डॉ हिदायत अहमद खान
देश में लोकसभा चुनाव 2024 का वक्त बहुत करीब आ चुका है। यह अलग बात है कि फिलवक्त चुनाव की तारीख़ों का एलान चुनाव आयोग ने नहीं किया है। बावजूद इसके सियासी हलकों से लेकर वैचारिक धरातल पर काम करने वाले विचारवान लोगों ने यह मान लिया है कि दो से तीन माह के अंदर ही भारत की नई सरकार गठन के लिए मतदान और मतगणना का कार्य पू्र्ण कर लिया जाएगा। ऐसे में किसानों का दिल्ली कूच आंदोलन जहां तेज़ हो गया है, वहीं उसने देश-विदेश में सुर्खियां भी बटोर ली हैं।
प्रत्येक स्तर पर हर जगह किसान आंदोलन की बात हो रही है। इससे किसान आंदोलन केंद्र की मोदी सरकार की न सिर्फ परेशानी बढ़ाता दिख रहा है बल्कि वह उसके लिए गले की फांस भी बन चुका है। राजनीतिक हलकों की बात करें तो इस आंदोलन को बल देने के लिए कांग्रेस समेत तमाम विरोधी खेमें बयान देने के साथ ही किसान व मजदूरों को जगाने का कार्य करते दिख रहे हैं।
यहां सवाल यही है कि आम चुनाव से पहले किसानों का आर-पार वाला यह आंदोलन क्या भारतीय जनता पार्टी के लिए कड़ी चुनौती पेश कर रहा है? सच तो यही है कि किसान आंदोलन न सिर्फ भाजपा के लिए बल्कि केंद्र के लिए भी बड़ी चुनौती खड़ा कर चुका है। खासतौर पर तब जबकि केंद्रीय मंत्रियों के साथ किसान नेताओं की बैठकें बेनतीजा रही हैं। दरअसल किसान यूनियनों ने 12 फ़रवरी को केंद्रीय मंत्रियों के साथ बेनतीजा रही दो दौर की बातचीत के बाद दिल्ली कूच का आह्वान किया था। न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए क़ानून बनाने और स्वामीनाथन आयोग की सभी सिफ़ारिशों को लागू करने जैसी मांगों को लेकर किसान संगठनों ने पंजाब-हरियाणा की शंभू बॉर्डर पर पहुंच केंद्र सरकार को ताकत दिखाने का काम किया।
वहीं दूसरी तरफ केंद्र ने किसानों की ताकत को कम आंका और तमाम सीमाओं पर उन्हें रोकने के पुख्ता इंतजाम कर दिए। अन्य सीमाओं के साथ ही शंभू बॉर्डर पर आंदोलनरत किसानों को रोकने के लिए कड़ी व्यवस्था कर दी गई। कंटीले तार लगा दिए गए, बैरिकेडिंग की गई और बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बल तैनात कर दिए गए। कमोवेश यही इंतजाम सिंघु, टीकरी, गाजीपुर और गौतमबुद्ध नगर की सीमाओं पर भी किए गए, जहां बड़ी संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। इस पूरे मामले में केंद्र से भारी चूक हुई और देखते ही देखते किसान आंदोलन ने बड़ा रुप ले लिया। खासतौर पर तब जबकि बड़ी संख्या में एकत्रित हुए किसानों को तितर-बितर करने के लिए ड्रोन से अश्रु गैस के गोले दागे गए। इसका मुकाबला किसानों ने अपनी सुरक्षात्मक रणनीति के तहत पतंगों को उड़ाकर ड्रोन गिराने जैसे उपक्रम से किया, जिसकी चर्चा चटकारे लेते हुए चहुंओर हुई है।
बहरहाल लोकतंत्र में सभी को कानून के दायरे में रहकर आंदोलन करने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस प्रकार के आंदोलन जो देश और दुनियां का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं, कम ही होते हैं। इन्हें वक्त रहते रोकने या उसे असफल करने का दायित्व सरकारों का होता है। यदि यह आंदोलन बड़े स्तर पर हो रहा है तो इसके लिए सरकार की गुप्तचरी और नीतिकारों की असफलता ही कही जाएगी। इस तरह के आंदोलन अचानक एक-दो दिन में खड़े नहीं होते हैं, बल्कि इसके पीछे एक सोच और ताकत काम करती है, जो महीनों और वर्षों की मेहनत से खड़ी की जाती है। यह संगठनों की वो शक्ति है, जिसे आमजन ताकत देता है।
इस ताकत के केंद्रित होने से पहले ही सरकारों को सचेत हो रहना चाहिए, वर्ना वही होता है जो आज किसान आंदोलन के दौरान देखने को मिल रहा है। समस्या का समाधान निकालने के लिए वार्तालाप बेनतीजा रहे यह भी कहीं न कहीं सरकार के प्रयासों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाता है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि कहीं मोदी सरकार सत्ता के नशे में चूर हो जमीनी हकीकत से मुंह तो नहीं मोड़ रही है? ऐसा तो नहीं बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से तंग युवा भी इसी तरह सड़कों पर उतरने और एक नई परेशानी सरकार के लिए खड़ी करने की सोच रखता हो। इस समय देश में 1975 जैसे ही हालात नजर आ रहे हैं, वही महंगाई, वही बेरोजगारी और काम मांगते लोगों को संतुष्ट करने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं और न ही कोई स्थाई हल जैसा सपना ही है। महंगाई की मार एक बात है दूसरे किसानों की उपज का उचित मूल्य न मिलना और बड़ी-बड़ी कंपनियां किसानों के उत्पादों से कमाकर अपना महल तैयार कर रहे हैं तो ये असमानता कहीं न कहीं लोगों के बीच असंतुष्टी की भावना भरती ही भरती है।
सरकार के रणनीतिकारों को इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है, लेकिन कहते हैं कि जब कुर्सी के मद में चूर व्यक्ति सुनने की बजाय सुनाने में विश्वास करने लगे तो उसे कोई अच्छी सलाह देने से भी कतराता है। ऐसे में रास्ता दिखाने वाले भी उस समय के इंतजार में बैठ रहते हैं, जबकि वह खुद से रास्ता भटक न जाए और फिर उसे कुछ सूझे भी न, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसलिए वक्त रहते जमीनी तौर पर सब सही करने की दिशा में आगे बढ़ना ही समस्याओं का समाधान तलाशने में सहायक हो सकता है। जहां तक किसान आंदोलन की बात है तो इसमें सरकार अभी तक पूरी तरह फेल साबित हुई है। किसान हर हाल में जीत गए हैं और अब सरकार कोई भी क्यों न फैसला ले वह उसके लिए आगे भी चुनौती बनेगा ही बनेगा। अंतत: मानना यही होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी जादू की छड़ी कुछ यूं घुमाएंगे कि किसान अंदोलन का प्रभाव आम चुनाव के दौरान नजर ही नहीं आए।

