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गहरे ज़ख़्मों के साथ किसान आंदोलन पुनर्जीवित

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सुसंस्कृति परिहार

तकरीबन पिछले बरस सात सौ से अधिक कुर्बानी देकर किसानों ने तीन काले कानून की वापसी वर्तमान मोदी-शाह सरकार से करवा ली थी शेष तीन मांगों पर जिनमें बिजली, मृतकों को मुआवजा और सबसे बड़ी एमएसपी यानि न्यूनतम मूल्य निर्धारण कानून पर सहमति देने की बात हुई थी उस सम्बंध में लगभग 35बैठकें इन 13महीनों में आयोजित हुई पर इन तीनों पर जब कोई सहमति नहीं बन पाई तब स्वाभाविक तौर पर किसानों को गुस्सा आना स्वाभाविक है ।आज इन्हीं मांगों को लेकर किसान आंदोलनरत हैं।किसान नेता सरवन सिंह पंधेर ने से कहा कि उनकी मुख्य तीन मांगें- एमएसपी की गारंटी, किसानों के कर्ज माफ करने और 60 से अधिक उम्र के किसानों को पेंशन देने पर सहमति नहीं बन सकी।

यह एक किसानों का अपना आंदोलन है इसे राजनैतिक करार देना बिल्कुल ग़लत है।यही नहीं किसान दिल्ली ना पहुंच सके उसके लिए जिस  तरह की बाधाएं खड़ी की गई हैं उन पर लाखों खर्च हो रहे हैं साथ ही ज़ख़्म खाएं किसानों पर टियर गैस, ड्रान से गोले,और केंद्रीय बल और पुलिस लाठी गोली बरसा कर डरा रही है इससे हिम्मती किसान डरने वाला कतई नहीं है। इस बार वे पूरी तैयारी से आए हैं।चोट खाएं व्यक्ति बहुत मज़बूत हो जाते हैं ये सरकार को समझना चाहिए।हाल ही में पता चला है कि किसानों ने अश्रुगैस के विकल्प खोज लिए हैं और वे इसका सामना कर रहे हैं।दूसरे राज्यों से आने वाले किसानों को भाजपाई सरकारें ट्रेन से उतारकर उज्जैन और अयोध्या भेज रही है।बड़ी संख्या में हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सख़्ती हो रही है उनके निकलने के तमाम रास्ते बंद किए गए हैं।

सवाल इस बात का है कि किसानों को रोका क्यों जा रहा है कहीं ऐसा तो नहीं मोदी शाह को ऐसा लग रहा हो वे उनकी सल्तनत छीन ना लें। पिछले साल भी  दिल्ली द्वारों पर इसी तरह प्रवेश की रोक लगाई गई थी।उन पर विश्वास ना करते हुए उस वर्ष गणतंत्र दिवस की परेड की उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी।एक लोकतांत्रिक गणराज्य में अपनी राजधानी जाकर विरोध जतलाना और उनकी मांगे पूरी कर पिछली सरकारें आंदोलन ख़त्म करते रहे हैं।अन्ना आंदोलन की याद कीजिए कितना बड़ा आंदोलन हुआ किंतु उसे कांग्रेस सरकार ने इस तरह यदि बाधित किया होता तो शायद यह झूठी सरकार सत्ता तक नहीं पहुंच सकती थी।आज तो सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन नहीं है किसान अपनी मांगों पर किए वायदे की याद दिलाने दिल्ली आना चाह रहे।उनको रोका जाना सरकार की असफलता और देश के किसानों पर अविश्वास ही दर्शा रहा है।यह संविधान विरोधी अलोकतांत्रिक कदम है।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकार किसानों से मिले और उनके साथ किए हुए वायदे पूर्ण करने तत्काल केबिनेट की आपात बैठक बुलाकर उनकी मांगे पूरी करे। बड़े दुख की बात है कि सरकार का मुखिया आबूधाबी में स्वामीनारायण मंदिर निर्माण के उद्घाटन में व्यस्त हैं और इसे मोदी मीडिया उनकी बड़ी उपलब्धि राममंदिर अयोध्या जैसी बताई जा रही है। उन्हें अन्नदाताओं की लेशमात्र फ्रिंक्र नहीं।कैसे होगी जो आज तक जलते देश के मणिपुर नहीं पहुंच सका।लगता है यह उनका शगल बन चुका है। कृषिमंत्री और अनुराग ठाकुर मोर्चे को संभाल रहे हैं। याद रखिए, यह तानाशाही निज़ाम जैसी हरकतें ज़्यादा दिन  नहीं टिक सकती यह इतिहास में उल्लिखित है। किसान का सम्मान इस तरह गिराना उचित नहीं वे प्रकृति पुत्र हैं उनसे लोहा लेना आसान नहीं है।

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