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2017 की किसान समस्याएं आज भी यथावत हैं ,खाद वितरण बन सकता है किसान आंदोलन का कारण

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हरनाम सिंह

  ्््   देश की बहुसंख्यक आबादी कृषि पर निर्भर है। हर चुनाव में किसानों के नाम पर राजनीतिक लक्ष्य पूरे किए जाते रहे हैं। लेकिन शासन स्तर पर किसानों की सदैव उपेक्षा ही हुई है। किसानों में एकजुटता के अभाव के चलते वर्षों से सरकार किसानों के साथ मनमानी करती रही है। इन दिनों खाद वितरण व्यवस्था से किसान परेशान है। यह मुद्दा किसान आंदोलन का बड़ा कारण बन सकता है। देश में लगभग 8 वर्ष पूर्व किसानों को आंदोलन के लिए प्रेरित करने वाला मंदसौर जिला पुनः आंदोलन की ओर अग्रसर है। किसानों की जो समस्याएं वर्ष 2017 में थी वे आज भी यथावत बनी हुई है। किसानों  का दुःख -दर्द चुनावी राजनीति को प्रभावित नहीं करता, इसलिए शासक दल निश्चिंत है। अन्नदाता के नाम से विभूषित किसान खाद वितरण की लाइनों में पीटा जा रहा है। फसलों का उचित दाम न मिलने पर उसे सड़कों पर फेंकने पर मजबूर है। हाल ही में मालवा क्षेत्र के किसानों ने खेती की समस्याओं को लेकर पुनः मैदान में उतरने का संकल्प व्यक्त किया है। बीते दिनों मंदसौर जिले के पिपलिया मंडी में 12 गांव के किसानों ने उसी बालाजी मंदिर परिसर पर चौपाल लगाई जहां से 2017 के आंदोलन का प्रारंभ हुआ था।

#परेशान हैं किसान
खेतों में खड़ी सोयाबीन की फसल की नुकसानी पर शासन द्वारा राहत प्रदान न करना, लगातार बारिश, फसलों में बीमारी ही नहीं, फसल बीमा के नाम पर हो रही लूट, प्याज- लहसुन के गिरते दामों से किसान परेशान है। खाद वितरण में अव्यवस्था कालाबाजारी सुर्खियों में है। सरकार का दावा है कि प्रदेश में पर्याप्त खाद उपलब्ध है। उसके बाद भी किसानों को समय पर खाद न मिलने से प्रदेश के किसान बेहद नाराज हैं। वे रात- रात भर लंबी लाइनों में प्रतीक्षा करते हैं। उन पर लाठियां बरसाई जाती है। चुनाव के समय सुशासन का वादा करने वाले सत्ता में आते ही किसानों की लूट में शामिल हो जाते हैं। बाजार में बढ़े दामों पर खाद उपलब्ध है। किसान संघ का आरोप है 266 रुपए 50 पैसे कि यूरिया की बोरी व्यापारी450 रुपए से480 रुपए में बेच रहे हैं।

हर साल खाद की परेशानी क्यों ?

          किसानों को प्रतिवर्ष खाद की कमी का सामना करना पड़ता है। मध्य प्रदेश में गेहूं, धान, सोयाबीन जैसी फसलें अधिक पैदा होती है। जिसमें यूरिया, डीएपी खाद की जरूरत होती है। खाद आवंटन का कोटा केंद्र सरकार तय करती है। कई बार वह किसानों की मांग के अनूपुरूप खाद उपलब्ध नहीं करती। रेलवे रैक न मिल पाने के कारण भी जिला स्तर पर खाद समय पर नहीं पहुंचता। रासायनिक खाद पर सरकार अनुदान देती है। लेकिन किसानों को नहीं, खाद बनाने वाली कंपनियों को। सरकार कई बार इन कंपनियों को जब समय पर भुगतान नहीं करती है तो वे अपना उत्पादन और आपूर्ति घटा देते हैं। जिसका सीधा नुकसान किसानों को भुगतना पड़ता है। 
           देश में रासायनिक खाद बनाने के अनेक कारखाने हैं, बावजूद इसके इनमें इतना उत्पादन नहीं होता जो किसानों की आवश्यकता की पूर्ति कर सके। स्वदेशी अपनाने के नारों के बावजूद भारत सरकार की नीति खाद के मामले में आत्मनिर्भरता की नहीं है। देश चीन, मोरक्को, रूस, कनाडा, जॉर्डन, सऊदी अरब से खाद खरीदता है। मध्य प्रदेश में खाद की कमी का लाभ निजी व्यवसाई उठाते हैं। ये खाद की जमाखोरी कर किसानों की मजबूरी को अपने मुनाफे  में बदलते हैं।

