त हैं।चार हट्टे कट्टे भाइयों और पिता के होते हुए माँ के दूसरों के घर बर्तन मांजने की बात आजतक साबित नहीं हुई।
जिस स्टेशन पर चाय बेचने का दावा किया वो तब बना ही नहीं था।युवावस्था में संघ कार्यालय में झाड़ू लगाने वाली फोटो भी कट-पेस्ट का कमाल था। वो जिसकी थी पड़ताल करने पर वो ख़ुद ही मिल गया था।
अविवाहित होने के दावे को झूठा ठहराने को उनके ख़ुद के हस्ताक्षर से दाख़िल 2014 का हलफनामा है जिसमें पहली बार पत्नी के नाम वाला कॉलम भरा है।
शिक्षा दीक्षा का मामला विचित्र किंतु सत्य का स्वर्णिम उदाहरण है।
न बीए की डिग्री प्रामाणिक साबित हुई न एमए का विषय। डिग्री को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में मामला लंबित है जो रहती दुनिया तक शायद ही निबटे।
हद यह है कि अमित शाह ने जो डिग्री जारी की वो ऐसे फॉन्ट में है जो तब तक अस्तित्व में ही नहीं आया था।एमए ऐसे विषय में करने का दावा है जिसमें उनके सिवा भारत में कोई दूसरा आज तक मिला ही नहीं।
भिक्षाटन,अज्ञातवास,हिमालय में प्रतिज्ञा, पढ़ाई लिखाई, संघ कार्य, विदेश भ्रमण,सक्रिय राजनीति आदि आदि के उनके ही दावों पर भरोसा किया जाए तो उनकी कुल आयु फ़िलवक्त 100 साल से ऊपर ही बैठेगी।
स्वाधीनता के राष्ट्रीय आंदोलन और उसके नायकों के चेहरे पर कालिख़ पोतने का उनका शौक़ आप सब जानते ही हैं।लेकिन उनके श्रीमुख से झरे ‘ब्रह्मवचन’ मुश्किल से पांच मिनट में सिरे से झूठे साबित हो जाते हैं ।भगत सिंह के जेल जीवन से लेकर अभी कल तक असम के लचित बडफुकन के मामले उनके निरे झूठ के ज्वलंत उदाहरण हैं।लेकिन आप पलट कर ख़ुद से भी नहीं पूछते कि किसी पर इतना बड़ा आरोप आख़िर वे बिनाह पर लगा रहे थे?
और हज़ार किस्से हैं जो सिरे से झूठे साबित हो चुके हैं।
ज्ञान-विज्ञान और वैज्ञानिकता को पलीता लगाने वाले उनके आसमानी-सुल्तानी बयानों पर लाखों चुटकुले,मीम तैरते ही रहते हैं।लेकिन आपने सामान्य नागरिक चेतना को भी ताक पर रख दिया है इसलिये आपको कुछ दिखाई,सुनाई नहीं देता।
◆ शासन की रीति-नीति तक पर मिथ्यावाचन
किसी देश के मुखिया का अपनी ही सरकार की रीति-नीति, घोषणाओं,योजनाओं पर जैसा मिथ्यावाचन नरेंद्र मोदी ने किया है उसकी मिसाल दूसरी नहीं मिलती।राजनैतिक बयानों को भी शामिल कर लेंगे तो उन्हें ख़ुदपर ही शर्म आने लगेगी कि कैसे अपने कहे पर ही गुलटईयां खा जाते हैं और डकार तक नहीं लेते।
सैकड़ों बार ऐसा हुआ है कि अपने और सरकार के नीतिगत बयानों पर ख़ुद ही उलट बांसी कर चुके हैं।बतौर नज़ीर सीएए,एनआरसी पर संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण ,अपने गृहमंत्री तक के बयान को रामलीला मैदान पर भाषण में झुठला दिया। कह दिया हमने यह शब्द भी उच्चारित नहीं किया।
घुसपैठियों के लिये डिटेंशन कैंप की बात को भरी सभा मे अपने ही मुंह से नकार दिया जबकि पांच मिनट बाद ही असम में बन रहे कैम्प की तस्वीरें सामने आ गईं।चीन के हमले में जवानों की शहादत पर देश दुनिया के सामने बोला गया ‘न कोई घुसा है न कोई कब्ज़ा है’ ख़ुद रक्षा मंत्री,रक्षा सचिव,सेनाध्यक्ष के बयानों से झूठ का पुलिंदा साबित हो गया।
देश का मुखिया सरकार की रीति नीति पर खुलेआम मिथ्यावाचन करता रहे तब भी आपको कोई फर्क़ नहीं पड़ता।क्या आप ये बता सकते हैं कि दस साल प्रधानमंत्री रहे डॉ मनमोहन सिंह ने कितनी बार मिथ्यावाचन किया था?मनमोहन की डिग्री,निजी जिंदगी,राजनैतिक बयानों में आपने कितने झूठ पकड़े थे??अगर दस बीस झूठ मिल जाएं तो बताइयेगा हम उनके झूठ का भी ऐसे ही पोस्ट मार्टम करेंगे।
आप असत्य और अर्धसत्य की आधी रोटी पर अंधभक्ति की दाल में फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद का तड़का लगा कर मस्त हैं।मस्त रहिये।

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