सड़क पर,
सरसों के खेत से,
जमें ये तम्बू,
हरियाली की चादर लपेट,
पौधों की तरह,
सर्दी गर्मी को झेलते,
पसीने से तरबतर,
किसान,
खेत की तरह,
सड़क पर भी डटे हुए,
अब
खून-पसीनें में भी लगी है,
आग
चिंगारी उठकर हुई,
सुर्ख लाल,
जुल्म की हद पर,
सब जलकर होगा इसतरह, खाक,
पथराए नेत्रों से बुजूर्ग हलधर,
यह बात कह गये..
परिवर्तन तो आएगा,
आज सूरज डूब गया तो,
क्या ?
कल फिर सबेरा लाएगा
कल फिर सबेरा लाएगा..
साभार- अश्विनी 'सुकरात' संपर्क- 9210473599
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