#वर्षों से जारी है संकट
खाद की समस्या आज की नहीं है। हर साल यही इतिहास दोहराया जाता है। वर्ष 2021 में भी डीएपी की भारी कमी हुई थी। किसान रात भर कतारों में खड़े रह कर अपनी बारी का इंतजार करते थे। उस काल में भी नाराज किसानों ने सड़कों को जाम किया। धरना- प्रदर्शन हुआ, तब जाकर सरकार ने रेलगाड़ी से विशेष व्यवस्था की तब भी किसानों को मांग के अनुरूप खाद नहीं दिया जा सका था।
मालवा क्षेत्र में विशेष रूप से अफीम, गेहूं, लहसुन की खेती होती है इनमें उर्वरक डीएपी और यूरिया की जरूरत रहती है। समय पर खाद न देने पर फसल उसकी बढ़त प्रभावित होती है। इसका नुकसान किसानों को झेलना पड़ता है। बुवाई के समय जून- जुलाई और अक्टूबर- नवंबर में अक्सर खाद के लिए किसान कतार लगने पर विवश रहते हैं।

#मांगा खाद मिली लाठियां
हाल ही में सोमवार को कृषि मंत्री के जिले में खाद वितरण के दौरान अव्यवस्था सामने आई। मुरैना में खाद वितरण केंद्र खुलते ही पंक्ति में आगे खड़े होने की होड़ में किसान आपस में ही भिड़ गए। इस दौरान लाठियां चली तीन किसान घायल हो गए। शिवपुरी में भी नाराज किसानों ने वितरण केंद्र पर पथराव किया।
भिंड जिले के लहार क्षेत्र में वितरण केंद्र के बाहर किसान लाइन लगाकर खड़े थे। पुलिस कर्मियों ने उन्हें बैठ जाने के निर्देश दिए किसान नहीं बैठे तो उन पर लाठियां बरसाई गई। भिंड में किसानों को एक माह बाद खाद लेने का टोकन दिया गया। जबकि किसानों को बोवनी के लिए तत्काल खाद की जरूरत है। आक्रोशित किसानों ने सड़क पर जाम लगाया। रीवा में रात्रि में लाइन में खड़े किसानों पर भी लाठीचार्ज हुआ, कई बुजुर्ग और महिलाएं घायल हुए। वे 48 घंटे तक लाइन में लगे थे, तब जाकर उनका नंबर आया। मऊगंज में वितरण व्यवस्था के खिलाफ भारी प्रदर्शन हुआ यहां भी लाठियां चली। 500 के लगभग लोग हिरासत में लिए गए। जबकि प्रशासन का दावा है कि उनके पास पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है।

वितरण व्यवस्था दोषपूर्ण
केंद्र सरकार राज्यों और जिले के लिए खाद आपूर्ति की मात्रा तय करती है। लेकिन अक्सर उनका आकलन गलत होता है। अनेक बार बुवाई के समय किसानों को खाद नहीं मिलता आरोप है कि बड़े किसानों और दलालों को आसानी से खाद मिल जाता है, किसानों के आक्रोश का यह भी बड़ा कारण है। अधिकांश सहकारी समितियों में स्थानीय विधायक, सांसद और उनके समर्थक ही पदाधिकारी होते हैं। वितरण व्यवस्था पर उनका पूरा नियंत्रण रहता है। वे अपने चहेतों को ही वितरण में प्राथमिकता देते हैं।

#डिजिटल तकनीक का हो उपयोग
खाद वितरण की समस्या मध्य प्रदेश में ही अधिक है। अन्य कई राज्यों ने डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से खाद वितरण को जोड़ा है और उसे पारदर्शी बनाया गया है। पंजाब में आधार लिंक से किसानों को जोड़ा गया। महाराष्ट्र और राजस्थान में एसएमएस के माध्यम से किसानों को संदेश भेजा जाता है, जिसमें उसे खाद मिलने की तारीख बताई जाती है। इससे न तो कहीं असंतोष होता है नहीं कतार लगाने की जरूरत पड़ती है। मध्य प्रदेश में डिजिटल वितरण व्यवस्था नहीं है। समितियां और वितरण केंद्र राजनीतिक दबाव में काम करते हैं। बावजूद इन समस्याओं के मालवा क्षेत्र के किसान सहनशील हैं। यहां से किसान आंदोलन पुनः खड़ा हो सकेगा ? संभव तो नहीं लगता।

हरनाम सिंह

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