सरकार डाल-डाल,किसान पात-पात
- सनत जैन
किसानों का आंदोलन पंजाब से चलकर हरियाणा की बॉर्डर पर अटका हुआ है। किसान फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी को लेकर अड़े हुए हैं। रविवार की रात को तीन केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, अर्जुन मुंडा और नित्यानंद राय की किसान नेताओं से चौथे दौर की बातचीत हुई। रविवार की रात 1:00 बजे तक वार्ता चली। सरकार ने अपनी ओर से दाल कपास और चार अन्य फसलों पर एसपी की गारंटी का प्रस्ताव दिया है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि सरकार गारंटी के स्वरूप में चार फसलों को खरीदने के लिए नेफेड एवं अन्य संस्थाओं के माध्यम से 5 साल का अनुबंध किसानों के साथ करेगी।
इन संस्थाओं और सरकार द्वारा फसल खरीदने की कोई सीमा तय नहीं की जाएगी। कर्ज माफी और सभी फसलों की एमएसपी तय करने के बारे में सरकार चौथे दौर में भी कोई प्रस्ताव लेकर नहीं आई। किसान नेताओं ने सरकार की बात सुनी और समझी हैं। सरकार से दिए गए प्रस्ताव पर किसान नेताओं और उनके संगठनों ने यह कह दिया है सरकार की ओर से मिले सुझाव पर विचार किया जाएगा। इसके बाद किसान संगठन अपने फैसले से सरकार को अवगत कराएंगे। किसान संगठनों और सरकार के बीच में तीसरे दौर की बातचीत भी एक तरह से बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो गई है। किसान संगठनों का कहना है सरकार समय पास कर रही है। सरकार ना तो न्यूनतम गारंटी का अध्यादेश लाने तैयार है। ना ही फसलों के न्यूनतम रेट तय करना चाहती है। पिछले किसान आंदोलन में सरकार ने लिखित में किसान संगठनों से जो वायदे किए थे, सरकार अपने वायदों से पलट रही है। सरकार अपने पुराने लिखित वायदे से जब पलट गई है।
ऐसी स्थिति में किसान संगठन अब सरकार के ऊपर कोई भी भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है। किसान दिल्ली जाने के लिए अड़े हुए हैं। वह सरकार को कोई मौका देने के लिए तैयार नहीं है। सरकार एक और किसानों से बात करने के नाम पर नए-नए तरीके से किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए और आश्वासन देकर मांगों को टालने का प्रयास कर रही है। किसान संगठन भी इस बात को अच्छी तरीके से समझ गए हैं। वह भी अपनी रणनीति और कूटनीति बनाने में जुटे हुए हैं। देश भर के सारे किसान संगठन कर्ज माफी और एमएसपी गारंटी कानून के मामले में अड़े हुए हैं। किसान संगठन के नेता भी पूरी राजनीति कर रहे हैं।
उन्हें मालूम है लोकसभा का चुनाव सिर पर है। सरकार मांगे मानने से बचने का प्रयास कर रही है। किसान सरकार को किस तरीके से घेर सकती है, किसान संगठनों ने वर्तमान स्थिति में अध्यादेश लाकर कानून बनाने की बात पर भी जोर देना शुरू कर दिया है। किसान संगठन कर्ज माफी पर भी अड़े हुए हैं। किसान संगठन पिछले आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मौत हुई थी। उनको मुआवजा देने की मांग और गृह राज्य मंत्री के इस्तीफा को लेकर किसान संगठन अड़े हुए हैं। सरकार ने इस पर मौन साध लिया है। इस बीच किसान संगठनों ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली इत्यादि के किसानों को भी अपनी रणनीति में शामिल कर लिया है। अगले एक-दो दिन में किसान संगठन सुनयोजित रणनीति के तहत दिल्ली क़ी ओर सभी सीमाओं से कूच करेंगे। किसान संगठनों ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है।
किसान संगठन सरकार के ऊपर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। इस बार वह आर पार की लड़ाई लड़ने के लिए निकले हुए हैं। हरियाणा सरकार द्वारा जिस तरह से उन्हें रोका गया है। उनके ऊपर ड्रोन से अश्रु गैस के गोले छोड़े गए हैं। किसानों के ऊपर रबर बुलेट छोड़े गए हैं। पिछले 6 दिनों से किसान हरियाणा की सीमा पर हजारों की संख्या में डटे हुए हैं। हरियाणा की सीमा पर जिस तरह से पुलिस और अर्ध सैनिक वालों को तैनात किया गया है। रास्ते में कीले लगा दिए गए हैं। इससे किसानों का गुस्सा विशेष रुप से युवाओं का भड़क गया है। उन्हें लगता है कि यदि अभी वह अपनी मांग नहीं बनवा पाए, तो कभी नहीं मनवा पाएंगे।
एक तरह से यह किसानों, मजदूरों और पूंजीपतियों के बीच की लड़ाई बन गई है। सरकार के लिए लोकसभा चुनाव जीतना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। किसान इस बात को समझते हुए अपनी रणनीति बना रहा है। वहीं सरकार इस बात की कोशिश कर रही है कि लोकसभा की अधिसूचना जारी हो जाए। किसान संगठनों को चुनाव तक रुकने के लिए मजबूर किया जाए। सरकार और पूंजीपतियों ने किसान संगठनों में जो फूट डाली थी, सरकार को अभी भी विश्वास है कि किसान नेताओं को मेनेज कर लेंगे।

