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कट्टरत उन्माद अमानवीयता?

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शशिकांत गुप्ते

इक्कीसवीं सदी में धार्मिक उन्माद की खबरें पढ़ने और सुनने पर बहुत आश्चर्य होता है। धर्म तो सभ्यता का आचरण सिखाने वाला मोर्चा है।
किसी भी धर्म को मानने वाला कोई भी व्यक्ति जो सभ्य आचरण को अंगीकृत करता है। वह व्यक्ति उन्मादी हो ही नहीं सकता है?
जो कोई व्यक्ति उच्छृंखल मतलब निरकुंश होगा,हिंसक होगा वह भलेही किसी भी धर्म का आवरण ओढ़ ले ऐसा व्यक्ति मानवता पर कलंक ही साबित होगा।
किसी धर्म को मानना और उस धर्म के द्वारा प्रतिपादित नियमो का पालन करने की स्वतंत्रता प्रत्येक धर्मावलंबियों को देश के संविधान ने ही दी है।
प्रत्येक धर्म में आराधना,उपासना करने की विभिन्न विधियां हैं।
कोई भी धर्म, विधर्मियों के आराधना में विघ्न पैदा करने की अनुमति नहीं देता है। कोई भी धर्म, विधर्म के धार्मिकस्थलों को विध्वंस करने को भी प्रेरित नहीं करता है।
विध्वंसकारी गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोग धार्मिक हो ही नहीं सकतें हैं?
असामयिक तत्वों का कोई भी धर्म नहीं होता है।
धर्म को व्यापक दृष्टि से समझने की जरूरत है।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन और गुरु रवींद्रनाथ जी की आपसी चर्चा धर्म की व्यापकता को परिभाषित करती है।
एक बार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से मिलने पर अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा- विज्ञान वही समझ सकते हैं, जो सत्य के लिए समर्पित हैं। इस पर गुरुदेव ने कहा- मानवता के बिना सत्य की खोज अधूरी है। ऐसा विज्ञान दुनिया का भला नहीं कर सकता। धर्म दुष्प्रवृत्तियों से निवृत्ति का मार्ग है, जो मानव को मानवता के पथ पर अग्रसर करता है। अत: विज्ञान और धर्म का मेल जरूरी है। आइंस्टीन को भी कहना पड़ा था-धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा। यूरोप की सर्न लैब में खोज करते हुए वैज्ञानिकों द्वारा मूलकण का नाम गाड पार्टिकल देना विज्ञान के साथ धर्म एवं अध्यात्म के संबंध को सशक्त रूप से रेखांकित करता है।
अध्यात्म को जो भी व्यक्ति अच्छे से समझ लेगा वह धार्मिक कट्टरता को तुरंत त्याग देगा।
विनोबा भावे जी कहते थे। जय जगत
मात्र 22 वर्ष की आयु में समाधि लेने वाले संत ज्ञानेश्वरजी कहतें थे हे विश्वची माझे घर आर्थत सम्पूर्ण विश्व ही मेरा घर है।
यह सूक्तियां वसुधैवकुटुम्बकम की धारण को मूर्त रूप देने के लिए प्रेरित करती है।
वसुधैवकुटुम्बकम की अवधारणा को जो भी साकार करने की मानसिकता रखता है, वह धार्मिक कट्टर और उन्मादी हो ही नहीं सकता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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